उद्घाटन से पहले अटका दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे!, एक मकान बना 12 हजार करोड़ के प्रोजेक्ट की रुकावट

दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे अपने आखिरी चरण में है। 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक्सप्रेसवे का उद्घाटन करने के लिए उत्तराखंड पहुंच रहे हैं। लेकिन उद्घाटन से ठीक पहले गाजियाबाद के लोनी क्षेत्र के मंडोला गांव में बना एक दो मंजिला मकान ‘स्वाभिमान’ इस हाई-प्रोफाइल प्रोजेक्ट के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया है।
उद्घाटन से पहले अटका दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे!
दरअसल, यह मकान एक्सप्रेसवे के मुख्य रैंप के ठीक बीच में स्थित है। ऐसे में यहां से गुजरने वाले वाहनों को दिक्कत हो सकती है और ट्रैफिक मूवमेंट प्रभावित होने की आशंका है। यही वजह है कि संबंधित एजेंसियां वैकल्पिक व्यवस्था में जुटी हैं। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने इस समस्या से निपटने के लिए मकान के पीछे से एक वैकल्पिक सड़क विकसित करना शुरू कर दिया है। दावा किया जा रहा है कि उद्घाटन से पहले यह सड़क तैयार कर ली जाएगी, हालांकि फिलहाल निर्माण कार्य जारी है।
28 साल पुराना है मकान विवाद
बता दें यह मकान स्वर्गीय वीरसेन सरोहा के परिवार का है, जो बीते लगभग तीन दशकों से कानूनी लड़ाई में उलझा हुआ है। विवाद की शुरुआत साल 1998 में हुई थी, जब उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद ने मंडोला हाउसिंग स्कीम के तहत आसपास के छह गांवों की करीब 2614 एकड़ जमीन अधिग्रहित करने की प्रक्रिया शुरू की थी। उस समय 1100 रुपए प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा तय किया गया था।
वीरसेन सरोहा ने खटखटाया अल्लाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा
ज्यादातर किसानों ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, लेकिन वीरसेन सरोहा ने इसका विरोध करते हुए अल्लाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने उनके मकान के अधिग्रहण पर रोक लगा दी। बाद में जब दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे की योजना बनी, तो आवास विकास परिषद ने यह जमीन एनएचएआई को सौंप दी, लेकिन यह मकान विवाद के कारण वहीं का वहीं रह गया।
1600 वर्ग मीटर जमीन बनी अड़चन
एनएचएआई को रैंप पूरा करने के लिए करीब 1600 वर्ग मीटर जमीन की जरूरत है, लेकिन विवाद के चलते यह जमीन अभी तक अधिग्रहित नहीं हो सकी है। बताया जा रहा है कि मकान करीब 1000 वर्ग मीटर में बना है, जबकि 600 वर्ग मीटर अतिरिक्त जमीन भी इससे जुड़ी है।
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मौजूदा बाजार दर के हिसाब से मुआवजे की मांग कर रहा परिवार
परिवार की सदस्य पूजा नेहरा का कहना है कि शुरुआत में यहां सर्विस लेन का कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन बाद में प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए यहां जबरन एग्जिट जोड़ा गया। उनका आरोप है कि पहले एक आदेश में आवास विकास परिषद ने इस मकान को अधिग्रहण से बाहर रखा था, लेकिन बाद में वही जमीन NHAI को दे दी गई। परिवार अब मौजूदा बाजार दर के हिसाब से मुआवजे की मांग कर रहा है।
दून से आने वाले वाहनों को एक्सप्रेसवे से उतरने में हो सकती है परेशानी
बता दें यह विवादित हिस्सा लोनी-मंडोला के पास स्थित है, जहां दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे और ईस्टर्न पेरीफेरल एक्सप्रेसवे का महत्वपूर्ण इंटरचेंज भी है। ऐसे में मुख्य रैंप अधूरा रहने से देहरादून की ओर से आने वाले वाहनों को एक्सप्रेसवे से उतरने में परेशानी हो सकती है।एनएचएआई जिस वैकल्पिक सड़क का निर्माण कर रहा है, वह एक सर्विस रोड के तौर पर काम करेगी। हालांकि इसकी चौड़ाई और क्षमता मुख्य एक्सप्रेसवे के मुकाबले कम होगी, जिससे ट्रैफिक पर दबाव बढ़ सकता है।
SC तक पहुंचा मामला
वीरसेन सरोहा के निधन के बाद अब उनके पोते लक्ष्यवीर इस केस की पैरवी कर रहे हैं। साल 2024 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि जब मूल हाउसिंग प्रोजेक्ट कभी शुरू ही नहीं हुआ, तो जमीन को NHAI को सौंपना गलत है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के जल्द निपटारे के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच को निर्देश दिए हैं। उद्घाटन से पहले अस्थायी समाधान तो तैयार हो रहा है, लेकिन स्थायी हल अभी भी अदालत के फैसले पर टिका है।