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 रूड़की : मरकज़ हजरत अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक के 16वें सज्जादानशीन शाह का निधन, शोक की लहर

 रूड़की: सुफिईज्म का बड़ा मरकज़ हजरत अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक के 16वें सज्जादानशीन शाह मंसूर एज़ाज़ कुद्दुसी साबरी 78 वर्ष की उम्र में दुनियां को अलविदा कह गए। सज्जादानशीन शाह मंसूर साहब ने देहरादून के मैक्स अस्पताल में देर रात अंतिम सांस ली। सज्जादानशीन के देहांत की खबर से देश विदेश में मौजूद उनके मुरीदीन में शोक की लहर दौड़ गई।

जानकारी के मुताबिक़ विश्व प्रसिद्ध दरगाह हज़रत मखदूम अलाउद्दीन अली अहमद साबिर पाक के 16 वे सज्जादानशीन शाह मंसूर एज़ाज़ कुद्दुसी साबरी का जन्म आज़ादी से पूर्व 1943 में पिरान कलियर में हुआ था। शाह मंसूर साबरी के वालिद-ए-मोहतरम शाह एज़ाज़ अहमद साबरी के देहांत के बाद 1984 में शाह मंसूर साहब को दरगाह साबिर पाक का सज्जादानशीन बनाया गया था। तब से आज-तक करीब 37 साल मंसूर मियां ने सज्जादगी के फराइज़ो को अंजाम दिया। सज्जादानशीन शाह मंसूर मिया हिंदी, उर्दू, अरबी की तालीमात हासिल रखते थे और हिंदुस्तान के तमाम शहरों के साथ साथ दीगर मुल्कों में भी सूफीईज्म का प्रचार प्रसार किया करते थे।

सज्जादानशीन दरगाह साबिर पाक में साप्ताहिक खत्मशरीफ़ और उर्स में होने वाली तमाम मुख्य रसुमात को अदा करने के साथ-साथ दरगाह हज़रत अब्दुल कुद्दुस गंगोही रह., दरगाह हजरत शमसुद्दीन तुर्क पानीपती व दीगर दरगाहों पर भी रसुमात को अंजाम देते थे। सुफिईज्म को बढ़ावा देने के लिए सज्जादानशीन शाह मंसूर मिया ने विभिन्न जगहों पर जश्न-ए-साबिर पाक मनाने की परंपरा को शुरू कराया जो बदस्तूर जारी है। सज्जादानशीन शाह मंसूर साहब मृदुभाषी, मिलनसार, सहज सरल स्वभाव और नेक दिल इंसान थे। गरीबो की मदद करना, छोटो को अच्छी नसीहत करना उनका स्वभाव था।

बीते 2005 में सज्जादानशीन शाह मंसूर मिया को पैरालिसिस हुआ तभी से वह बीमार चल रहे थे। सज्जादानशीन पांच भाइयों में सबसे बड़े भाई थे, जिनमें शाह मसरूर एज़ाज़ उर्फ शब्बू मिया, शाह वामिक एज़ाज़, शाह मंजर एज़ाज़ उर्फ शिम्मी मियां व शाह शिबली भाई थे, जो सभी इस दुनियां को अलविदा कह गए।
अभी हाल ही में गंगोह शरीफ में होने वाले उर्स में सज्जादानशीन शाह मंसूर एज़ाज़ साबरी ने जुब्बा शरीफ की रसुमात को अदा किया था। शाह मंसूर मिया, हजरत कुरैश मिया साहब से मुरीद थे। चार भाइयों ने पहले ही दुनियां को अलविदा कह दिया था और आज सज्जादानशीन शाह मंसूर एज़ाज़ कुद्दुसी साबरी के देहांत के बाद एक अध्याय का अंत हो गया।

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