highlightChampawat

पहाड़ों पर जंगलों के लिए अभिशाप पिरूल बना रोजगार का जरिया, संवार रहा महिलाओं की जिंदगी

चीड़ के पेड़ों को जंगल के लिए सबसे खतरनाक माना जाता है। इन्हें जंगलों में आग लगने का सबसे प्रमुख कारण माना जाता है। लेकिन जंगलों के लिए खतरनाक पिरूल अब महिलाओं के लिए रोजगार के साधन बन गया है।

पिरूल बना रोजगार का जरिया

पहाड़ों पर चीड़ के पेड़ बहुतायत में पाए जाते हैं। इन पेड़ों के पिरूल को जंगलों के लिए सबसे खतरनाक माना जाता है। इन्हें जंगलों में आग लगने का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। लेकिन अब यही पिरूल गांवों में महिलाओं की जिदंगी संवार रहा है।

महिलाओं की जिदंगी के साथ पर्यावरण को रहा संवार

चीड़ के पेड़ से प्राप्त होने वाला पिरूल महिलाओं को रोजगार देने के साथ ही अपने उत्पादों से पर्यावरण को भी संवारने का काम कर रहा है। चंपावत में महिलाएं पिरूल से बैग, पर्स, टोपी, टोकरी, टी कोस्टर, राखी से लेकर आभूषण तक बना रही हैं।

champawat

जिससे उनकी अच्छी कमाई हो रही है। इन सामानों की लगातार बढ़ती मांग ग्रामीणों के लिए आमदनी का सशक्त जरिया भी बन रहा है।

चीड़ बाहुल्य जिला है चंपावत

चंपावत जिला चीड़ बाहुल्य जिला है। यहां पर 95 हजार हेक्टेयर में से 27,292 हेक्टेयर पर चीड़ के ही जंगल हैं। चंपावत, काली कुमाऊं, देवीधुरा, भिंगराड़ा और लोहाघाट वन क्षेत्र में मुख्य रूप से चीड़ के पेड़ हैं।

champawat

चंपावत में पाइन प्लस रुरल संस्था ने लोहाघाट और खेतीखान क्षेत्र के कुछ गांवों में पिरूल को रोजगार से जोड़ा है। जिसमें उन्हें इस से पर्यावरण अनुकूल उत्पाद बनाना सिखाया जाता है।

पिरूल से बनाए जा रहे पर्यावरण अनुकूल उत्पाद

ज्वलनशील चीड़ की पत्तियों पिरूल से महिलाएं पर्यावरण अनुकूल उत्पाद बना रही हैं। महिलाएं पिरूल से टोकरी, टोपी, टी कोस्टर, बैग, पर्स, राखी से लेकर आभूषण (कर्णफूल और गले का हार) तक बना रही हैं।

champawat

जंगल से पिरूल इकट्ठा करने से लेकर उत्तपाद बनाने तक का काम इस क्षेत्र के गांवों की 40 महिलाएं कर रही हैं। इन उत्पादों की पिछले साल से ऑनलाइन और सीधे बिक्री भी शुरू कर दी गई है।

Yogita Bisht

योगिता बिष्ट उत्तराखंड की युवा पत्रकार हैं और राजनीतिक और सामाजिक हलचलों पर पैनी नजर रखती हैंं। योगिता को डिजिटल मीडिया में कंटेंट क्रिएशन का खासा अनुभव है।
Back to top button