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77वां स्वतंत्रता दिवस : आजादी की वो महिला योद्धाएं, अंग्रेजों से डरी नहीं, लड़ीं जमकर

चारों तरफ देशभक्ति के रंग बिखरे हुए हैं। पूरे देश में इस दिन को हर्षोउल्लास के साथ मनाया जा रहा है। पर क्या आप जानते हैं आजादी के लिए अपना खून पसीना एक करने वाली देशप्रेमी महिलाओं को, जिन्होनें आजादी की लड़ाई में चिंगारी बनकर लौ जगाई और तब तक लड़ती रही जब तक देश गुलामी की बेड़ियो से आजाद नहीं हुआ। आज हम आपको आजादी की 77वीं वर्षगांठ पर उन सभी स्वतंत्रता सेनानी महिलाओं के बारे में बताने जा रहे जिन्होनें देश को आजाद कराने के लिए चार दिवारी से बाहर कदम रखा और तब तक नहीं रूकी जब तक देश स्वतंत्र नहीं हुआ, तो आइये सबसे पहले बात करेंगे महात्मा गांधी की जीवनसंगिनी कस्तूरबा गांधी की।

कस्तूरबा गांधी

कस्तूरबा गांधी महात्मा गांधी की पत्नी होने के साथ- साथ एक समाज सेविका, कड़क स्वभाव की महिला, अनुशासन प्रिय और आजादी की लड़ाई में अपने पति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाली स्वतंत्रता सेनानी रही हैं। कस्तूरबा ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन,’ ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ और अन्य आंदोलनों मे फ्रंट-लाइनर थीं। जब गांधी को हिरासत में लिया गया तो वह अक्सर आंदोलनों में नेतृत्व की भूमिका में आ जाती थीं। उन्होंने एक बार ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में बड़ी भीड़ को संबोधित भी किया था। उन्होंने लंबे समय तक साबरमती आश्रम को चलाया। कस्तूरबा पैदल या बैलगाड़ी से गांव-गांव जाकर लोगों को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए सजग करती थीं। वह दूसरी महिलाओं को आंदोलन में शामिल होने के लिए कहती थीं। उन्होंने महिलाओं को शराब की दुकान के सामने धरना देने, कताई करने और खादी पहनने का आग्रह किया। कस्तूरबा उस समय देश में खादी का चेहरा बनीं। वह स्वदेशी श्रमिकों को उनके देश और मातृभूमि के लिए उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहित किया करती थीं।

कस्तूरबा अपने पूरे जीवन में महात्मा गांधी के साथ खड़ी रहीं। उन्होंने गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भाग लिया। उन्होंने अपने घर के दरवाज़े पूरे देश और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए खोल दिए थे। जब गांधी जेल में थे और उन्होंने उपवास रखा। कस्तूरबा उन चीजों को छोड़ने से नहीं हिचकी जो उन्हें बहुत पसंद थीं। उन्होंने अपने गहने, अच्छा खाना और अपने धार्मिक लाभ तक त्याग दिए थे। ‘भारत छोड़ाे आंदोलन’ में हिस्सा लेने के लिए अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ उन्हें भी गिरफ्तार किया गया। उन्हें पुणे के आग़ा ख़ान पैलेस में कैद किया गया। उस समय तक उनकी सेहत पूरी तरह खराब हो गई थी। कैद में बंद कस्तूरबा गांधी को जब लगा की उनका अंतिम समय नजदीक है उन्होंने उसी कैंप में बंद महात्मा गांधी से मिलने की इच्छा जताई। 22 फरवरी 1944 में उन्होंने महात्मा गांधी की गोद में आखिरी सांस ली और इस दुनिया को अलविदा कह दिया। अपनी मौत से पहले उन्होंने कहा था, “मेरी मौत पर शोक मत मनाना। यह आनंद का अवसर होना चाहिए।” 23 फरवरी 1944 को आगा ख़ान पैलेस में उनका अंतिम संस्कार किया गया था।

दुर्गा भाभी


क्रांतिकारी दुर्गा भाभी एक ऐसी वीरांगना थीं जिन्हें बहुत ही कम लोग जानते हैं लेकिन आजादी की लड़ाई में इन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया था। वे क्रांतिकारियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चली थीं। अंग्रेज भी दुर्गा भाभी का नाम सुनकर थर-थर कांपते थे। दुर्गा भाभी भले ही भगत सिंह, सुख देव और राजगुरू की तरह फांसी पर न चढ़ी हों लेकिन कंधें से कंधा मिलाकर आजादी की लड़ाई लड़ती रहीं। स्वतंत्रता सेनानियों के हर आक्रमक योजना का हिस्सा बनी। दुर्गा भाभी बम बनाती थीं तो अंग्रेजो से लोहा लेने जा रहे देश के सपूतों को टीका लगाकर विजय पथ पर भी भेजती थीं। दुर्गा भाभी को भारत की ‘आयरन लेडी’ भी कहा जाता है। बहुत ही कम लोगों को ये बात पता होगी कि जिस पिस्तौल से चंद्र शेखर आजाद ने खुद को गोली मारकर बलिदान दिया था, वह पिस्तौल दुर्गा भाभी ने ही आजाद को दी थी। इतना ही नहीं दुर्गा भाभी एक बार भगत सिंह के साथ उनकी पत्नी बन कर अंग्रेजो से बचाने के लिए उनके प्लान का हिस्सा बनी थीं।

