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पहाड़ों में क्यों मनाई जाती है दीपावली के 11 दिन बाद बूढ़ी दिवाली ? क्या है इगास की कहानी ?

दीपावली का त्यौहार देशभर में मनाया जाता है. उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में दिवाली के 11 दिन बाद लोक पर्व के रूप में बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है. जिसे इगास बग्वाल भी कहा जाता है. कार्तिक शुक्ल की एकादशी को इगास का त्यौहार मनाया जाता है. इस साल 12 नवंबर (Igas 2024) को इगास मनाया जाएगा. रात के समय लोग अपने घरों में दीपक जलाने के बाद भैलू खेलते हैं.

क्या है इगास बग्वाल की कहानी? (What is the story of Igas Bagwal?)

वैसे तो इगास बग्वाल (igas bagwal) को लेकर कई कथा-कहानियां सुनने लो मिलती हैं. लेकिन दो लाइनों में आप समझ सकते हैं कि इगास क्या है? वो लाइनें हैं…बारह ए गैनी बग्वाली मेरो माधो नि आई, सोलह ऐनी श्राद्ध मेरो माधो नी आई. इस पंक्तियों का मतलब है बारह बग्वाल चली गई, लेकिन माधो सिंह लौटकर नहीं आए, सोलह श्राद्ध चले गए, लेकिन माधो सिंह का अब तक कोई पता नहीं है. दीपावली पर भी वापस नहीं आने पर गढ़वाल के लोगों ने दीपावली नहीं मनाई. बता दें इगास की कहानी वीर भड़ माधो सिंह भंडारी के आसपास ही है.

तिब्बत पर आक्रमण के दिए थे महाराजा महिपत ने निर्देश

माना जाता है कि करीब 400 साल पहले महाराजा महिपत सिंह शाह को तिब्बतियों से वीर भड़ बर्थवाल बंधुओं की हत्या की जानकारी मिली जिसके बाद वह गुस्से में आ गए. उन्होंने तुरंत इसकी सूचना माधो सिंह भंडारी को दी और तिब्बत पर आक्रमण के आदेश दे दिए. वीर भड़ माधो सिंह ने श्रीनगर, उत्तरकाशी, टिहरी, जौनसार समेत अन्य क्षेत्रों से योद्धाओं को बुलाकर सेना तैयार की और तिब्बत पर हमला कर दिया. इस सेना ने द्वापा नरेश को हराकर उस पर कर निर्धारित कर दिए. इसके साथ ही सीमा पर मुनारे गाड़ दिए. जिनमें से कुछ मुनारे आज भी वहां मौजूद हैं.

तिब्बत विजय को गई सेना की खबर न मिलने से क्षेत्र में पसरा था मातम

इतना ही नहीं मैक मोहन रेखा का निर्धारण करते समय इन मुनारों को सीमा माना गया. इस बीच बर्फ से पूरे रास्ते बंद हो गए. रास्ता ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वीर योद्धा माधो सिंह कुमाऊं-गढ़वाल के दुसांत क्षेत्र में पहुंच गए. तिब्बत विजय को गई सेना की जब कोई खबर नहीं मिली तो पूरा ईलाका शोक में डूब गया. उधर माधो सिंह भंडारी के विरोधियों ने उनके मारे जाने की अफवाह फैला दी. इधर दीपावली आ गई पर वीरों की कोई खबर ना मिल पाने से दीपोत्सव अध्कारमय ही रहा. उधर भंडारी उछ्नंदन गढ़ पहुंच गए और गढ़पति की बेटी उदिना और भंडारी को एक दूसरे को देखते ही प्रेम हो गया.

माधो सिंह की जीत और श्रीनगर लौटने की ख़ुशी में मनाई जाती है इगास

दो दिन बाद गढ़पति की बेटी उदिना का विवाह होना था. विवाह में माधो सिंह भंडारी जौनसारी वीरों को ले नर्तकों के वेश में बारातियों का मनोरंजन करने लगे. उनके तांदी नृत्यों से सभी मन्त्र मुग्ध हो गए. इस खबर पर उदिना भी नृत्य देखने आई और माधो सिंह को पहचान गई. माधो सिंह का ईशारा मिलते ही नृत्य में खिलौना बनी तलवारे चमक उठी और माधो सिंह उदिना को भगा लाए. जब माधो सिंह युद्ध जीत कर वापस श्रीनगर पहुंचे तब उन समस्त क्षेत्र के लोगों ने जिनके वीर इस युद्ध में गए थे ईगास बग्वाल (igas) मनाई.

इगास के दिन खेला जाता है भैलू

इगास बग्वाल में मुख्य आकर्षण भैलू होता है. भैलू जिसका मतलब होता है उजाला करने वाला. इसका एक नाम अंधया भी है. अंध्या का मतलब होता है अंधेरे को मात देने वाला. लोग भैलू खेलते हैं. इसमें चीड के पेड़ लकड़ी का प्रयोग किया जाता है. इसके अन्दर का लीसा काफी देर तक लकड़ी को जलाये रखता है. पहले गांव के लोग मिलकर एक बड़ा भैलू बनाते थे.जिसमें सभी गांव के लोग अपने-अपने घरों से चीड़ की लकड़ी देते थे.


Sakshi Chhamalwan

उत्तराखंड की युवा और अनुभवी पत्रकार साक्षी छम्मलवाण टीवी और डिजिटल मीडिया दोनों में कार्य का अनुभव रखती हैं। वर्तमान में वे खबर उत्तराखंड (khabaruttarakhand.com) से जुड़ी हैं। उत्तराखंड की राजनीतिक हलचल, देश-दुनिया की प्रमुख खबरें और धर्म से जुड़े विषयों पर इनकी रिपोर्टिंग तथ्यपरक और गहन होती है। उत्तराखंड | TV + Digital Media खबर उत्तराखंड
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