उत्तराखंड पर Nepal की नजर!, बालेन शाह ने कहा ये हमारा इलाका, PM मोदी को नोटिस

Nepal Claims lipulekh territory On Kailash Mansarovar Route: नेपाल(Nepal) एक बार फिर भारत के खिलाफ खड़ा हो गया है। इस बार नेपाल के पीएम बालेन शाह ने सीधे-सीधे पीएम मोदी को नोटिस दे डाला। जिसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या रोटी बेटी के संबंध वाला हमारा सबसे करीबी दोस्त देश नेपाल भारत के किस मसले पर आपत्ति जता रहा है। चलिए जानते है इस आर्टिकल में।
कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़ा है पूरा विवाद Nepal Claims lipulekh territory On Kailash Mansarovar Route
नेपाल को भारत हमेशा अपना दोस्त मानता रहा है और उसी नेपाल में अब बालेन शाह के आने के बाद भारत के खिलाफ आवाज उठने लगी। दरअसल ये पूरा विवाद कैलाश मानसरोवर यात्रा (kailash mansarovar) से जुड़ा हुआ है। जून से अगस्त के बीच में भारत और चीन की सहमति से मानसरोवर यात्रा इस बार दो रास्तों से की जानी है एक उत्तराखंड का लिपुलेख दर्रा और दूसरा सिक्किम का नाथूला पास।
lipulekh territory को कहा अपना इलाका
अब जब 30 अप्रैल को भारत ने इसकी घोषणा की तो नेपाल में भूचाल आ गया। नेपाल ने लिपुलेख दर्रे पर एक बार फिर अपना दावा ठोक दिया। नेपाल सरकार ने रविवार यानी 3 मई को भारत के खिलाफ आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराते हुए 200 साल पुरानी सुगौली की संधि का हवाला देते हुए दावा किया कि लिपुलेख(lipulekh) दर्रा उनका है। भारत ने बिना उनसे पूछे एकतरफा फैसला ले लिया।
क्या है सुगौली की संधि?
आगे बात करने से पहले जरा इस सुगौली संधि के बारे में जान लेते हैं। दरअसल 18वीं सदी के आखिर में नेपाल अपना विस्तार कर रहा था। कुमाऊं, गढ़वाल, सिक्किम। एक-एक करके ये सारे इलाके नेपाल के कब्जे में आ रहे थे। तभी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी इसके आड़े आ गई। लॉर्ड हेस्टिंग्स, जो उस समय गवर्नर जनरल थे।
उन्होंने नेपाल की विस्तारवादी नीति को सीधी चुनौती दे डाली। नेपाल के गोरखा शासक नहीं माने। फिर शुरू हुआ एंगलो नेपाल युद्ध, जो 1 नवंबर 1814 से लेकर 4 मार्च 1816 तक चला। इस युद्ध में गोरखा हार गए। जिसके बाद एक संधिपत्र तैयार किया गया। जिसे सुगौली की संधि कहा जाता है।
संधि का हवाला देकर लिपुलेख दर्रे पर हक जमा रहा नेपाल
इस संधि में था कि नेपाल को अपने सारे कब्जे वाले इलाके छोड़ने पड़ेंगे। सबसे अहम बात की नेपाल काली नदी के पश्चिम में कभी दावा नहीं करेगा। साफ शब्दों में ये बताया गया कि काली नदी का पश्चिमी इलाका भारत का होगा और पूर्वी इलाका नेपाल का। हालांकि, आज 200 साल बाद नेपाल फिर से उसी सुगौली संधि का हवाला देकर लिपुलेख दर्रे पर अपना हक जता रहा है।
पहले भी ठोक चुके है लिपुलेख पर दावा
नेपाल का कहना है कि काली नदी को सीमा माना गया था। इसका उद्गम लिम्पियाधुरा है। जो काली नदी के पूर्व में है। इसलिए लिपुलेख का इलाका उनका है। वहीं भारत का कहना है कि काली नदी का उद्गम कालापानी से निकलने वाली पूर्वी धारा से होता है।
कई इतिहासकारों ने भी इस बात को माना है कि काली नदी का उद्गम कालापानी है। हलांकि ये पहली बार नहीं है जब नेपाल ने भारत के लिपुलेख दर्रे को लेकर दावा किया हो। 1997 में जब भारत और चीन ने लिपुलेख दर्रे को व्यापार मार्ग बनाने पर सहमति जताई, तो नेपाल ने आपत्ति की थी।
2020 में नेपाल ने अपने नक्शे में शामिल किए थे भारत के इलाके
2020 में ओली सरकार के वक्त नेपाल ने एक नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया। जिसमें भारत के इन इलाकों को अपने नक्शे में शामिल कर लिया गया था। जिसे भारत ने तुरंत खारिज कर दिया था। अब 2025 में, कैलाश मानसरोवर यात्रा को लेकर फिर से लिपुलेख दर्रे को लेकर नेपाल ने भारत को नोटिस थमा दिया है।
भारत ने नेपाल के दावों को बताया गलत
नेपाल का मानना है कि इतिहास में पुराने समय में सही तरीके से अपनी बात न रख पाने या लापरवाही के चलते ये समस्या बनी रही। धीरे-धीरे ये सारे इलाके भारत के कब्जे में चले गए। हलांकि वहीं भारत हमेशा से कहता आया है कि नेपाल का ये दावा पूरी तरह से गलत और भ्रामक है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी इस नोटिस के बाद दो टूक कहा कि नेपाल का दावा न तो तर्कसंगत है और न ही ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित।