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उत्तराखंड: महावत और हथिनी की कहानी, रिटायरमेंट के बाद फिर लौट आए आशा के पास

# Uttarakhand Assembly Elections 2022

हल्द्वानी: बेजुबानों से लोगों के प्यार की कहानियां खूब पढ़ी और सुनी होंगी। ऐसी ही एक कहानी रामनगर के शरीफ की भी है। कहते हैं कि जानवर बेजुबान होते हैं, लेकिन ऐसा है नहीं। जानवरों की भी जुबान होती है। रामनगर के शरीफ का हथिनी आशा संग रिश्ता घर के किसी सदस्य की तरह ही है। यही वजह है कि कार्बेट के महावत के तौर पर रिटायर होने के बाद भी शरीफ से आशा हथिनी को जुदा नहीं किया गया।

अफसर भी मानते हैं कि शरीफ के इशारों और आवाज को समझ जिस तरह आशा रेस्क्यू अभियान का अहम हिस्सा बन जाती है। वह कोई दूसरा नहीं कर सकता। इसलिए फरवरी में महावत के पद से सेवानिवृत्त होने के बावजूद शरीफ को दोबारा आशा की जिम्मेदारी मिली। ढिकाला से फतेहपुर तक का पैदल सफर कर दोनों फतेहपुर के जंगल में पहुंच चुके हैं।

हमलावर बाघ को तलाशने का अभियान शुरू होगा। घने जंगल में आशा के साथ से बाघ को तलाशने का काम शरीफ करेगा। काम में जोखिम भी है। लेकिन दोनों इन परिस्थतियों में एक-दूसरे का साथ देना पिछले 18 साल से जानते हैं। फतेहपुर रेंज के जंगल में पिछले जनवरी और फरवरी में बाघ तीन लोगों को मौत के घाट उतार चुका है। वन मुख्यालय से अनुमति मिलने के बाद अब हथिनियों की मदद से घने जंगल में बाघ को तलाशा जाएगा।

कार्बेट के ढिकाला जोन से दो हथिनी फतेहपुर रेंज पहुंच चुकी है। इनका नाम है आशा और गोमती। आशा को 2002 में असम के काजीरंगा नेशनल पार्क से कार्बेट में गश्त के लिए लाया गया था। एक साल बाद यानी 2003 से उससे काम लेना शुरू किया गया। तब से रामनगर के शरीफ महावत के तौर पर उसके संग रहते हैं।

लंबे समय तक पर्यटकों को आशा की पीठ पर बैठा कार्बेट की सैर भी करवाई गई। छह बार आशा टाइगर रेस्क्यू कर चुकी है। हर अभियान में उसकी कमान शरीफ के हाथ में थी। शरीफ के मुताबिक टाइगर रेस्क्यू के दौरान हथिनी के साथ महावत को भी खासा सतर्क रहना पड़ता है। क्योंकि, बाघ की दहाड़ हाथी को भी पीछे धकेल सकती है। मगर दोनों के बीच बेहतर सामंजस्य होने के कारण ऐसी नौबत अभी तक नहीं आई। आशा और शरीफ के बीच दोस्ताना रिश्ता होने के कारण विभाग ने फरवरी में रिटायरमेंट के बावजूद शरीफ को दोबारा ड्यूटी में बुला लिया।

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