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रिटायर्ड इंजीनियर ने किया कमाल, सिर्फ एक कमरे में उगाया कश्मीरी केसर

नॉएडा में रहने वाले 64 वर्षीय रमेश गेरा ने कमाल कर दिया। रमेश ने मिट्टी रहित हाइड्रोपोनिक्स की तकनीक की मदद से केसर उगाया है।

रिटायर्ड इंजीनियर ने किया कमाल

रमेश नॉएडा सेक्टर-63 में रहते है। वहां उन्होंने अपने 10 बाई 10 के कमरे में केसर उगाया। रमेश ने कश्मीर से बीज मगाए। तीन से चार महीने लगते है कैंसर को तैयार होने में। उन्होंने उसके बाद केसर के बल्ब को ग्रो बैग में रख दिया। जिससे दोबारा बीज तैयार होते है।

नवंबर से जुलाई के बीच कैसर के बीज तैयार हो जाते है। इसके बाद हाइड्रोपोनिक्स तकनीक की मदद से अगस्त से नवंबर तक केसर पैदा किए। रमेश ने बताया की केसर की कीमत थोक मार्केट में 2.40 लाख रुपये प्रति किलो है। तो वहीं फुटकर में केसर की कीमत 3.50 लाख प्रति किलो है।

दक्षिण कोरिया जाने का मिला था मौका

सेक्टर-25 जलवायु विहार में रहने वाले इलेक्ट्रिकल इंजीनियर रमेश गेरा मूल रूप से हरियाणा के हिसार के रहने वाले है। उनका एक बेटा और एक बेटी है। बेटा विदेश में रहता है तो वहीं बेटी मुंबई। 6 साल पहले उनकी पत्नी का बीमारी की वजह से निधन हो गया था। 2017 में रमेश रिटायर हो गए थे। नौकरी के समय उन्हें दक्षिण कोरिया जाने का मौका मिला था। जहां उन्होंने बहुस्तरीय मिट्टी रहित खेती देखी।

जिसमें माइक्रोग्रीन्स, हाईड्रोपोनिक खेती और इंडोर केसर शामिल है। तब उन्होंने सोचा की देश लौटने पर ऐसा कुछ करेंगे। जिसके बाद उन्होंने कैसर उगाने का सोचा। केसर के उत्पादन के लिए उन्होंने 6 लाख रूपए खर्च किए। रमेश ने बताया की देश में केसर की बहुत मांग है।

60 मीट्रिक टन प्रति वर्ष की मांग में केवल 21 मीट्रिक टन केसर का ही उत्पादन होता है। इस बीच के गैप को पूरा करने के लिए भारत ईरान से केसर इम्पोर्ट करता है। जिसकी वज़ह से केसर बहुत महंगा हो जाता है।

5 डिग्री तक रखना पड़ता है कमरे में तापमान

रमेश ने बताया की कमरे का तापमान 5 डिग्री सेल्सियस तक होना चाहिए। केसर के बल्ब कश्मीर से मंगवाए जाते है। जिसकी वजह से केसर कश्मीर के ब्रांड मोगरा की तरह अच्छा होता है। केसर का फूल खिलने में लगभग तीन महीने लगते है। जिसके बाद छठे महीने में फूल उगते है। इसके बाद केसर को काटा जाता है।

लोगों को देते हैं ट्रेनिंग

रमेश केसर के उत्पादन के साथ साथ लोगों को केसर उगाने की ट्रेनिंग भी देते है। वो ऑनलाइन ट्रेनिंग बैच
लेते है। जिसमें देश विदेश से लोग उनसे ट्रेनिंग लेते है। रमेश अपने एक बैच में10 से ज्यादा लोगों को नहीं रखते।

इंजीनियर के लिए कोई काम नहीं है मुश्किल

मीडिया ने जब उनसे पुछा की उन्होंने इंजीनियर होकर केसर का उत्पाद करने का कैसे सोचा। इसके जवाब में उन्होंने कहा की एक इंजीनियर हर काम कर सकता है। उन्होंने बताया की रिटायरमेंट के बाद उन्होंने सोचा था की वो कुछ अलग करेंगे।

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