15 अगस्त पर मुख्य सचिव ने पिला दी नौकरशाही को कड़वी दवा, काम चलाऊ काम की प्रवृत्ति पर प्रहार

ss sandhu

 

देहरादून। जश्न ए आजादी के मौके पर राज्य के मुख्य सचिव डा. एसएस संधु ने जिन नसीहतों के कड़वे घूंट सचिवालय के अधिकारियों को पिलाए वो अगर थोड़ा भी असर दिखा पाए तो समझिए कि इस सूबे की नौकरशाही की रगों में दौड़ते ‘टालु टाइप काम’ करने का रोग बिन बूटी भाग जाएगा।

15 अगस्त को सचिवालय में राज्य के मुख्य सचिव एसएस संधु ने जो व्यक्त्व दिया वो राज्य के इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

एसएस सिंधु ने खुले मंच से अधिकारियों की चिड़िया बैठाने की आदत को कठघरे में ले लिया। एसएस सिंधु ने तिरंगा फहराने के बाद जब बोलना शुरु किया तो अधिकारी सन्न सुनते रहे। एक एक कर सचिवालाय के कमरों में फाइलों के नीचे दबा सच सामने आने लगा।

एसएस संधु कहते रहे और अधिकारी कर्मचारी सुनते रहे। अब ये भी समझ में आने लगा कि आखिर सीएम पुष्कर सिंह धामी ने क्यों एसएस संधु का चयन राज्य से सबसे ताकतवर अफसर के तौर पर किया है।

सचिवालय में तय समय पर राष्ट्रध्वज तिरंगा फहराने के बाद मुख्य सचिव सुखबीर सिंह संधू आज अपनी लय में थे। उन्होंने नौकरशाही और लालफ़ीताशाही को निशाने पर लिया और कड़ी नसीहत भी दी।

संधू ने कहा जब हम आजादी की बात सोचते है तो जहन में देश का क्षेत्रफल उभरता है, लेकिन ये महज एक क्षेत्रफल का नक्शा है जो बेहद जरूरी है, जवान सीमा की रक्षा करते है तो हम निश्चित रहते है, लेकिन देश बनता है देश के नागरिको से, जब देश भक्ति की बात आती है तो हम इन नागरिको को भूल जाते है, इन नागरिको की सेवा भी देश सेवा है। हर किसी के सामने दो विकल्प होते है एक आसान और दूसरा कठिन, ह्यूमन नेचर के कारण ज्यादातर लोग आसान विकल्प चुनते है।

लेकिन कुछ लोग है जो कठिन विकल्प पर काम करते है। इसी तरह से गुलामी के दौर में भी बहुत लोगों ने आसान विकल्प का चयन कर जागीरें ले ली और जागीरदार बन गए, लेकिन कुछ लोगों ने बड़े और संपन्न घरानों से होने के बावजूद घरबार छोड़कर कठिन विकल्प चुनते हुए देश की लड़ाई लड़ी। उन्हें उस वक़्त आतंकवादी भी कहा गया। लेकिन इन्हें हम फ्रीडम फाइटर कहते है।

आपके पास दो ऑप्शन हैं 

एसएस संधु ने अधिकारियों को याद दिलाया कि आखिर आजादी क्यों चाहिए थी और आजाद मुल्क के नागरिक अधिकारियों से क्या चाहते हैं। एसएस संधु ने सार्वजनिक रूप से कहा कि सचिवालय राज्य का सबसे बड़ा सरकारी कार्यालय है। यहां जब फाइलों को डील करते हैं उस समय हमारे पास दो ऑप्शन होते हैं। एक ईजी ऑप्शन है दूसरा डिफिकल्ट ऑप्शन है।

ईजी ऑप्शन है कि जनकल्याण से जुड़े किसी प्रस्ताव से जुड़ी फाइल दौड़ी तो कोई नियम आड़े आने लगा और किसी अफसर ने फाइल पर उस नियम का जिक्र कर दिया तो सभी अधिकारी उसी तरह की टिप्पणी लिखते जाते हैं। ये कोई नहीं देखता कि एक नियम की वजह से जनकल्याण से जुड़ा कितना बड़ा प्रस्ताव अमल में नहीं आ पाया।

मुख्य सचिव एसएस संधु ने डिफिकल्ट ऑप्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि अधिकारी चाहें तो जनता के कल्याण के लिए बने प्रस्ताव के आड़े आ रहे नियम को बदलने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए मेहनत करनी पड़ेगी।

एसएस संधु का ये बयान अपने आप में बेहद अहम माना जा सकता है। उत्तराखंड में अफसरों की कार्यशैली हमेशा से सवालों के घेरे में रही है। हालात ये रहे हैं कि राज्य में अफसरशाही को जनता की चुनी हुई सरकार पर हावी कहने में भी गुरेज नहीं होता है।

ऐसे में अधिकारी स्वयं कल्याण पर अधिक फोकस रहते हैं और राज्य की जनता कोे कल्याण की योजनाओं को अपने कंफर्ट के हिसाब से ही देखते हैं।

मुख्य सचिव एसएस संधु संभवत: उत्तराखंड की अफसरशाही के इस रोग को समझ चुके हैं और 15 अगस्त की ऐतिहासिक तारीख को उन्होंने इस मर्ज की रग पर हाथ भी रख दिया है। अब इंतजार कीजिए कि ये मर्ज जल्द दूर हो सके।

मुख्य सचिव के बयानों का पूरा वीडियो नीचे देखिए –

 

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