उत्तराखंड में सालों की राजनीति में नहीं टूटे ये मिथक, कई मंत्रियों के अरमानों पर फिरा पानी

देहरादून – उत्तराखंड की सियासत में सत्ता परिवर्तन को लेकर कई मिथक है, जो इन 20 सालों के राजनीतिक दौर में कभी नहीं टूटे हैं। हर दल ने इन चुनावी मिथक को तोड़ने की पुरजोर कोशिशें की लेकिन सियासी दल और नेताओं के प्रयासों के बावजूद मिथक नहीं टूटते हैं. एक मिथक सीएम आवास को लेकर भी है कि जो सीएम वहां रहा वो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। त्रिवेंद्र रावत के इस्तीफे के बाद इसको जोर मिला। कई मंत्रियों के अरमानों पर पानी फिरा। कई मंत्रियों ने और उनकी सरकार ने दावा किया कि वो फिर सत्ता हासिल करेंगे लेकिन मिथक ने ये नहीं होने दिया।

वहीं बता दें कि उत्तराखंड की सालों की राजनीति में एक और मिथक है जो की सालों से बरकरार है वो है शिक्षा मंत्री को लेकर। बता दें कि 2022 के विधानसभा चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने चुनावी मैदान में अपनी अपनी सेनाएं उतार दी है.. जहां एक तरफ सत्ता में वापसी के लिए भाजपा जीजान से जुटी हुई है तो वहीं सत्ता परिवर्तन के ख्वाब देख रही कांग्रेस भी सत्ता पर काबिज होने के लिए हर हथकंडे अपना रही है लेकिन इन सबके बीच उत्तराखंड की राजनीति में कुछ ऐसे मिथक जुड़े हुए हैं जो हर कोशिश पर पानी फेर देते हैं और एक ऐसा ही मिथक है शिक्षा मंत्री से जुड़ा।

उत्तराखंड की राजनीति में सालों से एक मिथक बरकरार

दरअसल विधानसभा चुनाव में शिक्षा मंत्री को लेकर एक मिथक बरकरार है. माना जाता है कि जो जिस सरकार में शिक्षा मंत्री रहा है, वह दोबारा चुनाव नहीं जीता. बात अगर साल 2000 की करें तो तब भाजपा सरकार में तीरथ सिंह रावत शिक्षा मंत्री बने थे, लेकिन राज्य गठन के बाद 2002 में उत्तराखंड में पहले विधानसभा चुनाव में तीरथ सिंह रावत हार गए थे. इसके बाद 2002 में एनडी तिवारी की सरकार में नरेंद्र सिंह भंडारी शिक्षा मंत्री बने लेकिन जब 2007 में विधानसभा चुनाव हुआ तो वो चुनाव हार गए थे और फिर 2007 में गोविंद सिंह बिष्ट और खजान दास शिक्षा मंत्री बने थे लेकिन दोनों ही 2012 में विधानसभा चुनाव हार गए जिसके बाद 2012 में कांग्रेस सत्ता में आई और देवप्रयाग विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने मंत्री प्रसाद नैथानी को शिक्षा मंत्री बनाया गया था लेकिन वो भी 2017 में चुनाव हार गए जिसके बाद 2017 में भाजपा की सरकार आई और फिर अरविंद पांडेय शिक्षा मंत्री बने।

वहीं बता दें कि राज्य गठन के बाद इन 20 सालों के राजनीतिक में नजर डाली जाए तो इनमें से दोबारा सत्ता में कोई भी शिक्षा मंत्री अपनी वापसी नहीं कर पाया है, जिसे देखकर यही लगता है की इन मिथकों को तोड़ना मुश्किल है, हालांकि राजनीति जानकारों की मानें तो ये सिर्फ एक संयोग है. ऐसे में इस बार देखना दिलचस्प ये होगा की 2022 के चुनाव में वर्तमान सरकार में शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय इस मिथक को तोड़ पाएंगे या नहीं, क्योंकि भाजपा हर मितक को तोड़ने का दावा कर रही है..

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