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उज्जवला योजना का लक्ष्य अधूरा, आज भी कई रसोई से निकल रहा प्रदूषण, गैस सिलेंडर महंगा मुख्य वजह

केंद्र सरकार ने देश के हर रसोई को धुआं मुक्त करने के लिए 2016 में उज्जवला योजना की शुरूआत की थी। लेकिन आज भी उज्जवला योजना अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाई है। आज भी कई घरों में गैस में खाना न पकाकर चुल्हे में, लकड़ी व उपलों के सहारे खाना पकाया जाता है। लेकिन अगर देश को 2070 तक नेट जीरो यानि कार्बन से मुक्त करना है तो रसोई घरों से निकलने वाले धुएं यानि प्रदूषण को रोकने की आवश्यकता है।

उज्जवला योजना का लक्ष्य अधूरा

बता दें की 2016 में उज्जवला योजना की शुरूआत की गई थी जिसके अंतर्गत योजना का एक मुख्य उद्देश्य महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना और उनकी सेहत की सुरक्षा करना है जिसके लिए उन्हें रसोई में केवल गैस सिलेंडर में खाना पकाने की सलाह दी गई और चुल्हे में, लकड़ी व उपलों के सहारे खाना न बनाया जाए इसके लिए उज्जवला योजना को शुरू किया गया था ताकि महिलाएं रसोई से निकलने वाले धुएं से बच सके। लेकिन य़ोजना शूरू होने के 8 सालों बाद भी आज देश के कई घरों में गैस सिलेंडर का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है।

एलपीजी कनेक्शन का नहीं हो रहा प्रयोग

ऊर्जा उपभोग में बदलाव पर पेट्रोलियम मंत्रालय की सलाहकार समिति की रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण क्षेत्र में आज भी 80 प्रतिशत घरों में एलपीजी कनेक्शन होनें के बावजूद लोग लकड़ी व उपलों के सहारे खाना बनाने को मजबूर हैं। लोगों ने एलपीजी कनेक्शन जरूर लिया है लेकिन वो इसका इस्तेमाल नहीं करते और गैस सिलेंडर को किनारे कर चुल्हे का ही प्रयोग कर रहे हैं।

गैस सिलेंडर महंगा होना मुख्य वजह

बता दें कि लोगों ने उज्जवला योजना का लक्ष्य पूरा न होना और गैस सिलेंडर का प्रयोग न कर चुल्हे में ही खाना पकाने का मुख्य कारण गैस सिलेंडर की अधिक लागत बताया है। उनका कहना है कि गैस सिलेंडर के दाम अधिक है और वो इतना वहन नहीं कर सकते हैं। उन्होनें बताया कि उज्जवला के तहत उन्हें गैस कनेक्शन लेने के समय तो कोई राशि नहीं देनी पड़ती है, लेकिन इसकी लागत उन्हें मासिक किस्त में नकद के तौर पर चुकानी पड़ती है।

ग्रामीण घरों में 4.1 सिलेंडर का प्रयोग

बता दें कि रिर्पोट में कहा गया है कि भारत में अमूमन हर गैस कनेक्शन धारक 6.7 सिलेंडर सालाना इस्तेमाल करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह संख्या कम है। ग्रामीण क्षेत्र में यह संख्या औसतन 6.2 है। हालांकि जिन घरों में दूसरे ईंधन लकड़ी या उपले के सहारे खाना पकाया जाता है वहां भी सिर्फ सालाना 4.1 सिलेंडर ही औसतन इस्तेमाल हो रहे हैं।

हर घर से 32-36 किलोग्राम कार्बन उत्सर्जन

वहीं रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जिन घरों में धुआं निकलता है, वहां प्रतिघर सालाना औसतन 32-36 किलोग्राम कार्बन निकलती है। रिर्पोट के मुताबिक अगर नेट जीरो के लक्ष्य को हासिल करना है तो बिजली से चलने वाले चुल्हों के इस्तेमाल को बढ़ाना पड़ेगा। देश में बिजली की उपलब्धता की स्थिति काफी सुधरी है लेकिन हाल ही के सालों में देखा गया है कि जब बिजली की मांग अचानक बढ़ जाती है तो देश के कई हिस्सों में बिजली की कटौती करनी पड़ती है।

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