उत्तराखंड में करोड़ों के घोटाले का भंडाफोड़, हैरान कर देगी CAG Report

उत्तराखंड विधानसभा के पटल पर कैग की रिपोर्ट (CAG Report) पेश की गई जिसमें कई ऐसे बड़े खुलासे हुए हैं। जिसे सुनकर आपके भी होश उड़ जाएंगे। कैग रिपोर्ट ने घोटालों की पोल खोलकर रख दी है। रिपोर्ट में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिसमें करोड़ों रुपए की हेराफेरी की गई है।
CAG ने खोली घोटालों की पोल
गैरसैंण में विधानसभा सत्र चल रहा है। मंगलवार को विधानसभा में कैग की रिपोर्ट पेश की गई है। जिसमें कई ऐसे बड़े खुलासे हुए हैं जिसने सबको हैरत में डाल दिया है। इस रिपोर्ट में उत्तराखंड में करोड़ों की घोटालों की पोल खुल गई है। बता दें स्मार्ट सिटी से लेकर नमामि गंगे तक हर प्रोजेक्ट में भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ है
जानकारी के लिए बता दें CAG भारत की वो संवैधानिक संस्थान है जो सरकार की पाई-पाई का हिसाब रखती है। साल 2018 से 2024 के बीच सरकार के किए गए कामों की फाइलें जब कैग ने खंगाली तो वो भी हैरन रह गए। दरअसल 634 करोड़ के कामों में से कैग को सीधे-सीधे 75 करोड़ का घपला मिला।
स्मार्ट सिटी में हुए करोड़ों का घपला
सबसे पहले बात करते हैं देहरादून की स्मार्ट सिटी की। कैग रिपोर्ट के मुताबिक देहरादून स्मार्ट सिटी परियोजना में कई गंभीर अनियमितताओं का खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक कई काम तय सीमा से बाहर किए गए, कई मामलों में गलत भुगतान किया गया और परियोजना के तहत करोड़ों रुपए के दुरुपयोग के संकेत भी सामने आए हैं। देहरादून को स्मार्ट बनाने के नाम पर ऐसे कई फैसले लिए गए, जिनका फायदा जमीन पर कहीं नजर नहीं आता। रिपोर्ट में सामने आया है कि 4.85 करोड़ खर्च कर ई-रिक्शा खरीदे गए, लेकिन आज वे बेकार पड़े हैं। इसी तरह ई-बसों के लिए चार्जिंग स्टेशन बनाए गए, लेकिन उनका कभी इस्तेमाल ही नहीं हुआ।
रिपोर्ट के अनुसार सेंसर आधारित सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम पर 4.55 करोड़ रुपए खर्च किए गए, लेकिन आम जनता को इसका कोई फायदा नहीं मिला। इतना ही नहीं, ठेकेदार के साथ अनुबंध खत्म होने के बाद भी उससे 19 करोड़ का एडवांस वापस नहीं लिया गया। वहीं 2.62 करोड़ रुपए की लागत से लगाए गए 50 पर्यावरण सेंसर भी राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए, जिससे परियोजना की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक दून लाइब्रेरी परियोजना में GST के दोहरे दावों और ज्यादा दरों के कारण करीब 34.70 लाख का अतिरिक्त भुगतान किया गया। रिपोर्ट में स्मार्ट स्कूल प्रोजेक्ट को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इस परियोजना पर करीब 5.91 करोड़ रुपए खर्च किए गए और तीन स्कूलों में कंप्यूटर लैब और स्मार्ट बोर्ड लगाए गए। लेकिन बिजली का बिल नहीं चुकाया गया, जिसकी वजह से ये सभी उपकरण इस्तेमाल होने के बजाय धूल फांकते रहे। इसके अलावा देहरादून के परेड ग्राउंड का मामला भी रिपोर्ट में सामने आया है। यहां पहले से करीब 31 लाख की लागत से एक VIP मंच बना हुआ था। इसके बावजूद ठीक उसके सामने 84.11 लाख खर्च कर एक और नया मंच तैयार कर दिया गया। इससे परियोजना के तहत खर्च की गई राशि और फैसलों पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
बिजली व्यवस्था को लेकर हुए चौंकाने वाले खुलासे
घोटालों की ये लिस्ट यहीं खत्म नहीं होती। कैग की रिपोर्ट में बिजली व्यवस्था को लेकर भी कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक रुड़की, लक्सर और रुद्रपुर के इलाकों में लाइन लॉस की वजह से करीब 5 अरब रुपए की बिजली बर्बाद हो गई। आंकड़ों के अनुसार कुल 964 मिलियन यूनिट बिजली का नुकसान दर्ज किया गया, जो बिजली वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इतना ही नहीं, 1.13 लाख उपभोक्ताओं को बिना मीटर रीडिंग के ही करीब 385 करोड़ रुपये के बिल थमा दिए गए। रिपोर्ट में इसे उपभोक्ताओं के साथ बड़ी प्रशासनिक लापरवाही बताया गया है।
