NationalHighlight

ग्रीन फ्यूल का मुखौटा!, 1 लीटर ETHANOL के लिए खर्च हो रहा 10,000 लीटर पानी

जहां एक और भारत पेट्रोल में इथेनॉल (ETHANOL) मिलाकर क्लीन एनर्जी की ओर बढ़ने की बात कर रहा है तो वहीं इसकी सच्चाई काफी भयावह है। जिस इथेनॉल ब्लैड को क्रांति बताया जा रहा है, दरअसल ये कदम पानी के संकट (Water Crisis) को और गहरा करता दिख रहा है।

एथेनॉल को सरकार ग्रीन सॉल्यूशन के तौर पर बेच रही है। लेकिन आपको बता दें कि ये ऐसी फसलों से एक्सट्रेक्ट किया जाता है जो पहले ही पानी की काफी ज्यादा खपत करती हैं। जिसमें गन्ना, मक्का और खासकर चावल शामिल है।

ethanol

क्या होती है इथेनॉल ब्लैडिंग? WHAT IS ETHANOL BLENDING?

सबसे पहले Ethanol blending का मतलब जान लेते है। ये पेट्रोल में एक तरह की प्लांट-बेस्ड शराब यानी इथेनॉल को मिलाना होता है। इसे पट्रोल के विकल्प के तौर पर भी देखा जा रहा है। जिससे भारत को कच्चे तेल के लिए बाहर से निर्भर ना होना पड़े। सुनने में ये काफी अच्छा प्लान लगता है लेकिन इसकी सच्चाई थोड़ी सी अलग है।

ये भी पढ़ें:- अब भारत में एल्कोहॉल से दौड़ेंगी कारें!, किल्लत के बीच क्या है सरकार का E20 के बाद E85 प्लान?

इथेनॉल ब्लैडिंग बना रहा जल संकट!

आपको ये जानकार हैरानी होगी कि सरकार केवल एक लीटर चावल वाले इथेनॉल के लिए करीब 10790 लीटर पानी को स्वाहा कर रही है। जो कि जल संकट को खुला आमंत्रण दे रहा है। ऊर्जा सुरक्षा का नाम देकर अनाज और जल की बर्बादी आने वाली की पीढ़ियों की प्यास का सौदा है। ये आने वाले समय में एक जल त्रासदी के लिए स्टेज तैयार कर रहा है।

1 लीटर इथेनॉल के लिए खर्च हो रहा 10,000 लीटर पानी

इसको लेकर 27 सितंबर 2024 को खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने नई दिल्ली में इंडियन शुगर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएश (ISMA) द्वारा आयोजित एक वैश्विक सम्मेलन में भी बात की थी। उन्होंने बताया था कि चावल से 1 लीटर इथेनॉल बनाने के लिए करीब 10,790 लीटर पानी की खपत होती है।

  • चावल से 1 लीटर इथेनॉल:- 10,790 लीटर पानी
  • मक्के से 1 लीटर इथेनॉल– 4,670 लीटर पानी
  • गन्ने से 1 लीटर इथेनॉल -3,630 लीटर पानी

इसमें धान की खेती के समय सिंचाई के लिए यूज होने वाला पानी भी शामिल है।

ये भी पढ़ें:- पेट्रोल-डीजल कार खरीदने वालों के लिए बुरी खबर, Nitin Gadkari ने कह दी ये बात

ethanol

‘ग्रीन फ्यूल’ के नाम पर अरबों-खरबों का ग्राउड वाटर

अमुमन एक किलो चावन उगाने के लिए करीब 3,000 लीटर पानी लगता है। अब एक टन यानी 1000 किलो चावल से केवल 470 लीटर इथेनॉल बनता है। ऐसे में केवल फसल को उगाने के लिए ही प्रति लीटर इथेनॉल पर हजारों लीटर पानी का इस्तेमाल होता है। ‘ग्रीन फ्यूल के चक्कर में अरबों-खरबों का ग्राउड वाटर इस्तेमाल हो रहा है। जिसे रिचार्ज होने में प्रकृति काफी लंबा समय लगाती है।

चावल निभा रहा सबसे बड़ा रोल!