भगत सिंह से दुर्गा भाभी का रिश्ता

दुर्गा भाभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की प्रमुख सहयोगी थीं। लाला लाजपत राय की मौत के बाद भगत सिंह ने सॉन्डर्स की हत्या की योजना बनाई थी। तब सॉन्डर्स और स्कॉर्ट से बदला लेने के लिए आतुर दुर्गा भाभी ने ही भगत सिंह और उनके साथियों को टीका लगाकर रवाना किया था। इस हत्या के बाद अंग्रेज उनके पीछे पड़ गए थे। दुर्गा भाभी ने उन्हें बचाने के लिए भगत सिंह के साथ भेष बदलकर शहर छोड़ दिया था। इतना ही नहीं सन् 1929 में जब भगत सिंह ने विधानसभा में बम फेंकने के बाद आत्मसमर्पण किया था उसके बाद दुर्गा भाभी ने लॉर्ड हैली की हत्या करने का प्रयास किया था। हालांकि वह बच गया था। दुर्गा भाभी ने भगत सिंह और उनके साथियों की जमानत के लिए एक बार अपने गहने तक बेच दिए थे।

23 मार्च,1931 को भगत सिंह , सुखदेव और राजगुरू को फ़ाँसी पर चढ़ाया जा चुका था. 27 फ़रवरी, 1931 को चंद्रशेखर आज़ाद भी पुलिस मुठभेड़ में अपने प्राण न्योछावर कर चुके थे। उस समय दुर्गा भाभी ने तय किया कि वो आत्मसमर्पण कर दें और खुद को गिरफ़्तार करवा दूसरे माध्यमों से देश की सेवा करें. 12 सितंबर, 1931 दिन के 12 बजे पुलिस ने उनके निवासस्थान से उन्हें गिरफ़्तार कर लिया. बाद में दुर्गा भाभी ने एक इंटरव्यू में कहा, “पुलिस तीन लॉरियों में भरकर मुझे गिरफ़्तार करने आई थी. मुझे लाहौर के किले ले जाया गया. वहाँ एसएसपी जैंकिन्स ने मुझे धमकाते हुए कहा, “तुम्हारे साथियों से हमें तुम्हारे बारे में सब पता चल चुका है. तुम्हारा सारा रिकार्ड हमारे पास है.” मैंने फ़ौरन जवाब दिया, “अगर आपके पास मेरे ख़िलाफ़ सबूत हैं तो मुझ पर मुक़दमा चलाइए, वर्ना मुझे छोड़ दीजिए.”
लेकिन जेल में उन्हें पहली रात ख़ूँख़ार महिला अपराधियों के साथ रखा गया. जब पुलिस उनके ख़िलाफ़ कोई प्रमाण नहीं जुटा पाई तो दिसंबर, 1932 में उन्हें जेल से रिहा तो कर दिया गया। सन 1936 में दुर्गा भाभी लाहौर से गाज़ियाबाद आ गईं और वहाँ प्यारेलाल गर्ल्स हाई स्कूल में पढ़ाने लगीं. सन 1940 में उन्होंने लखनऊ मांटेसरी स्कूल की स्थापना की. बाद में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसके भवन का उद्घाटन किया. अप्रैल, 1983 में उन्होंने विद्यालय से अवकाश ले लिया क्योंकि वो अस्वस्थ रहने लगी थीं. 15 अक्तूबर, 1999 को दुर्गा भाभी ने इस दुनिया को अलविदा कहा।

