कभी BPO में करते थे नौकरी और आज हैं धाकड़ आईपीएस अफसर, खौफ खाते हैं नक्सली

इन दिनों सोशल मीडिया पर एक कामयाब इंसान की कहानी जमकर वायरल हो रही है। जी हां वो इंसान आज आईपीएस है जो कभी 22 साल की उम्र में बीपीओ में नौकरी करता था। दरअसल इस बात काखुलासा तब हुआ जब टनवी नाम की यूजर ने ट्विटर पर ये पूछा की आप 22 साल की उम्र में क्या करते थे। किसी ने लिखा कि पढ़ाई करते थे और किसी ने कहा दोस्तों के साथ मस्ती लेकिन इस बीच सूरज परिहार नाम के ट्विटर हैंडल से ट्वीट आया ‘बीपीओ में नौकरी’ बस फिर क्या था इस आईपीएस की जीवनी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।
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What were you doing at the age of 22?
— Tanvi Madan (@tanvi_madan) January 20, 2021
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आपको बता दें कि सूरज सिंह परिहार 2015 की बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और इस समय छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद प्रभावित जिले दंतेवाड़ा में सहायक पुलिस अधीक्षक (ASP) के रूप में तैनात हैं। दंतेवाड़ा में एएसपी के रूप में कार्यरत् सूरज सिंह परिहार भी नक्सलवादियों से लोहा ले रहे हैं वेकिन साथ ही साथ उनका एक सकारात्मक और मानवीय पहलू यह भी है कि वे नक्सलवाद से जुड़े गुमराह लोगों को देश की मुख्य धारा में लाने की कोशिश भी कर रहे हैं। इसी उद्देश्य से उन्होंने ‘नई सुबह का सूरज’ लघु फिल्म का भी निर्माण किया है। सूरज सिंह परिहार का जन्म उत्तर प्रदेश में जौनपुर के एक छोटे से गाँव में हुआ था। जब सूरज जौनपुर के एक स्थानीय विद्यालय में 5वीं कक्षा में पढ़ रहे थे, तब उनके माता-पिता उन्हें लेकर कानपुर के उप-महानगर जाजमऊ चले आए। सूरज का दाखिला कानपुर के सरस्वती विद्या मंदिर, डिफेंस कॉलोनी में कराया गया। सूरज पढ़ाई के साथ-साथ खेल-कूद और लेखन में भी निपुण थे।
पढ़ाई के दौरान वर्ष 2000 में सूरज ने अपने स्कूल में एक लेखन प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। प्रतियोगिता में सूरज ने एक सुन्दर कविता लिखी, जिसके लिए सूरज के तत्कालीन राष्ट्रपति कोच्चेरील रामन नारायणन ने सूरज को ‘राष्ट्रीय बाल श्री पुरस्कार’ से सम्मानित किया। सूरज ने सरस्वती विद्या मंदिर से 75 प्रतिशत अंकों के साथ 10वीं और फिर 81 प्रतिशत के साथ 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद सूरज ने कानपुर के दयानंद एंग्लो-वैदिक (DAV) कॉलेज से बीए और एमए किया।
2005 से 2007 तक बीपीओ में कॉल सेंटर एक्ज़ीक्यूटिव के पद पर काम किया
सूरज बचपन से ही आईएएस ऑफिसर बनना चाहते थे लेकिन घर की स्थिति खराब थी। सूरज के पिता प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करते थे और सेवानिवृत्त हो चुके थे। बड़ा बेटा होने के कारण सारी जिम्मेदारी सूरज पर आ गई. सपना बड़ा था लेकिन पैसे नहीं थे। इसी कारण वे ग्रेजुएशन करने के बाद दिल्ली से न्यू ओखला इंडस्ट्रियल ऑथोरिटी नोएडा पहुँचे। सबसे पहले सूरज ने हिन्दुस्तान यूनिलीवर में मार्केटिंग कर्मचारी के रूप में नौकरी की लेकिन यह काम उन्हें रास नहीं आया। उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद सूरज ने 2005 से 2007 तक ईएक्सएल बीपीओ में कॉल सेंटर एक्ज़ीक्यूटिव के पद पर कार्य किया। 2008 से 2012 तक उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ महाराष्ट्र में परिवीक्षाकालीन अधिकारी यानी PO की नौकरी की। परिवीक्षाकालीन किसी भी नौकरी का प्रारंभिक काल होता है, जो छह माह का होता है। उसके बाद उसे परमानेंट किया जाता है लेकिन सूरज के लिए नौकरी के साथ-साथ आईपीएस परीक्षा की तैयारी करना मुश्किल हो रहा। दूसरी तरफ वे नौकरी छोड़ भी नहीं सकते थे। वे नौकरी के साथ कई परीक्षाओं की तैयारियाँ करते है, जिसके अंतर्गत 2012 में उन्होंने कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षा दी और वो सफल हुए। उनका सीमा एवं उत्पाद शुल्क विभाग में निरीक्षक के पद पर चयन हो गया।
कई बार हुए असफल लेकिन हार नहीं मानी, चार बार दी यूपीएससी की परीक्षा
सीमा एवं उत्पाद शुल्क विभाग की इस नौकरी के दौरान मिलने वाली एक दिन की छुट्टी को अब सूरज ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की तैयारी में जुट गए जो आईपीएस बनने का सपना पूरा करने का माध्यम था। सूरज ने 2011 में पहली बार यूपीएससी की परीक्षा दी लेकिन असफल हुए। फिर 2012 में उन्होंने दोबारा कोशिश की और इस बार भी वे मेन्स परीक्षा में पास नहीं हो पाए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी वो तैयारी करते रहे। तीसरी कोशिश में उन्हें भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी बनने में सफलता मिली लेकिन सूरज का सपना आईपीएस बनने का था। सूरज ने 2015 में एक बार फिर यानी चौथी बार यूपीएससी की परीक्षा दी और 189 रैंक के साथ पूर्णतः सफल रहे। सूरज आज एक आईपीएस अधिकारी हैं, और अपने कर्तव्य को पूर्ण निष्ठा से निभा रहे हैं।नक्सल इलाके में वो निडर होकर अपनी ड्यूटी कर रहे हैं और साथ ही समाज सुधारने की कोशिश भी कर रहे हैं.
सूरज सिंह परिहार की नियुक्ति जब दंतेवाड़ा में हुई, तो वहाँ के नक्सलियों की स्थिति देख कर वे व्याकुल हो उठे। उन्होंने नक्सलियों के जीवन की असली तसवीर सबके सामने लाने का निर्णय किया। इसी उद्देश्य से सूरज ने एक शॉर्ट फिल्म बनाई।। यह शॉट फिल्म नक्सलवाद की सच्ची घटनाओं पर आधारित है। फिल्म का नाम ‘नई सुबह का सूरज’ है। फिल्म की खास बात यह है कि फिल्म की कहानी सूरज सिंह परिहार ने ही लिखी है। फिल्म के डायलॉग, गीत और कविताएँ भी सूरज ने ही लिखे हैं। फिल्म में एएसपी सूरज की आवाज़ भी है। लगभग 10 मिनट की इस शॉर्ट-फिल्म की शूटिंग दंतेवाड़ा में हुई है। फिल्म में दंतेवाड़ा जिला पुलिस बल और जिला आरक्षी गार्ड (DRG) के 100 जवानों ने ही नक्सलियों की भूमिका निभाई है। इस फिल्म में दंतेवाड़ा में सरेंडर कैडर के नक्सली भी हैं।
