उत्तराखंड। सीधे सीएम दफ्तर से जारी हुआ टीचर्स का तबादला आदेश, विपक्ष ने याद दिलाया एक्ट

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उत्तराखंड में भले ही तबादला एक्ट लागू है लेकिन सच ये भी है कि इस एक्ट के लागू होने के बाद से कभी भी एक्ट के हिसाब से तबादले हुए ही नहीं। 10-15 फीसदी तक के तबादले भले ही इस एक्ट के नियमों के अनुसार हो जाएं लेकिन इससे अधिक तबादलों में एक्ट बेमानी साबित होता है।

हां, अगर सत्ता में आपका कोई जानने वाला हो तो ये जरूर है कि हर एक्ट को दरकिनार कर मनचाही पोस्टिंग ली जा सकती है। इसमें कोई नियम, कानून, एक्ट वगैरह आड़े नहीं आता है।

तबादला एक्ट के तहत तबादले न होने से कई बार योग्य लोगों को भी इसका लाभ नहीं मिल पाता है। ऐसे में बीमार कर्मचारियों को भी सिस्टम से लोहा लेना पड़ता है।

ऐसा ही एक तबादला आदेश सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। इस आदेश में सीधे मुख्यमंत्री सचिवालय के निर्देशों पर तीन अध्यापकों का तबादला आदेश जारी कर दिया गया है।

इस तबादला आदेश में तीन महिला अध्यापिकाओं के तबादले का आदेश मुख्यमंत्री के संयुक्त सचिव संजय टोलिया की ओर से महानिदेशक, विद्यालयी शिक्षा को दिया गया है। इस आदेश में सहायक अध्यापिका रेनू बिष्ट को मूलीगांव, पिथौरागढ़ से सहसपुर, देहरादून भेजने का, सहायक अध्यापिका, गरिमा पंत को रानीखेत से हल्दवानी भेजने का आदेश दिया गया है। इसके साथ ही सहायक अध्यापिका मुन्नी गोस्वामी को बागेश्वर में ही एक स्कूल से दूसरे स्कूल में भेजने का आदेश है।

वहीं राज्य की विपक्षी पार्टियां इस आदेश पर सवाल खड़े कर रहीं हैं। आम आदमी पार्टी ने पूछा है कि, क्या जीरो टालरेंस की सरकार में तबादले बिना किसी नियम कानून के होते हैं? सरकार में मुख्यमंत्री से पहचान वालों का ट्रांसफर सीधा मुख्यमंत्री दफ्तर से हो रहा है।

हालांकि इस तबादला आदेश के पीछे कुछ और ही सच्चाई है। दरअसल इन तीनों ही आदेशों के पीछे बीमारी एक बड़ा कारण है। ये तीनों ही बीमार शिक्षिकाएं हैं और इन्हे दुर्गम से सुगम में किया जाना है। लेकिन शिक्षा विभाग का सिस्टम इन शिक्षिकाओं की गुहार सुन ही नहीं रहा था लेिहाजा सीधे मुख्यमंत्री दफ्तर को दखल देना पड़ा।

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