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पर्यावरणविद अनिल जोशी की बढ़ी मुश्किले! हो गया एक और बड़ा खुलासा

उत्तराखंड में एक बार फिर वन भूमि और पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। RTI एक्टिविस्ट और अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने ऐसा खुलासा किया है। जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। साथ ही पर्यावरण संरक्षण की आड़ में चल रहे अवैध कब्जे को भी बेनकाब किया है। उन्होंने पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित डॉ. अनिल प्रकाश जोशी पर देहरादून के इस्ट होप टाउन क्षेत्र स्थित साल के जंगल (वन भूमि) पर कथित अवैध कब्जे और गलत तरीके से पट्टा दिए जाने का गंभीर आरोप लगाया है।

‘पर्यावरण संरक्षण’ की आड़ में साल के जंगल पर कब्जा!

दरअसल इस वन भूमि पर वर्तमान में HESCO NGO का भवन बना है। जिसे RTI एक्टिविस्ट ने अवैध बताते हुए संवैधानिक, वैधानिक और न्यायिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन कहा है। ऐसे में उन्होंने मांग की है कि साल 2011 में पद्मश्री डॉ. अनिल प्रकाश जोशी समेत अन्य को दिए गए पट्टों को तत्काल निरस्त किया जाए। साथ ही अवैध निर्माण को ध्वस्थ किया जाए और इसमें शामिल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

मुख्य सचिव से डीएम तक की शिकायत

एडवोकेट विकेश सिंह नेगी ने इस पूरे मामले को लेकर मुख्य सचिव उत्तराखंड शासन,राजस्व सचिव और जिलाधिकारी देहरादून को एक विस्तृत प्रतिवेदन भेजा है। प्रतिवेदन में खाता संख्या 02493, खसरा संख्या 384/1, कुल क्षेत्रफल 0.1170 हेक्टेयर दर्ज भूमि के साल 2011 में किए गए आवंटन को पूरी तरह से अवैध बताया गया है।

NGO भवन को बताया अवैध

प्रतिवेदन के अनुसार, जिस भूमि को सरकारी रिकॉर्ड में “साल जंगल या फिर वन भूमि” बताया गया है, उसी पर पर वर्तमान में HESCO NGO का पक्का भवन खड़ा है। आरोप है कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर वन भूमि का उपयोग गैर-वन उद्देश्य के लिए किया गया।

1946 के बाद वन भूमि पर पट्टा अवैध

RTI एक्टिविस्ट ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया है। जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि 8 अगस्त 1946 के बाद सरकार को भी वन भूमि पर पट्टा देने का कोई अधिकार नहीं है। इस डेट के बाद से सभी पट्टे Void ab initio यानी शुरूआत से ही शून्य माने जाते हैं। इसी के आधार पर साल 2011 में किया गया अवांटन भी कानूनी रूप से अमान्य है।

वन संरक्षण नियम के तहत केंद्र की अनुमति जरूरी

वन संरक्षण अधिनियम, 1980 की धारा 2 के अनुसार किसी भी वन भूमि का इस्तेमाल गैर-वन कामों के लिए करने से पहले केंद्र सरकार की अनुमति लेना जरूरी होता है। प्रतिवेदन में कहा गया है कि इस मामले में न तो जमीन के उपयोग में बदलाव की अनुमति ली गई और न ही भवन निर्माण या NGO संचालन के लिए केंद्र सरकार की कोई मंजूरी दिखाई गई है। इसी आधार पर पूरे निर्माण को अवैध घोषित करने की मांग की गई है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला

प्रतिवेदन में ऐतिहासिक टी.एन. गोदावर्मन बनाम भारत संघ मामले और 15 मई 2025 को पारित सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी उल्लेख किया गया है। जिसमें साफ किया गया है कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज “जंगल”, “वन”, “झाड़ी या “साल जंगल” भूमि को वन भूमि माना जाएगा। साथ ही ऐसी भूमि पर कोई भी पट्टा या लीज अवैध माना जाएगा।

तीन बड़ी मांगें

RTI एक्टिविस्ट विकेश सिंह नेगी ने प्रशासन से तीन मांगें रखी हैं। पहला ये कि साल 2011 में दिए गए पट्टों को तत्काल निरस्त किया जाए। साथ ही HESCO NGO के भवन को अवैध घोषित कर ध्वस्त किया जाए। तीसरी, इस पूरे मामले में शामिल अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए।

सुप्रीम कोर्ट जाने की चेतावनी

एक्टिविस्ट ने कहा कि यदि समय रहते हुए कार्रवाई नहीं की गई तो इस मामले में वो सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। उन्होंने कहा कि ये केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि संविधान, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और पर्यावरण संरक्षण की साख से जुड़ा मामला है। देहरादून में वन भूनि और आरक्षित वन भूमि पर बड़ी संख्या में अतिक्रमण हो रहा हैं। जिसके चलते दून घाटी की आबो-हवा बिगड़ गयी है और प्रदूषण भी लगातार बढ़ रहा है।

Uma Kothari

उत्तराखंड की डिजिटल मीडिया से जुड़ी युवा पत्रकार उमा कोठारी इस समय खबर उत्तराखंड.कॉम के साथ काम कर रही हैं। उमा अलग-अलग बीट पर खबरें लिखती हैं, जिनमें देश-दुनिया की राजनीतिक गतिविधियों की अहम खबरें, मनोरंजन, खेल और ट्रेंड से जुड़ी अपडेट शामिल हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करते हुए वे ट्रेंड और तथ्य दोनों का संतुलन बनाए रखती हैं, ताकि पाठकों तक सही और ज़रूरी जानकारी पहुंचे।
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