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उत्तराखंड : यहां लोगों को रोज चढ़नी पड़ती 5 KM की खड़ी चढाई, सोशल मीडिया पर मांगी सरकार से मदद

अल्मोड़ा : सरकार भले ही हर गांव सड़क, बिजली, पानी और हर सुख सुविधाए पहुंचाने का दावा करती हो लेकिन सोशल मीडिया पर दिख रही उत्तराखंड के कई गांव के लोगों की पीड़ा इन दावों की पोल खोलती दिखती है। पहाड़ की कई तस्वीरें ऐसी भी सामने आई है जिसमे गर्भवती महिलाओं को डोली में बैठाकर 10 10 किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल पहुंचाया गया है। बदहाल सड़क और बदहाल चिकित्सा सुविधा का खामियाजा पहाड़ी जिले खास तौर पर गांव वालों को भुगतमा पड रहा है। जी हां बता दें कि सोशल मीडिया पर अल्मोड़ा जिले के सल्ट ब्लॉक के अंतर्गत पुरियाचौड़ा ग्राम सभा के गांव हनेड के लोगों की पीड़ा को बयां किया गया है और सरकार से गुहार लगाई गई है। ये पोस्ट सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है। अब तक 120 से ज्यादा लोग इसे शेयर कर चुके हैं और जमकर कमेंट भी कर रहे हैं। आपको बता दें कि सोशल मीडिया पर UTTARAKHAND JAAGAR नाम से पेज बनाया गया है जिसमे गांव वालों ने मदद की गुहार सरकार से लगाई है। लोगों ने सोशल मीडिया का रास्ता अपनाया है और इस उम्मीद में है कि क्या पता सरकार इस पोस्ट को देख और सुन ले।
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सोशल मीडिया पर पोस्ट
फेसबुक पर UTTARAKHAND JAAGAR नाम के पेज पर मदद की गुहार सरकार से लगाई गई है। पोस्ट पर लिखा है कि हर तरफ विकास की बयार चल रही है। घर घर गांव गांव तक सड़क पहुंच रही है। बेघरों को घर मिल रहे हैं। बिजली पानी आदि की सुविधा मिल रही है। खुले में शौच से मुक्त हो रहा है भारत। तकनिकी और प्रौद्योगिकी का नया युग आया है लेकिन अभी भी कही कुछ ऐसे लोग हैं जो अपनी रोज मर्रा की जरूरतों के लिए 5 – 5 किलोमीटर की खड़ी चढाई चढ़ते हैं ताकि दुकान से कुछ सामान लाया जा सके। बच्चे घने जंगली रास्तों से गुजरने को विवश है ताकि स्कूल में शायद तक़दीर खुल सके। मरीज़ को इंतज़ार रहता है की कब 4 लोग उसको उठा कर अस्पताल ले कर जाएंगे ताकि उसकी जान बच सके। मैं बात कर रहा हु उत्तारखंड के अल्मोड़ा जिले के सल्ट ब्लॉक के अंतर्गत पुरियाचौड़ा ग्राम सभा के गांव हनेड की जो आज भी अपने गांव में एक सड़क के इंतज़ार में बैठा है।
सोशल मीडिया पर गांव वालों ने अपनी पीड़ा भी बयां की है। सांसदों, मंत्री-विधायकों पर उपेक्षा का आरोप लगाया है।
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आगे लिखा कि कभी बूढी हो चुकी आँखें यह सोचती हैं की क्या पता इक सड़क बन जाने से उसके घर के बच्चे उनसे मिलने आ जाएं और युवा ये सोचते हैं ही की क्या पता इस सड़क के बाद हम भी अपने गांव में रोज़गार की संभावनाएं तलाशें और शहर की ज़िन्दगी को अलविदा करें। लेकिन आशा की किरण कहीं नज़र नहीं आती। बात कभी विधायक तो कभी सांसद तो कभी ग्राम प्रधान के द्वार पर ही दम तोड़ देती है और कभी आगे बढ़ती है उच्च अधिकारीयों से जवाब नहीं आता। आलम यह है की गांव के लोग सड़क के बदले में अपनी पुश्तैनी ज़मीन का मुआफज़ा भी नहीं चाहते। चाहते हैं तो बस एक सड़क। आशा है की शायद ये सड़क बन जाने से विकास की बयार इस गांव तक भी फैलेगी और एक बार फिर यह गांव हंसी ठिठोली की आवाज़ सुनेगा। पिछले कुछ समय से अधिकारियों को अनेको अनेक बार तलब करने के बाद यह गांव अब खुद की ज़मीन पर खुद की लागत से सड़क बनाने की सोच रहा है लेकिन अगर ऐसा हुआ तो क्या यह सही होगा ? क्यों करना चाहिए ऐसा ? सरकार हमारे लिए होती है और काम जरूर करेगी लेकिन कभी कभी शोर मचाने की जरूरत पड़ती है।
आगे लिखा हमें आप सब का साथ चाहिए। अगर आप सब लोग इस पोस्ट को शेयर करें और अपने परिचितों को भी शेयर करने बोलें तो शायद यह इन निराश लोगों के दिलों में आशा की किरण जगा दे। कुछ पुरानी पत्राचार की कॉपियों भी संलिप्त कर रहा हूं जिसमें गांव वालों ने खुद पत्र लिख कर अपनी जमीन देने का वादा करा है और इस गांव से दिखने वाली सुन्दर हिमालय की तस्वीर भी।
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