SC का आदेश: बनभूलपुरा में रेलवे की जमीन से हटेगा अतिक्रमण, सियासी समीकरण बदलने की उम्मीद

उत्तराखंड के सबसे चर्चित हल्द्वानी बनभूलपुरा मामले में अब तस्वीर लगभग साफ होने लगी है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि बनभूलपुरा में रेलवे की जमीन है और उस पर रहने वाले लोग ये तय नहीं कर सकते हैं कि वो वहां रहेंगे और रेलवे लाइन कहीं और बिछाई जाएगी।
सर्वे के बाद बनभूलपुरा से हटाया जाएगा अतिक्रमण
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक तरह से दरियादिली वाला रास्ता अख्तियार किया है। चूंकि जिस विवादित जमीन को लेकर ये मामला चल रहा है उस पर तकरीबन पचास हजार से अधिक लोग रह रहे है। ऐसे में एकदम से इन्हे नहीं हटाया जा सकता है। लिहाजा कोर्ट ने इसे चरणबद्ध तरीके से करने का रास्ता अपनाया है। SC ने कोशिश की है कि कोई भी बेघर न हो और इसीलिए स्थानीय राजस्व अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वो इस इलाके में रहने वालों का सर्वे करें।
SC ने राजस्व अधिकारियों को ये भी आदेश दिए हैं कि ये देखें कि इस इलाके में कौन-कौन ऐसे पात्र परिवार हैं जिन्हें पीएम आवास योजना के तहत घर उपलब्ध कराया जा सकता है। उन्हें घर देने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। कोर्ट ने यहां तक कहा है कि जो लोग विस्थापित होंगे उन्हे छह महीने तक प्रतिमाह दो हजार रुपए की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।
ये है पूरा मामला
आपको बता दें कि ये पूरा मामला हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके में रेलवे की 29 एकड़ जमीन से जुड़ा हुए है। इस जमीन पर 4500 से ज्यादा अवैध घर बने हुए हैं। यहां अंदाजन 5000 से ज्यादा परिवार यानी लगभग 50 हजार लोग दशकों से रहते आ रहे हैं। इस जमीन पर विवाद तब शुरू हुआ जब रेलवे ने ट्रैक विस्तार और अपने कुछ अन्य प्रोजेक्टस के लिए इस जमीन को रिक्लेम करना शुरू किया और कब्जेधारियों को कब्जा हटाने के नोटिस दिए। जिसके चलते 2007 में ये मामला नैनीताल हाईकोर्ट पहुंचा था।
2013 में गौला नदी खनन से जुड़ी याचिका में भी ये मुद्दा एक बार फिर उभरा। हाईकोर्ट ने वर्ष 2016 में रेलवे को दस हफ्तों में अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए, लेकिन अतिक्रमणकारियों और प्रदेश सरकार ने उस जमीन को नजूल भूमि बताकर कार्रवाई रोकने की कोशिश की। जनवरी 2017 में हाईकोर्ट ने यह दावा खारिज कर दिया।
अतिक्रमणकारियों और राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के निर्देशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में सभी पक्षों को हाईकोर्ट में अपने दावे पेश करने के निर्देश दिए, लेकिन स्थिति जस की तस बनी रही। मार्च 2022 में एक और जनहित याचिका दाखिल की गई, जिसमें रेलवे पर कार्रवाई न करने का आरोप लगाया गया। हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद अतिक्रमण नहीं हटाया गया।
लोग तय नहीं कर सकते कि रेलवे लाइन कहां बिछनी चाहिए: CJI सूर्यकांत
बाद में ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने भी एक तरह से यहां से अतिक्रमण हटाने की बात पर मुहर लगा दी है।सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि ‘उनसे वहीं रहने के लिए क्यों कहा जाए, जबकि बेहतर सुविधाओं वाली कोई दूसरी जगह हो सकती है। किसी भी बड़े प्रोजेक्ट के लिए दोनों तरफ खाली जगह की ज़रूरत होती है। वहां रहने वाले लोग यह तय नहीं कर सकते कि रेलवे की लाइन कहां बिछानी चाहिए।
19 मार्च के बाद शुरू होगा सर्वे
वहीं जस्टिस जटयमाल्या बागची ने कहा की ‘इसमें कोई शक नहीं है कि यह राज्य की ज़मीन है और ज़मीन का इस्तेमाल कैसे करना है, यह तय करना राज्य का अधिकार है। बस एक बात है कि मिस्टर भूषण के क्लाइंट वहां रह रहे हैं और अब मुद्दा यह है कि जब उन्हें जाने के लिए कहा जाएगा, तो उनका पुनर्वास कैसे किया जाएगा ताकि उन्हें कुछ सहारा मिल सके। हमारी पहली नज़र में यह मदद ज़्यादा है और अधिकार कम।’ SC ने आदेश दिया कि 19 मार्च के बाद एक सर्वे शुरू किया जाए जिसके बाद पीएम आवास योजना के तहत इन्हें घर दिए जाएंगे।
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बनभूलपुरा में है कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक
हल्द्वानी का ये बनभूलपुरा मामला सिर्फ जमीन का नहीं बल्कि सियासत का भी है। ये पूरा इलाका मुस्लिम बहुल इलाका माना जाता है। कांग्रेस का बड़ा वोट बैंक भी है। कांग्रेस के स्थानीय विधायक सुमित ह्दयेश भी अतिक्रमण हटाये जाने का विरोध करते रहे हैं। माना जा रहा है कि बनभूलपुरा का अतिक्रमण हटने के बाद यहां सियासी समीकरण बदल सकता है। हालांकि स्थानीय लोग इस फैसले से संतुष्ट नजर आ रहे हैं। कई लोगों का कहना है कि रेलवे भूमि से हटाए जाने के बाद उन्हें पीएम आवास योजना के तहत घर तो मिल ही जाएगा।