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Uttarakhand Election : कभी शक्ति प्रदर्शन से नहीं गिने-चुने पोस्टरों से होता था प्रचार, ऐसे होता था 60 के दशक में चुनाव

आजकल चुनावों में प्रचार के लिए करोड़ों खर्च किए जाते हैं। सोशल मीडिया से लेकर कई अन्य माध्यमों के जरिए प्रचार किया जाता है। लेकिन क्या आपको पता है कभी केवल पोस्टरों के जरिए प्रचार किया जाता था। वो भी गिने-चुने पोस्टरों के जरिए चुनाव प्रचार किया जाता है।

किसी प्रकार का नहीं होता था शक्ति प्रदर्शन

60 के दशक में चुनाव प्रचार बेहद ही सादे तरीके से किया जाता था। प्रचार के लिए किसी भी प्रकार का शक्ति प्रदर्शन भी नहीं किया जाता था। केवल गाेष्ठियों के माध्यम से चुनावी रैली की जाती थी। हालांकि चुनाव प्रचार के लिए पोस्टरों का उपयोग किया जाता था। लेकिन वो भी गिने-चुने होते थे।

चुनावों में नहीं होता था धनबल का प्रयोग

60 के दशक में चुनाव प्रचार के लिए पोस्टर चिपकाए जाते थे। उस दौरान चुनाव प्रचार के लिए धनबल का प्रयोग नहीं किया जाता था। ग्राम प्रधानों को उनके गांव के हिसाब से गिने चुने पोस्टर दिए जाते थे। बता दें कि उस दौर में यातायात के साधन बेहद ही कम होते थे।यातायात के साधन कम होने के कारण ग्राम प्रधानों को 15 दिन पहले चुनावी बस्ते बांट दिए जाते थे।

बांटे जाते थे चुनावी बस्ते

प्रचार के लिए ग्राम प्रधानों को चुनावी बस्ते दिए जाते थे। जिला मुख्यालय से चुनावी बस्तों को गांवों तक पहुंचाने के लिए मजदूर लगाए जाते थे। इसके साथ ही मतदान केंद्रों तक चुनाव अधिकारियों का सामान पहुंचाने के लिए भी मजदूर लगाए जाते थे। इसके लिए गांवों से मजदूरों को पहले ही बुक कर लिया जाता था।

Yogita Bisht

योगिता बिष्ट उत्तराखंड की युवा पत्रकार हैं और राजनीतिक और सामाजिक हलचलों पर पैनी नजर रखती हैंं। योगिता को डिजिटल मीडिया में कंटेंट क्रिएशन का खासा अनुभव है।
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