अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष : देवभूमि की बेटियां

आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। पूरी दुनिया में 8 मार्च को दुनिया के बहुत से देशों में महिलाओं की उपलब्धि को सराहा जाता है। नारियों ने हमेशा से ही अपने त्यात और बलिदानों से दुनिया में कई उदाहरण पेश किए हैं। वो नारी है हर रुप में समाई है। बेटी बनकर दुनिया में आती है। वक्त के साथ हर रिश्ते को बखूबी निभाती है।

फिर चाहे बेटी का फर्ज़ हो या बहन की ज़िम्मेदारी। यही नहीं पत्नी बनकर किसी और के आंगन को सजाकर उसे संवारने का काम भी करती है। एक नारी का सफर यहीं नहीं थमता बल्कि उम्र के पड़ावों से गुज़रकर वो मां बनकर अपनी दुनिया सजाती है। वो नारी ही है, जो हर परिस्थिति में खुद को ढाल लेती है।

नारी किसी परिवार का ही नहीं बल्कि देश की समृद्धि के लिए भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। नारी देश की आज़ादी के साथ अपने वतन की समृद्ध में हमेशा योगदान देती आई है। कई आंदोलनों का हिस्सा रहने वाली नारी युद्ध के मैदान में दुश्मनों को पछाड़ती आई है।

तो मातृत्व की ज़िम्मेदारी को भी नारियां बखूबी निभाती आई है। नारियों के आन्दोलन में योगदान को लेकर उत्तराखण्ड में ऐसी महिला शख्सियतों की भरमार है। पहाड़ की रीढ़ यहां की महिलाओं को कहा जाता है और ये सिर्फ तमगा भर नहीं है बल्कि पहाड़ की महिलाओं ने खुद को साबित किया है।

यहां कि महिलाएं दुश्मन को झुकाने का भी दम भरती आई है। दुश्मन को झुकाने के लिए वीरांगना तीलू रौतेली ने अपनी उम्र को भी आड़े नहीं आने दिया। महज़ पंद्रह साल की उम्र में रणभेरी मे उतरी तीलू रौतेली ने सात साल तक दुश्मन राजाओं को कड़ी चुनौती दी। 17वीं शताब्दी मे रणभेरी में उतरी तीलू रौतेली ने 13 गढ़ों पर जीत हासिल की और अंत में अपने प्राणों की आहुति देकर वीरगति को प्राप्त हो गई। कहा जाता है कि वीरगति के वक्त भी तीलू रौतेली ने हार नहीं मानी थी।

जब वो दुश्मन को पारजित कर लौट रही थी। उस दौरान युद्ध से थकी तीलू ने कांडा गांव के पास नयार नदी पर पानी के श्रोत को देख आराम करने की सोची। नदी के पानी से प्यास बुझा रही तीलू पर उसी वक्त एक कन्त्यूरी सैनिक ने हमला कर दिया।

निहत्थी तीलू ने हमले का जवाब देते हुए अपनी कटार से दुश्मन को यमलोक भेजने के साथ खुद भी वीरगति को प्राप्त कर गई। आज इतिहास के पन्नो में वीरांगना तीलू रौतेली दुनिया की पहली एक मात्र सबसे कम उम्र की वीरांगना मे शुमार है और तीलू रौतेली के नाम से शूरवीर वीरांगानाओं को आज भी सम्मानित किया जाता है।

इतिहास के पन्नों में पहाड़ी राज्य उत्तराखंड की और भी महिलाओं की वीरगाथाएं लिखी हुई हैं। जिन्होंने अपने बलिदान और योगदान से राज्य के गौरव को बढ़ाया और सुरक्षित किया। प्रकृति को संजोए रखने के लिए गौर देवी ने अपने प्राणों की भी प्रवाह नहीं की। चिपको आंदोलन से पूरी दुनिया के लिए मिसाल बना और आज भी दुनियाभर में उस आंदोलन से लोग प्रेरणा ले रहे हैं।

प्रकृति को संजोए रखने। देवदार के वृक्ष को बचाने के लिए 1974 में घर की दहलीज़ से निकली गौरा देवी ने अपने प्राणों का ख्याल न करते हुए अपनी आवाज़ को बुलंद किया। उनकी आवाज़ के साथ 2 हजार 500 वृक्षों को बचाने के लिए काफला भी जुड़ता चला गया। समझाकर भेद वृक्षों का। देवदार की खड़ी लटा को गौरा देवी ने बचा लिया।

प्रकृति का मूल्य देश के साथ दुनिया को भी गौरा देवी ने समझा दिया। चिपको आंदोलन के 10 साल गुजर जाने के बाद किसी कार्यक्रम में गौरा देवी के दिए गए इंटरव्यू मे वो ये कहती दिखी। भाइयों ये जंगल हमारी माता का घर है। यहां से हमें फल फूल सब्जियां मिलती है। अगर पेड़ पौधे काटोगे, तो निश्चित ही बाढ़ आएगी। लोगों को प्रकृति से प्रेम करना गौरा देवी ने ही सिखाया।

आज भले ही तीलू रौतेली, गौरा देवी ना हों। लेकिन, उनका अस्तित्व हर महिला मंे मौजूद है। महिलाएं आज पुरुषों से कम नहीं हैं। इस बात से हम सब वाकिफ हैं, लेकिन महिलाओं का सम्मान जरुरी है। ये बात जानने की जरूरत है कि किसी भी देश और राज्य के विकास में महिलाएं रीढ़ होती हैं और उत्तराखंड की महिलाएं तो स्वरोजगार के माध्यम से अपना योगदान देती आई हैं। देवभूमि की बेटियों ने देश ही नहीं, दुनियाभर में अपना लोहा मनवाया है।

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