कैग ने UPCL के बिलिंग सिस्टम, वसूली सिस्टम और निगरानी सिस्टम पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कैग के मुताबिक राज्य सरकार ने 32 सार्वजनिक उपक्रमों और 28 सरकारी कंपनियों में कुल 8993 करोड़ का निवेश किया। करोड़ों के लोन लिए गए, सब्सिडी भी दी गई। लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि सिर्फ दो निगमों को छोड़कर बाकी सब से सरकार को कोई फायदा नहीं हुआ। लोक निर्माण विभाग, सिंचाई और ग्रामीण निर्माण विभाग के ठेकेदारों से पूरी रॉयल्टी न वसूलने से भी 252 करोड़ का नुकसान हुआ।
कोरोना में भी हुआ घोटाला
अब बात करते हैं उस वक्त की, जब पूरा देश कोरोना की दहशत में था। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक उस दौरान स्वास्थ्य विभाग ने जो एंबुलेंस और मेडिकल उपकरण खरीदे, वे बाज़ार की तुलना में काफी महंगी दरों पर लिए गए। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस खरीद प्रक्रिया के कारण करीब 87 लाख रुपए का नुकसान हुआ। साथ ही कैग ने टेंडर प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए इसे पक्षपाती बताया है।
अब जान लें कुंभ मेले की हकीकत
अब आपको कुंभ मेले की हकीकत से रूबरू करवाते हैं। साल 2021 के कुंभ मेले के लिए करीब 806 करोड़ रुपए जारी किए गए थे। लेकिन कैग की रिपोर्ट में सामने आया है कि करोड़ों रुपए ऐसे कामों में खर्च दिखा दिए गए, जो या तो जमीन पर हुए ही नहीं या फिर उनका स्पष्ट हिसाब ही नहीं मिल पाया। रिपोर्ट में नमामि गंगे परियोजना को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि इस योजना में पानी की तरह पैसा बहाया गया, लेकिन इसके बावजूद गंगा की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखा और प्रदूषण की समस्या बनी रही।
परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली खड़े किए सवाल
वहीं परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी रिपोर्ट में गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। आंकड़ों के मुताबिक 65 हजार से ज्यादा वाहन ऐसे हैं जो टैक्स नहीं दे रहे हैं और इन पर करीब 361 करोड़ का टैक्स बकाया है। हैरानी की बात यह है कि कई वाहन ऐसे भी हैं जो पिछले 10 साल से टैक्स जमा नहीं कर रहे हैं। और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि विभाग ने इन डिफॉल्टरों के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं की। न तो इन वाहनों की आरसी जब्त की गई और न ही इनके संचालन पर रोक लगाई गई। कई मामलों में तो दस साल से भी ज्यादा समय से टैक्स जमा नहीं हुआ, लेकिन फिर भी वाहन सड़कों पर दौड़ते रहे।
रिपोर्ट में बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी गंभीर लापरवाही भी सामने आई है। नियमों के अनुसार स्कूल और कॉलेजों की बसें संबंधित संस्थान के नाम पर पंजीकृत होनी चाहिए, ताकि उन पर कम टैक्स लगे और उनकी जिम्मेदारी तय हो सके। लेकिन ऑडिट के दौरान 20 शिक्षण संस्थानों की बसें व्यक्तिगत नामों पर पंजीकृत पाई गईं और उन पर नियमों के विपरीत टैक्स में छूट भी दी गई।
मनरेगा योजना के जमस्टर रोल में संदिग्ध एंट्रियां
वहीं गांव के गरीब लोगों को साल में 100 दिन का रोजगार देने वाली मनरेगा योजना, जिसे अब वीबीजीआरवाई (वीर भद्र सिंह ग्राम रोजगार योजना/वीबीजी राम जी के नाम से) के रूप में भी जाना जाता है, उसकी स्थिति भी चिंताजनक बताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 1 से 6 प्रतिशत परिवारों को ही साल में 100 दिन का रोजगार मिल पाया। जो लोग काम कर भी रहे हैं, उन्हें समय पर मजदूरी नहीं मिल रही। इसके अलावा मस्टर रोल में कई संदिग्ध एंट्रियां भी सामने आई हैं और कई जगहों पर तो मूल रिकॉर्ड ही गायब पाए गए। ये सारी बातें सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करती हैं।