क्या तय प्रक्रिया से पहले घोषित हुआ उत्तराधिकारी, केदारनाथ रावल चयन पर बवाल शुरू

महाशिवरात्रि के अवसर पर ओंकारेश्वर मंदिर में श्री केदारनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि और नए रावल की नियुक्ति की आधिकारिक घोषणा होनी है। लेकिन इससे पहले ही नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर विवाद गहरा गया है। बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के पूर्व अध्यक्ष अजेंद्र अजय ने पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
केदारनाथ रावल चयन पर बवाल शुरू
बदरीनाथ-केदरनाथ मंदिर समिति (BKTC) के पूर्व अध्यक्ष अजेंद्र अजय का कहना है कि मीडिया के माध्यम से जानकारी मिली है कि वर्तमान रावल भीमाशंकर लिंग ने महाराष्ट्र के नांदेड़ में आयोजित एक निजी कार्यक्रम में अपने शिष्य शिवाचार्य शांति लिंग (केदार लिंग) को उत्तराधिकारी घोषित किया है। बताया गया कि यह घोषणा स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए की गई।
पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि वर्तमान BKTC अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी का बयान समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ है, जिसमें कहा गया है कि अभी तक रावल भीमाशंकर लिंग की ओर से कोई औपचारिक त्यागपत्र नहीं दिया गया है। ऐसे में नए रावल की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू ही नहीं हो सकती। अजेंद्र अजय ने कहा कि मंदिर समिति अधिनियम के अनुसार रावल, नायब रावल सहित सभी नियुक्तियों का अधिकार केवल बीकेटीसी को है। उन्होंने कहा कि ये पद धार्मिक दृष्टि से भले ही अत्यंत पूजनीय हों, लेकिन इनकी नियुक्ति, वेतन और सेवा शर्तें मंदिर समिति के अधीन आती हैं।
अजेंद्र अजय ने अपने कार्यकाल का दिया उदाहरण
अजेंद्र अजय ने अपने कार्यकाल का उदाहरण देते हुए बताया कि बदरीनाथ धाम के तत्कालीन रावल ईश्वरी प्रसाद नंबूदरी ने स्वास्थ्य कारणों से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन किया था। उसके बाद नायब रावल को प्रभारी बनाया गया और फिर विधिवत विज्ञापन और साक्षात्कार के माध्यम से नियुक्ति की गई।
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भीमाशंकर लिंग की नियुक्ति पर हुआ था आंदोलन
उन्होंने यह भी कहा कि केदारनाथ धाम के रावल परंपरागत रूप से कर्नाटक के शैव लिंगायत समुदाय से होते हैं। साल 2000 से पहले अधिकांश रावल आजीवन पद पर रहे। सिद्धेश्वर लिंग ने स्वास्थ्य कारणों से त्यागपत्र दिया था, जिसके बाद भीमाशंकर लिंग की नियुक्ति हुई। उस समय भी उनके पट्टाभिषेक को लेकर ऊखीमठ में आंदोलन हुआ था।
त्यागपत्र दिए बिना उत्तराधिकारी घोषित करना है परंपराओं के अनुरूप
अजेंद्र अजय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बिना विधिवत त्यागपत्र दिए किसी भी प्रकार से उत्तराधिकारी घोषित करना न तो परंपराओं के अनुरूप है और न ही प्रशासनिक दृष्टि से उचित। उन्होंने सवाल उठाया कि नांदेड़ में आयोजित कार्यक्रम के लिए क्या मंदिर समिति से अनुमति ली गई थी? साथ ही “रूप छड़ी” को महाराष्ट्र ले जाने की अनुमति किसने दी और समिति के कर्मचारी वहां कैसे पहुंचे?
परंपराओं का उल्लंघन करने वालों पर की कार्रवाई की मांग
पूर्व अध्यक्ष ने बीकेटीसी अध्यक्ष से पूरे मामले की जांच कराने और बिना अनुमति परंपराओं का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने यह भी बताया कि उनके कार्यकाल में मंदिर समिति के कार्मिकों की सेवा नियमावली को कैबिनेट से स्वीकृति दिलाई गई थी और रावल नियुक्ति के लिए अलग नियमावली तैयार की गई थी, लेकिन अंतिम स्वीकृति नहीं मिल पाई। उन्होंने वर्तमान अध्यक्ष से आग्रह किया कि इस नियमावली को जल्द कैबिनेट से पारित कराया जाए, ताकि भविष्य में इस तरह के विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो। फिलहाल महाशिवरात्रि के अवसर पर होने वाली आधिकारिक घोषणा पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।