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उत्तराखंड VIDEO : आज उस आंगन में जमी है घास जहां मई-जून के महीने में होता था शोर-शराबा

सतपुली (दीपिका रावत) : ये सूना आंगन, ये उजड़े पत्थर के घर, आंगन में जमी घास बहुत कुछ बयां कर रही है. जैसे मानो रो रहे हो कि आखिर फिर से कब यहां किलकारियां गूंजेंगी…कब इस दहलीज पर कोई पैर रखेगा. कब फिर से इस आंगन के चूल्हे पर खाना बनेगा औऱ आंगन में ही बैठकर खाना खाया जाएगा. कब इस आंगन में फिर से सट्टी की कुटाई होगी.

आज वो आंगन सूना है जहां मई जून के महीने में होता था शोर-शराबा

उत्तराखंड में पलायन का दंश इस कदर फैला है कि पहाड़ के आंसू भी सूखने मुश्किल हैं. जिस आंगन में कभी हर साल मई जून के महीने में नाती-पोते आकर खेला करते थे वो आंगन आज सूना है या यूं कहें की सूने से भी बदतर हालत गांवों की हो गई है. आंगनों में कोई दस्तक नहीं दे रहा है. आंगन में बड़ी-बड़ी घास जम गई है मानो चीख-चीख कर कह रही हो कि कहां गए वो दिन…कहां गए वो दाने-सयाने, कहां गई वो बेटियां और बेटे, कहां गए वो नाती-पोते जो इस आंगन में खेलते थे, लड़ते थे, गिरते-पड़ते थे.

कभी आंगन के आगे से गुजरते हुए कइयों को करते थे नमस्ते

आज जब भी ऐसे ही घरों के आगे से गुजरते हैं तो दिल भारी हो जाता है और उन दिनों को याद करता है जब हम वहां से गुजरते हुए नाना-नानी, दादा-दादी, मामा-मामी, चाचा-चाची, फूफू को नमस्ते और पैर छूकर जाते थे.

ये तस्वीर सतपुली से 5 किलोमीटर दूर मलेठी गांव की

आप जो वीडियो देख रहे हैं ये तस्वीर सतपुली से 5 किलोमीटर दूर मलेठी गांव की है. जहां अधिकतर घर खाली हो गए हैं. औऱ खेत बंजर पड़े हैं. गाय बछड़े भी कम दिखाई देते हैं. घर के आंगनों में कई फीट लंबी घास जमी है. झाड़ियों पर निकले कांटों को देख ऐसा लगता है जैसे दिल में सूल चुभ रहा हो.. खेतों में कोई दिखाई ही नहीं दे रहे, न साग-सब्जी है और ना ही पेड़ों में आम. पूरा पहाड़ औऱ गांव खून के आंसू रो रहे हैं कि आखिर कब वो दिन लौटेंगे. कब गांव फिर से आबाद होंगे.

शिक्षा, रोजगार और मूलभूत सुविधाएं न मिलने के कारण शहरों में जा बसे लोग

शिक्षा, रोजगार और मूलभूत सुविधाएं न मिलने के कारण लोग शहरों में जा बसे हैं और गांव वीरान हो गए हैं. लोगों का कहना है कि अगर ये सभी सुविधाएं उन्हें गांवों में पहाड़ों में मिले तो वो शहरों का रुख नहीं करेंगे लेकिन वो पलायन करने को मजबूर हैं.

हमारी सरकार से एक ही गुजारिश ही कि पहाड़ और पहा़ड़ के गांवों को फिर से आबाद करें…वरना एक दिन ऐसा आएगा जब पहाड़ औऱ पहाड़ के ये गांव पूरी तरह से तबाह हो जाएंगे.

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