
मोरी: मोरी तहसील के दोधी गांव में पारंपरिक मेला जागड़ा होता है। वैसे तो ये मेला सांस्कृत महत्व रखता है, लेकिन यहां जो भी पहली बार जाता है। वो दांतों तले अंगुलियां दबाने को मजबूर हो जाते हैं। देवता का पाश्वा एक हाथ से डांगरी और दूसरे हाथ से रस्से को पकड़कर कई बार नीचे-ऊपर जाता है। ऐसा या तो सर्कस में ही होता है सा फिर कोई प्रशिक्षित कलाकार ही इसे कर पाता है। लेकिन, यहां जो होता है। वो वास्तव में किसी दैविये शक्ति और चमत्कार से कम नहीं है।
देवता का पाश्वा पैरों के अगूंठों से रस्सी को पकड़ कर रस्सी पर करतब दिखाते हुए रस्से के ऊपर जाते हैं। रस्सी का किनारा मंदिर से बंधा होता है। जबकि दूसरा किनारा मंदिर में लोग पकड़े रहते हैं। यानि जरा की गड़बड़ और रस्सी पर जा रहा देवता का पाश्वा सीधे नीचे, लेकिन सैकड़ों सालों से चल रहे इस मेले में आज तक कोई हासदा नहीं हुआ।
रस्से पर कोई एक या दो बार नहीं जात। बल्कि बार-बार चढ़ा और उतरा जाता है, जिसमें करीब 15 मिनट का समय लगता है। रस्से पर शेड़कुड़िया देवता का पश्वा आता है, जिस पर देचता अवतरित होता है। स्थानीय मान्यता और परंपरानुसार इसको लड़ा पड़ना कहा जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान देवता के भक्तों का शोर रोमांच पैदा करता है। वहीं, देवता की जय-जयकार लोगों के आस्था का आभास कराती है।