उत्तराखंड : त्रिकोणीय बन रहा मुकाबला, किस तरफ झुकेगा पलड़ा

कोटद्वार: चुनावी रण में अब दो दिन ही बाकी रहे गए हैं। सभी सूरमाओं ने पूरी ताकत झोंक दी है। स्टार प्रचारक भी वार-पलटवार कर रहे हैं। कई सीटों पर इस बार अपने दलों से बगावत कर चुनाव मैदान में उतरे बागी मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। सही कारण है कि कई सीटों पर मुकाबला आमने-सामने के बजाय त्रिकोणीय हो गया है। सवाल यह है कि आखिर कार पलड़ा किसती तरफ झुकेगा।

2012 में तत्कालीन सीएम मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी की हार से चर्चाओं में आई कोटद्वार विधानसभा सीट इस बार फिर चर्चाओं में है। इस बार कोटद्वार सीट से उनकी बेटी ऋतु खंडूरी चुनाव मैंदान में हैं। यहां मुकाबला पिता की हार का बदला लेने की तरह दिखाया जा रहा है। लेकिन, भाजपा के बागी पूर्व जिला अध्यक्ष धीरेंद्र चौहान निर्दलीय मैदान में हैं।

इस बार कोटद्वार विधानसभा सीट से 11 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। दोनों राष्ट्रीय दल जहां एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर, शाम, दाम, दंड, भेद की राजनीति और लोक लुभावने वायदे कर मतदाताओं को लुभाने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं, निर्दलीय प्रत्याशी और छोटे दल राष्ट्रीय दलों की नाकामियों को गिनाकर जनसमर्थन जुटाने का प्रयास कर रहे हैं।

मोदी फैक्टर के भरोसे पिता का बदला लेने के लिए कांग्रेस के 72 वर्षीय कद्दावर कांग्रेस नेता व पूर्व मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी को चुनौती दे रही हैं। इस सीट पर भाजपा और कांग्रेस बारी-बारी सत्तासीन रही, लेकिन इस बार त्रिकोणीय मुकाबले के गणित में आम वोटर मौन साधे हुए है, जिससे भाजपा के साथ ही कांग्रेसी खेमे में भी बेचौनी नजर आ रही है।

2012 में इस सीट पर तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी चुनाव हार गए थे। जिसके कारण भाजपा को एकमात्र सीट से सत्ता से बाहर होना पड़ा था। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस छोड़कर पार्टी में आए डा. हरक सिंह रावत को प्रत्याशी बनाया और कांग्रेस से सीट छीन ली। हालांकि तब हरक सिंह रावत ने भी जनरल खंडूड़ी की हार का बदला लेने का मुद्दा उछाला था।

इस सीट पर क्षेत्रवाद और जातिगत समीकरण की हवा ज्यादा बहती है। मैदानी क्षेत्र से यहां बसागत करने वाले मतदाता निर्णायक माने जाते रहे हैं। जिनपर आप प्रत्याशी अधिवक्ता अरविंद वर्मा सेंधमारी कर मुकाबले को चतुष्कोणीय बनाने का प्रयास कर रहे हैं। बसपा के साथ ही अन्य छोटे दल और निर्दलीय प्रत्याशी भी राष्ट्रीय दलों की मुश्किलें बढ़ाते नजर आ रहे हैं।

यह सीट अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय में लैंसडौन में समाहित थी। वर्ष 2002 और 2012 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह नेगी जीते। वर्ष 2007 में भाजपा के शैलेंद्र सिंह रावत और 2017 में भाजपा प्रत्याशी के रुप में डॉ. हरक सिंह रावत यहां चुनाव जीते।

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