
जून की 29 तारीख हो चुकी है। ये तारीक पहाड़ को हर साल रुला जाती है। कुछ दिनों के लिए थोड़ा सा ही सही भरा हुआ फिर से पहाड़ रीतने लगता है। जून की 30 तारीख आते-आते पहाड़ और गांव फिर से वीरान होने लगते हैं। गांव के आंगन में छोटे-छोटे कदमों से दौड़ते नौनीहाल और उनको तिबारी में बैठे दादा का बार-बार कहना गिरना मत…ये आवाज और रौनक अब सालभर बाद ही नजर आएगी। जून, जिन घरों के दरवाजे खोलता है। वो दरवाजे जुलाई आते-आते फिर से बंद होने लगे हैं। चहल-पहल, वीरानी में बदलने लगी है।
ये जून तू फिर जल्दी लौट आना और अपने साथ मेरी लुटी हुई खुशहाली भी लेकर आना
पहाड़ कह रहा है कि ये जून तू फिर जल्दी लौट आना और अपने साथ मेरी लुटी हुई खुशहाली भी लेकर आना…जून माह पलायन से वीरान और तबाह पहाड़ के जख्मों पर मलहम मलने जैसा है। वीरान पहड़ों की वादियां साल में एक बार जून माह में ही गुलजार नजर आती हैं। किसी गांव में रामलीला, तो किसी गांव में सांस्कृतिक कार्यक्रम तो किसी गांव में वीर अभिमन्यु नाटक लोगों को जोड़ते हैं। ये कार्यक्रम भी केवल जून माह में ही होते हैं। इसलिए पहाड़ हर बार सोचता होगा कि ये जून तू फिर लौट आना।
बेटियां भी अब जून में ही गांव आती हैं
बेटियां भी अब जून में ही गांव आती हैं। पहले त्योहारों में आया करती थी। उन बेटियों को बहनों, भाई, भाभी, भतीजी या भीतीजों को जीभर कर प्यार करने का मौका भी जून ही देता है। फिर वो क्यों ना सोचे कि ये जून तू फिर जल्दी लौट आना।गांवों का वीरानापन सोचता होगा कि काश पूरा साल ही जून हो जाता। जून खत्म ही नहीं होता। बना रहता। अनवरत चलता रहता। बाजार जैसे स्कूल गांव आ जाते। बाजार जैसे अस्पताल गांव में बन जाते। बाजार की तरह सुविधाएं गांव आ जाती। बाजार की हर सुख-सुविधा गांव में दस्तक दे देती। सरकार गांव में आकर रहने लगती। सरकार के नुमायंदे गांव में बसते। काश कि सरकार ही गांव आ जाती।…
प्रदीप रावत (रवांल्टा)