ये कोई आम कुत्ते नहीं, इनसे बच पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है

दुनियाभर में पाए जाने वाले कुत्तों की प्रजातियों की अपनी-अपनी पहाचान और खासियत होती है। सेना और पुलिस के अभियानों में कुत्तों की खास भूमिका होती है। ऐसे ही कुछ बेहतरीन कुत्ते सीमा सुरक्षा बल के पास भी हैं। बीएसएफ के ये 674 खोजी कुत्तों ने बॉर्डर सर्विलांस के लिए लगे करोड़ों रुपये के तकनीकी उपकरणों को मात दे दी है।

घना जंगल हो, दलदल हो या ऐसी धुंध, जिसमें दस मीटर तक भी कुछ दिखाई नहीं पड़ता। वहां पर ये खोजी कुत्ते, कारगर साबित होते हैं। बॉर्डर सर्विलांस से जुड़े कई मामले तो ऐसे रहे हैं, जहां पर इन कुत्तों ने कई किलोमीटर पीछे जाकर तस्कर या घुसपैठियेश् को पकड़वाने में मदद की। किसी तस्कर का कोई भी सामान बॉर्डर पर रह जाता है, तो ये खोजी कुत्ते दो तीन किलोमीटर के दायरे में आरोपी को तलाश लेते हैं। सूंघने की शक्ति के बल पर ये कुत्ते आरोपी के घर के बाहर जाकर बैठ जाते हैं। उसके बाद सुरक्षा एजेंसियां आरोपी तक पहुंच जाती हैं।

बीएसएफ के डीजी पंकज सिंह ने बताया, बॉर्डर का कुछ एरिया ऐसा है, जहां पर फेंसिंग संभव नहीं है। पहाड़ है, दलदल है या नदी नाला है, यहां घुसपैठ रोकने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है। बॉर्डर पर सर्विलांस के लिए तकनीकी उपकरण लगाए जा रहे हैं। स्मार्ट फेंसिंग के अंतर्गत सीसीटीवी कैमरा, बुलेट कैमरा, व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (सीआईबीएमएस), सर्विलांस ड्रोन और दूसरे तकनीकी उपकरण शामिल हैं। कई बार धुंध इतनी ज्यादा होती है कि उसमें दस मीटर दूर की वस्तु को देखना संभव नहीं हो पाता। ऐसे में सुरक्षा घेरा टूट सकता है। इसका तोड़ निकालने के लिए कुत्तों की मदद ली गई।

पंजाब में एक तस्कर का कपड़ा बॉर्डर के पास छूट गया था। सीमावर्ती इलाके में रहता था। खोजी कुत्ते ने उस कपड़े को सूंघ कर दो-तीन किलोमीटर दूर स्थित गांव में तस्कर का घर ढूंढ लिया। वह कुत्ता, तस्कर के घर के बाहर बैठ गया। इसके बाद पूछताछ शुरज हुई। मामला सही निकला। ऐसे कई करीब दर्जनभर मामले खोजी कुत्तों की मदद से सुलझाए गए हैं। खोजी कुत्ते का बड़ा फायदा यह रहता है कि इनकी मदद से खराब मौसम जैसे आंधी तूफान, बरसात, धुंध व बर्फबारी में बॉर्डर पर संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाया जा सकता है। लाइव रिकॉर्डिंग के लिए खोजी कुत्तों के गले में कैमरा भी लगाया जाता है।

बीएसएफ के ग्वालियर स्थित राष्ट्रीय श्वान प्रशिक्षण संस्थान में विभिन्न नस्लों के कुत्तों को ट्रेनिंग दी जाती है। इनमें जर्मन शेफर्ड, लेब्राडोर, गोल्डन रीट्रिवर, डाबरमैन पिंसचर, क्रोकर स्पेनियल और बेल्जियन मेलेनोइस आदि शामिल हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश बॉर्डर पर इन्हीं कुत्तों को लगाया गया है। ये जवानों के साथ गश्त करते हैं। इन्हें विस्फोटक सामग्री से लेकर किसी भी तरह की संदिग्ध वस्तु की पहचान करना सिखाया जाता है। राष्ट्रीय श्वान प्रशिक्षण संस्थान में कुत्तों को तीन सप्ताह से लेकर 36 सप्ताह तक का प्रशिक्षण दिया जाता है।

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