उत्तराखंड: क्या संविधान से बड़े हो गए पुष्कर सिंह धामी?

देहरादून: समान नागरिक संहिता यानी (यूनिफॉर्म सिविल कोड) का अर्थ होता है, भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून। चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। लेकिन, सवाल यह है कि जिस कानून को बनाया ही नहीं जा सकता, जिसमें कई तरह की संवैधानिक और कानूनी अड़चनें पहले से ही हैं, ऐसे में किसी राज्य का मुख्यमंत्री कैसे इस तरह के सार्वजनिक बयान दे सकता है। यह इसलिए भी संभव नहीं है कि फिलहाल देश में अलग-अलग पर्सनल लॉ भी काम कर रहे हैं। कोई एक कानून बनाने के लिए पहले संविधान संशोधन कर उन कानूनों को समाप्त करना होगा।

हालांकि, राज्यों को इसका अधिकार दिया गया है, लेकिन संविधान में ही उस अधिकार को प्रतिबंधित भी किया गया है। संविधान में कई ऐसे प्रावधान और अधिकार हैं, जिसके तहत इसे लागू करना आसान नहीं है। सुप्रीकोर्ट में भी इस तरह की गई याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं, जिनको शीर्ष अदालत खारिज कर चुकी है।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर पुष्कर सिंह धामी ने यह बयान किस आधार पर दिया है। क्या वे संविधान से बड़े हो गए या फिर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में दिए गए निर्देशों और फैसलों को नहीं मानते हैं। बड़ा सवाल यह भी है कि यह बयान चुनाव में ही क्यों आया। इससे पहले मुख्यमंत्री ने कभी इस तरह की बात क्यों नहीं कही।

संवैधानिक चुनौतियां
संविधान हमें धर्म की स्वतंत्रता, समानता के अधिकार के तहत देता है। अगर यूनिफॉर्म कॉमन सिविल कोड लागू किया जाता है, तो इस अधिकार का अतिक्रमण होता है। इसके लिए जरूरी है कि संविधान में संशोधन करना होगा, जो इतना आसान नहीं है। इसके अलावा अनुच्छेद-25 में धर्म के मौलिक अधिकार का उल्लेख है। अनुच्छेद 26 (बी) में कहा गया है कि प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय के अधिकार को धर्म के मामलों में अपने स्वयं के मुद्दों का प्रबंधन करने का अधिकार है।

अनुच्छेद 29 में एक विशिष्ट संस्कृति के संरक्षण का भी अधिकार है। सभी अधिकार अनुच्छेद 14 और 15 के तहत कानून के संरक्षण से पहले समानता के साथ टकराव में पड़ जाते हैं। इसके अलावा, अनुच्छेद 25 के तहत, धर्म की एक व्यक्ति की स्वतंत्रता ष्सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है। सवाल यह है कि जब संविधान ने पहले ही यह अधिकार दिए हुए हैं, फिर सीएम धामी कौन सी संस्कृति संरक्षण की बात कर रहे हैं।

इसी कॉमन यूनिफॉर्म विसिल कोड को लेकर 2018 में, भारत के विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट भी दी थी। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड न तो आवश्यक है और न ही इस स्तर पर इसमें कुछ करने की जरूरत है। यह निर्दिष्ट करता है कि धर्मनिरपेक्षता देश में व्याप्त अनेक भेद के साथ विचरण नहीं कर सकती है।

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने यह कहा था
संविधान सभा में प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान निर्माण के वक्त कहा था कि समान नागरिक संहिता अपेक्षित है, लेकिन फिलहाल इसे विभिन्न धर्मावलंबियों की इच्छा पर छोड़ देना चाहिए। इस तरह, संविधान के मसौदे में आर्टिकल 35 को अंगीकृत संविधान के आर्टिकल 44 के रूप में शामिल कर दिया गया और उम्मीद की गई कि जब राष्ट्र एकमत हो जाएगा तो समान नागरिक संहिता अस्तित्व में आ जाएगा।

डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में दिए गए एक भाषण में कहा था, किसी को यह नहीं मानना चाहिए कि अगर राज्य के पास शक्ति है तो वह इसे तुरंत ही लागू कर देगा। संभव है कि मुसलमान या इसाई या कोई अन्य समुदाय राज्य को इस संदर्भ में दी गई शक्ति को आपत्तिजनक मान सकता है। मुझे लगता है कि ऐसा करने वाली कोई पागल सरकार ही होगी। संविधान के भाग चार में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत का वर्णन है।

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