भीकाजी कामा

क्या आप जानते हैं भारत की आज़ादी से चार दशक पहले, साल 1907 में विदेश में पहली बार भारत का झंडा एक महिला ने फहराया था। इस महिला का नाम था भीकाजी कामा.. 46 साल की पारसी महिला भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टुटगार्ट में हुई दूसरी ‘इंटरनेशनल सोशलिस्ट कांग्रेस’ में ये झंडा फहराया था। ये भारत के आज के झंडे से अलग, आज़ादी की लड़ाई के दौरान बनाए गए कई अनौपचारिक झंडों में से एक था। मैडम कामा पर किताब लिखनेवाले रोहतक एम.डी. विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर बी.डी.यादव बताते हैं, “उस कांग्रेस में हिस्सा लेने वाले सभी लोगों के देशों के झंडे फहराए गए थे और भारत के लिए ब्रिटेन का झंडा था, उसको नकारते हुए भीकाजी कामा ने भारत का एक झंडा बनाया और वहां फहराया। “झंडा फहराते हुए भीकाजी ने ज़बरदस्त भाषण दिया और कहा, “ऐ संसार के कॉमरेड्स, देखो ये भारत का झंडा है, यही भारत के लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, इसे सलाम करो.”भीकाजी कामा द्वारा फहराए झंडे पर भी ‘बंदे मातरं’ लिखा था. इसमें हरी, पीली और लाल पट्टियां थीं. झंडे में हरी पट्टी पर बने आठ कमल के फूल भारत के आठ प्रांतों को दर्शाते थे। लाल पट्टी पर सूरज और चांद बना था। सूरज हिन्दू धर्म और चांद इस्लाम का प्रतीक था। ये झंडा अब पुणे की केसरी मराठा लाइब्रेरी में प्रदर्शित है।

उषा मेहता


जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे एबीसीडी बोलते और सीखते हैं उस उम्र में गुजरात के सरस गांव की आठ साल की बच्ची स्वतंत्रता आंदोलन में अपने से तीन गुना बड़े लोगों के साथ कदम से कदम मिलकर चल रही थी। 1928 में उषा मेहता नाम की ये लड़की देशभर में अंग्रेजों के खिलाफ चल रही मार्च में शामिल हो कर “साइमन, वापस जाओ के नारे लगा रही थी। उषा मेहता ने स्वतंत्रता संग्राम में पूरी तरह से भाग लेना शुरू कर दिया था। जिसे देखते हुए उन्होंने कई गलत चीजों का विरोध किया। ऊषा जेल में बंद लोगों के लिए कई बार संदेशवाहक भी बनीं। साल 1939 में, उषा मेहता ने विल्सन कॉलेज, बॉम्बे से दर्शनशास्त्र में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की और कानून की पढ़ाई के लिए तैयारी करने लगीं। हालांकि, भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा के साथ, उन्होंने अपनी पढ़ाई रोकने और स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने का फैसला किया।

14 अगस्त 1942 को उषा मेहता ने अपने सहयोगियों के साथ सीक्रेट कांग्रेस रेडियो की शुरुआत की। रेडियो ने गांधी और कई अन्य नेताओं के ध्वनि संदेशों को जनता के लिए प्रसारित किया। स्वतंत्रता के बाद, 27 साल की उम्र में उषा, गांधीजी से इतनी प्रभावित हुई कि वह एक ब्रह्मचारी बन गईं, गांधीवादी जीवन शैली को अपनाया, सुख-सुविधाओं को त्याग दिया, अंत तक केवल खादी की साड़ियां पहनीं और इस तरह भीड़ में अलग खड़ी हुई। उन्होंने इसके बाद अपनी पढ़ाई भी पूरी की। भारत के आजाद होने के बाद उषा ने डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की और ‘डॉ उषा मेहता’ बन गईं. बाद में जाकर, डॉ मेहता को पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से भी नवाजा गया। इतनी ही नहीं बल्कि 1997 में स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती के दौरान कई कार्यक्रम उन्हें समर्पित किए गए । आज उषा मेहता का नाम भारत के उन स्वतंत्रता सेनानियों में लिया जाता है जिनकी बदौलत देश को आजादी मिली।


सरोजिनी नायडू

भारत की कोकिला एक महान कवित्री और स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व थीं और उन्होंने आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वह महात्मा गांधी की करीबी सहयोगी थीं और भारतीय स्वतंत्रता के आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए अथक रूप से काम करती थीं। स्वतंत्रता आंदोलन में नायडू के प्रमुख योगदानों में से एक 1920 में गांधी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में उनकी भागीदारी थी। उन्होंने देश भर में बड़े पैमाने पर यात्रा की, भाषण दिए और लोगों से आंदोलन में शामिल होने और ब्रिटिश वस्तुओं और संस्थानों का बहिष्कार करने का आग्रह किया।

1930 में ब्रिटिश नमक कर के खिलाफ अभियान, नमक सत्याग्रह में नायडू भी एक प्रमुख नेता थीं। उन्हें गांधी सहित अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार किया गया था और कई महीने जेल में बिताए गए थे। अपने राजनीतिक कार्य के अलावा, नायडू एक विपुल लेखिका थीं और उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में लोगों को प्रेरित करने और प्रेरित करने के लिए अपनी कविता का उपयोग किया। उनकी कविताओं ने भारत की संस्कृति और परंपराओं का जश्न मनाया और लोगों को अपने अधिकारों और सम्मान के लिए लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। स्वतंत्रता आंदोलन में नायडू के योगदान को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया, और वह 1925 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष के रूप में नियुक्त होने वाली पहली महिला थीं। इसके साथ ही 1947 में वह उत्तर प्रदेश की राज्यपाल बनने वाली पहली महिला बनी।

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