उत्तराखंड की वो पांच जगहें, जिनसे जुड़ा है जंग-ए-आजादी का इतिहास

क्या आप जानते हैं भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उत्तराखंड की अहम भूमिका रही है। चलिए आज हम आपको उत्तराखंड की उन पांच जगहों से रुबरु करवाते हैं जो जुड़ी हैं हमारे जंग- ए- आजादी के इतिहास से।
दुगड्डा
क्या आप जानते हैं की भारत के अमर शहीदों में से एक चंद्रशेखर आजाद उत्तराखंड आए थे, जी हां पौड़ी में एक जगह दुगड्डा पड़ती है जहां सन् 1930 में आजादी की जंग के समय चंद्रशेखर आजाद ने अपने साथियों के साथ आकर शस्त्र प्रशिक्षण लिया था। बताया जाता है कि एक बार दुगड्डा रेंज में बसे एक जंगल में जब चंद्रशेखर आजाद निशाना लगाने का अभ्यास कर रहे थे तब उनके साथियों ने उनसे आग्रह किया कि ये जो सामने पेड़ है इसके छोटे पत्ते पर निशाना साध कर फायर कीजिए। चंद्रशेखर ने फायर किया लेकिन वो पत्ता हिला तक नहीं उनके साथियों ने समझा की निशाना चूक गया है और जब वो पेड़ के पास गए तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गई उन्होंने देखा की चंद्रशेखर द्वारा चलाई गई गोली पत्ते को भेदती हुई पेड़ के तने में धंस गई है और उस दिन इस पेड़ पर आजादी की अचूक निशानेबाजी का प्रमाण हमेशा के लिए छप गया।
खारा खेत
आपने नाम सुना होगा ड़ाडी यात्रा के नमक सत्याग्रह का लेकिन क्या आप जानते हैं की नमक सत्याग्रह की जड़े उत्तराखंड से भी जुड़ी है आइए आपको बताते हैं उत्तराखंड के नमक सत्याग्रह का वो किस्सा। ये वो दौर है जब भारत में अंग्रेजी सरकार ने नमक पर कर लगा दिया था तब महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह शुरु किया। इस नमक सत्याग्रह की लपटें सिर्फ मैदानों तक ही नहीं सीमित रही बल्कि उत्तराखंड के पहाड़ों की हसीन वादियों तक भी पहुंची। 3 मई 1930 ये वो दिन था जब उत्तराखंड के खारा खेत नाम के गांव की तरफ एक हुजूम निकल पड़ा सत्याग्रह की अग्नि सीने में समाए अब इस अग्नि को सिर्फ नून नदी ही शांत कर सकती थी। नून यानी की नमक वैसे तो माना जाता है की लूनी नदी एक मात्र खारे पानी की नदी है लेकिन कुछ ही लोगों को पता है की उत्तराखंड की नून नदी का पानी भी खारा ही है। नून नदी के पास पहुंच कर सत्याग्रहीयों ने सबसे पहले बड़े-बड़े चूल्हे लगाए फिर कुछ सत्याग्रही जाकर नून नदी से पानी भर कर लाए और उन चुल्हों नें पानी गर्म कर इसी नून नदी के तट पे नमक बनाया गया जो ब्रिटिशरस के मुंह पे सिधा तमाचा था, आज नून नदी और यहां के सत्याग्रहियों की कहानी इतिहास के पन्नों में तक ही सिमट कर रह गई है।
कौसानी
क्या आपने कौसानी का नाम सुना है हां ये वही जगह है जिसे महात्मा गांधी ने भारत के स्विट्जडरलैंड की उपमा दी थी। आजादी के आंदोलन में इस जगह ने भी अहम रोल अदा किया है। आजादी के आंदोलन के दौरान कई बुद्धिजीवी क्रांतिकारी उत्तराखंड की यात्रा में आए उन्हीं में से एक थे महात्मा गांधी। महात्मा गांधी जब उत्तराखंड में जगह-जगह जाकर आजादी कि अलख जगा रहे थे तब वो कौसानी पहुंचे। कौसानी के प्राकृतिक सौदर्य ने महात्मा गांधी का मन इस कदर मोहा की गांधी ने इसे भारत के स्विट्ज़रलैंड की संज्ञा दे दी और यहां अनाशक्ति आश्रम भी स्थापित किया ।
अल्मोडा डिबेटिंग क्लब
क्या आप जानते हैं की अल्मोड़ा के एक कल्ब का भी आजादी कि लड़ाई में अहम योगदान है।
सन 1870 में अल्मोड़ा में आजादी कि चिंगारी को आग देने वाला एक कल्ब स्थापित किया गया जिसका नाम रखा गया डिबेटिंग क्लब। जब संयुक्त प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर विलियम मयूर अल्मोड़ा आए। अल्मोड़ा आते ही उनको अल्मोड़ा के डिबेटिग क्लब में आमंत्रित किया गया जहां बुद्धि बल्लभ पंत ने उनके सामने अपना समाचार पत्र प्रकाशित करने की इच्छा जाहिर की जिसे सर मयूर ने काफी सराहा और बुद्धि बल्लभ पंत को समाचार पत्र प्रकाशित करने के लिए प्रोत्साहित भी किया। सर मयूर का प्रोत्साहन सन 1871 में रंग लाया जब अल्मोड़ा के प्रीटिंग प्रेस से एक अखबार छपा जिसे आज भारत के द्वितीय और कुमाऊँनी के प्रथम अखबार के रुप में जाना जाता है और इस अखबार का नाम था अल्मोड़ा अखबार। इस अखबार ने आजादी के आंदोलन में बहुत महत्वपूर्ण रोल अदा किया लेकिन अंग्रेजों की साजिशों के चलते ये अखबार भी बंद हो गया उस जमाने का डिबेटिंग कल्ब आज हुक्का कल्ब के नाम से जाना जाता है।
बागेश्वर
क्या आप जानते हैं की सरयू के तट पर बसा बागेश्वर भी आजादी के आंदोलन में पीछे नहीं रहा। इस तट ने हजारों का जन सैलाब देखा है एक तरफ क्रांतिकारी और एक तरफ ब्रिटिशर्स को बंदूकों के साथ देखा है।
ये वही तट है जहां कूली बेगार प्रथा का अंत हुआ था। दिन था 14 जनवरी 1921 बागेशवर में सरयू के तट पर उत्तरायणी का मेला लगा हुआ था. यहां हजारों का जन सैलाब मौजूद था. तभी एक आवाज चारों तरफ गूंजी- “सरयू का जल हाथ में लेकर शपथ लो कि आज से कुली नहीं देंगे और ना ही कुली बनेंगे और अगर किसी ने कुली दिया तो उसकी सात पुरखें नरक में जाएंगी.” कूली बेगार के विरोध में उत्तरायणी मेले में आई आक्रोशित जनता ने सरयू का जल हाथ में लेकर उस आवाज के साथ दोहराया “आज से कुली उतार, बेगार और कुली बर्दायश नहीं करेंगे” और कुली संबंधित सारे रजिस्टर फाड़ कर सरयू में बहा दिए गए।