दरअसल भारत द्वारा इथनॉल ब्लैडिंग के इस प्रोग्राम को तेजी से आगे बढ़ा रहा है। इथनॉल गन्ना, मक्के और चावल से एक्सट्रेक्ट किया जा सकता है। इसमें सबसे बड़ा रोल चावल निभा रहा है। इथेनॉल को बनाने के लिए चावल को बढ़ावा दिया जा रहा है। 2024-25 में सरकार ने करीब 52 लाख टन चावल इथेनॉल बनाने के लिए दिया। 2025-26 में सरकार का इसे बढ़ाकर 90 लाख टन तक ले जाने का टारगेट है।

PDS के तहत गरीबो की हिस्सेदारी की जा रही कम

जिसके बाद सवाल ये भी उठता है कि इतना सारा चावल आएगा कैसै? तो इसके लिए भी सरकार ने इतंजाम कर रखा है। सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी Public Distribution System के तहत दिए जाने वाले टूटे चावल की हिस्सेदारी को कम करेगी। इसे 25 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत करने का प्लान है। इस कटौती से सालाना करीब 90 लाख टन टूटा चावल बचाया जाएगा। जिसे डिस्टिलरी में एथेनॉल बनाने के लिए भेजी जाएगी।

2030 तक देश के कई बडे शहरों में पानी की किल्लत

आपको ये भी बता दें कि नीति आयोग ने जल संकट की चेतावनी भी दी है। जिसके मुताबिक 2030 तक देश के कई बडे शहरों में पानी की किल्लत देखने को मिल सकती है। नीति आयोग की ‘समग्र जल प्रबंधन सूचकांक’ (CWMI) रिपोर्ट में बताया गया है कि 2030 तक दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे 21 बड़े शहरों का भूजल(Ground Water) ‘शून्य’ हो जाएगा।

ethanol

सरकार केवल एक लीटर चावल वाले इथेनॉल के लिए करीब 10790 लीटर पानी को स्वाहा कर रही है। जो कि जल संकट को खुला आमंत्रण दे रहा है। ऊर्जा सुरक्षा का नाम देकर अनाज और जल की बर्बादी आने वाली की पीढ़ियों की प्यास का सौदा है। ये आने वाले समय में एक जल त्रासदी के लिए स्टेज तैयार कर रहा है।

जल संकट को आमंत्रण

देश की कुल 1,822 करोड़ लीटर की इथेनॉल क्षमता है। हैरानी की बात तो ये है कि इथेनॉल क्षमता में सबसे अधिक उन्हीं राज्यों में जहां पानी की किल्लत है।

महाराष्ट्र में 396 करोड़ लीटर की क्षमता वाले प्लांट हैं। जहां किसान पानी के लिए जंग लड़ रहे हैं। लेकिन इथेनॉल प्लांट आसानी से चल रहा है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में गन्ने और अनाज आधारित इथेनॉल प्लांट है। जो कि ग्राउंड वाटर खत्म कर रहे हैं। इन्हें नीति आयोग ने शून्य होने की कगार पर रखा है।

Uma Kothari

उत्तराखंड की डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय उमा कोठारी खबर उत्तराखंड (khabaruttarakhand.com) में बतौर पत्रकार कार्यरत हैं। वे राजनीति, मनोरंजन, खेल और ट्रेंडिंग विषयों पर गहन और तथ्यपरक खबरें लिखती हैं। उत्तराखंड के स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर इनकी पकड़ मजबूत है। डिजिटल मीडिया में इनका अनुभव पाठकों को सटीक, संतुलित और समय पर जानकारी देने में सहायक है। उत्तराखंड | खबर उत्तराखंड
Back to top button
उत्तराखंड की हर खबर
सबसे पहले पाने के लिए!
📱 WhatsApp ग्रुप से जुड़ें