Uttarakhand Election : समाजवादी पार्टी क्यों नहीं उतारती उत्तराखंड में उम्मीदवार, क्यों साइकिल कभी नहीं चढ़ सकी पहाड़ ?

समाजवादी पार्टी ने इस बार भी लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड की किसी भी सीट पर अपने प्रत्याशियों को नहीं उतारा है। उत्तराखंड के चुनावी इतिहस को देखें तो समाजवादी पार्टी केवल एक बार ही एक सीट जीत पाई। लेकिन समाजवादी पार्टी कभी पहाड़ नहीं चढ़ पाई। पहले पहल तो सपा ने काफी कोशिशें की उत्तराखंड में अपनी पार्टी को मजबूती दिलाने के लिए लेकिन अब सपा ने चुनाव में प्रत्याशी उतारने भी बंद कर दिए हैं।
सपा क्यों नहीं उतारती उत्तराखंड में उम्मीदवार ?
समाजवादी पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनावों में भी किसी सीट पर उम्मीदवार नहीं उतारे थे। इस बार भी सपा ने पांचों में से एक भी सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है। जिसके बाद सवाल उठता है कि आखिर क्यों सपा उत्तराखंड में उम्मीदवार नहीं उतारती है। जिसके पीछे कोई एक कारण नहीं है इसके पीछे कई कारण है। जिसका सबसे बड़ा कारण रामपुर तिराहा कांड है। आज भी उत्तराखंड के लोग इसे भूल नहीं पाए हैं। यहीं कारण है कि सपा को कभी उत्तराखंड को खासी सफलता नहीं मिल पाई। हर बार साइकिल उत्तराखंड में चल ही नहीं पाई।
आज तक सिर्फ एक सीट जीत पाई समाजवादी पार्टी
आपको बता दें कि समाजवादी पार्टी आज तक उत्तराखंड में लोकसभा चुनावों में सिर्फ एक ही सीट जीत पाई है। साल 2004 के चुनाव में सपा ने हरिद्वार से जीत दर्ज की थी। इस साल सपा ने राजेंद्र बॉडी को मैदान में उतारा था। ये पहला चुनाव था जब समाजवादी पार्टी ने उत्तराखंड में अपना खाता खोला था। इसके बाद ना तो लोकसभा चुनाव में और ना ही विधानसभा चुनाव में सपा को कभी भी उत्तराखंड में कामयाबी नहीं मिल पाई।
बात करें उत्तराखंड के पहले और 2002 के विधानसभा चुनाव की तो इसमें कई सीटों पर सपा की जीत का अंतर मामूली रहा। लेकिन 21 सालों में आज तक सपा का एक भी विधायक विधानसभा तक नहीं पहुंच पाया। ना ही साल 2004 के बाद कोई प्रत्याशी सांसद बन पाया।
ऐसे गिरा उत्तराखंड में सपा का ग्राफ
साल 2002 में समाजवादी पार्टी को 7.89 फीसदी के करीब वोट मिले थे। इस चुनाव में सपा ने 56 सीटों पर चुनाव लड़ा था। लेकिन इसके बाद सपा का ग्राफ प्रदेश में गिरता ही गया। साल 2007 में सपा ने 42 सीटों पर चुनाव लड़ा और 6.5 फीसदी वोट हासिल किए।
साल 2012 आते-आते तो सपा की हालत खराब होती चली गई और सपा का ग्राफ इतना गिरा कि उसका वोट परसेंटेज 1.5 फीसदी पर आ गया। साल 2017 में सपा में उत्तर प्रदेश में हुए घमासान का असर उत्तराखंड में भी देखने को मिला। नतीजन सपा ने साल 2017 में उत्तराखंड में केवल 18 सीटों पर ही चुनाव लड़ा और इस बार सपा का वोट प्रतिशत ना के बराबर हो गया।
क्यों साइकिल कभी नहीं चढ़ सकी पहाड़ ?
साइकिल के उत्तराखंड में ना जीत पाने और पहाड़ पर अपनी पकड़ ना बना पाने के कई कारण हैं। जिसमें सबसे बड़ा रामपुर तिराहा कांड है। साल 1994 में राज्य आंदोलन संघर्ष समिति के अपील पर महिलाएं, पुरूष और नौजवान अक्टूबर में अलग पहाड़ी राज्य उत्तराखंड की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देने जा रहे थे। लेकिन उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने उन्हें आगे नहीं जाने दिया। आंदोलनकारियों को रोकने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए गए।
पहले तो नारसन बार्डर पर नाकाबंदी की गई लेकिन यहां आंदोलनकारियों के आगे प्रशासन बेबस हो गया और आंदोलनकारी आगे बढ़ गए। जब गढ़वाल और कुमांऊ के आंदोलनकारियों का काफिला मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पहुंचा तो यहां पर पुलिस प्रशासन ने सरकार के आदेश पर उन पर गोलियां चला दी। यहां तक की महिलाओं के साथ बर्बरता की गई और बालात्कार किए गए। इस दौरान सात आंदोलनकारियों की मौत हो गई और कई आंदोलनकारी गंभीर रूप से घायल हो गए।
इस घटना ने समाजवादी पार्टी के प्रति पहाड़ के लोगों के दिलों में नफरत भर दी। इसके साथ ही कभी ना भरने वाले जख्म भी दिए। कोई भी नेता समाजवादी पार्टी पर लगे इस कलंक को कभी धो नहीं पाया और यही सबसे बड़ा कारण है कि साइकिल कभी पहाड़ नहीं चढ़ पाई और ना ही उत्तराखंड में कभी अपना सियासी आधार जमा पाई।
लीडरशिप की कमी के कारण भी सपा ने खाई मात
जहां एक ओर रामपुर तिराहा कांड सपा के उत्तराखंड में ना जीत पाने का कारण है तो वहीं दूसरी ओर जातीय और धार्मिक समीकरण और लीडरशिप की कमी के कारण भी सपा उत्तराखंड में मात खा गई। सपा का यूपी में परंपरागत वोटर यादव और मुस्लिम माना जाता है। लेकिन उत्तराखंड में यादव समाज का कोई खास आधार नहीं है जबकि मुस्लिम 13 फीसदी है। इसके साथ ही उत्तराखंड में मुस्लिम वोटर सिर्फ तीन जिलों तक ही सीमित है। पहाड़ों में इनकी आबादी ना के बराबर है।
यहां खास बात ये भी है कि उत्तराखंड का ज्यादातर मुस्लिम वोटर कांग्रेस के सपोर्टर हैं, जिस कारण सपा उत्तराखंड में अपना सियासी आधार मजबूत नहीं कर सकी। लेकिन इसके बाद भी सपा ने कई बार अपनी किस्मत आजमाई लेकिन लीडरशिप की कमी के कारण साल 2004 को छोड़कर सपा कभी नहीं जीत पाई। जहां एक ओर उत्तर प्रदेश में सपा के पास लीडरशिप अच्छी है तो वहीं दूसरी ओर उत्तराखंड में ऐसा नहीं है। सपा के पास ना तो उत्तराखंड में संगठन है और न ही मजबूत लीडरशिप है। ऐसा कहा जा सकता है कि लीडरशिप की कमी के कारण भी सपा उत्तराखंड में मात खाई।