सरखेत आपदा। दीवार पर बने नक्शे में दिल्ली की तलाश जरूरी या लापता लोगों की?

deepak gulati oneउत्तराखंड के मालदेवता में 19 अगस्त को आपदा आई। इतनी भयावह आपदा कि सरखेत और आसपास का इलाका पूरी तरह तबाह हो गया। इस आपदा ने किसी बच्चे को अनाथ कर दिया तो किसी की जिंदगी भर की कमाई को मलबे में दफन कर दिया। इस आपदा में टिहरी के ग्वाड और आसपास के इलाके में भी भारी तबाही मची। वहां भी कई घर जमींदोज हो गए। इस आपदा का दुखद पहलु ये रहा कि इस आपदा में 11 लोग लापता हो गए। लापता लोगों में से पांच लोगों के शव मलबे से निकले हैं। आपदा का एक दुखद पहलु ये भी है कि आपदा के चार दिनों बाद भी राहत और बचाव कार्य में लगी एजेंसियां लापता लोगों का पता नहीं लगा पाईं हैं। हैरानी इस बात की भी है कि चार दिनों बाद अब शासन स्तर पर कहीं से थर्मल सेंसर की तलाश की जा रही है। थर्मल सेंसर मिले तो मलबे के नीचे किसी इंसाना या कहिए कि जीव के बारे में कुछ जानकारी मिल सके। हालांकि इस बात में दो राय नहीं है कि एसडीआरएफ, एनडीआरएफ और अन्य प्रशासनिक इकाइयां अपनी पुरजोर कोशिश कर रहीं हैं लेकिन आपदा की भयावहता के सामने उनको भी चुनौती मिल रही है।

वहीं इस आपदा राहत कार्यों के बीच आपदा प्रभावितों से मुलाकात का सिलसिला चल पड़ा है। इनमें से कइयों का फोकस आपदा राहत कार्यों में मदद करने, आपदा प्रभावितों तक प्रभावी और तत्काल मदद पहुंचाने के बजाय दीवार पर बने नक्शों में गलती निकालना में चला गया है।

ऐसा ही कुछ हुआ जब उत्तराखंड बाल संरक्षण अधिकार आयोग के सदस्य दीपक गुलाटी मालदेवता इलाके में पहुंचे। वो शिव जूनियर हाई स्कूल में बने आपदा राहत शिविर में पहुंचे तो स्कूल में एक दिवार पर भारत का नक्शा बना हुआ दिखा। जो नक्शा दीवार पर पेंट किया गया था उसमें दिल्ली का नाम नहीं दिख रहा था। बस फिर क्या था? आपदा पीड़ितों का दुख बांटने के लिए पहुंचे दीपक गुलाटी आपदा पीड़ितों का दुख भूल, उन अनाथ बच्चों का दुख भूल, लापता लोगों के परिजनों की आंखों में जमे आंसुओं को भूल दीवार पर बने नक्शे में दिल्ली तलाशने लगे। दीपक गुलाटी ने स्कूल के प्रिंसिपल को बुलाया और नक्शे के पास ले जाकर दिल्ली और राष्ट्रधर्म का पाठ पढ़ाने लगे। दिलचस्प ये कि ये सब मोबाइल कैमरे में ‘ठीक से’ रिकॉर्ड किया गया और फिर एक प्रेस रिलीज बनाकर मीडिया को बताया गया कि कैसे दीपक गुलाटी ने एक दीवार बने देश के नक्शे में गलती तलाश की और प्रिंसिपल को डांट दिया। जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई है उसमें ये भी लिखा गया है कि दीवार पर बने नक्शे में दिल्ली को प्रदर्शित न किया जाना राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है।

मालदेवता आपदा। मलबे से तीन शव बरामद, अब भी कई लापता

प्रेस रिलीज के ऊपरी हिस्से में दो तीन पंक्तियों में ये बताया गया है कि आयोग ने आपदा राहत शिविर में पहुंच कर आपदा प्रभावित परिवारों को राशन आदि आवश्यक राहत सामग्री वितरित की। साथ ही शिविर में ठहरे बच्चों की पढ़ाई व खेल कूद संबंधित जानकारी ली।

लेकिन सवाल ये है कि जिस मालदेवता में हर तरह तबाही है, बेबसी है, लोगों की जिंदगी भर की कमाई मलबे में दफन हो गई है, जो इलाका पीने के पानी और खाने के राशन के लिए सरकारी एजेंसियों का मुंह ताक रहा है उस इलाके में जाकर दीवार पर बने देश के नक्शे को दुरुस्त कराने की कवायद को आप क्या कहेंगे? क्या ऐसे कामों के लिए यही सही वक्त था? क्या इसे प्रचारित प्रसारित करना इतना जरूरी था कि बाकायदा प्रेस रिलीज जारी कर दी जाए? क्या लगता है आपको? हम ये फैसला अपने पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। पाठक ये तय करें कि दीवार पर बने नक्शे में दिल्ली की तलाश जरूरी है या फिर लापता लोगों की तलाश?

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