क्या सक्रिय राजनीति से सन्यास लेंगे हरीश रावत ?

देहरादून : पूर्व सीएम हरीश रावत जिन्हें प्यार से हरदा के नाम से भी पुकारा जाता है, हमेशा सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं लेकिन कुछ दिनों से वो गायब से हो गए हैं। हरीश रावत ने खुद सोशल मीडिया पर पोस्ट के जरिए ये साझा किया था कि वो अगले 3 माह से भी ज्यादा समय तक, मार्च तक अपने सारे सार्वजनिक कार्यक्रम स्थगित कर रहे हैं।

आज जब मैं राजनीति में रहने या न रहने के प्रश्न पर गम्भीर चिन्तन कर रहा हॅू-हरदा

लेकिन आज हरीश रावत ने सोशल मीडिया पर एक लंबी चोड़ी पोस्ट लिखी है जिसे कई सवाल मन में खड़े हो रहे हैं कि क्या हरीर रावत राजनीति से सन्यास लेंगे? हरीश रावत ने पोस्ट की शुरुआत ‘हां समय आ गया है’ से कि है। हरीश रावत ने लिखा है कि आज जब मैं राजनीति में रहने या न रहने के प्रश्न पर गम्भीर चिन्तन कर रहा हॅू, मेरी यही जिद, आज उत्तराखण्ड के साथ है या थी। मैं उत्तराखण्ड को अपने आपको हरीश रावत के रूप में याद किये जाने को मजबूर करूंगा। मैंने मुख्यमंत्री के रूप में उत्तराखण्ड के लिये वह सब कुछ किया, जो एक मुख्यमंत्री लगभग 3 वर्ष के कार्यकाल में कर सकता था। मुख्यमंत्री के रूप में मेरे सम्मुख हिमालय सरिखी चुनौती थी, भयंकर दैवीय आपदा से राज्य को मानसिक, भौतिक व आर्थिक रूप से पुनः खड़ा कर, आगे बढ़ाने की। चारधाम यात्रा व पर्यटन को पुनः प्रारम्भ करना ही एक बड़ा कार्य था।

सक्रिय राजनीति में बने रहना, कोई सामान्य निर्णय नहीं होता है-हरदा

हाॅं समय आ गया है
सक्रिय राजनीति में बने रहना, कोई सामान्य निर्णय नहीं होता है। यदि आप सत्तर वर्ष की लक्ष्मण रेखा को पार कर चुके हैं तो, इस रेखा से आगे बढ़ कर सक्रिय राजनीति में रहना सामान्य निर्णय नहीं है। व्यक्ति को अपनी शाररिक क्षमता व पारिवारिक स्थिति दोनों का आकंलन करना होता है। सक्रिय राजनीति वह भी प्रतिस्पर्धात्मक राजनीति में बने रहना, बढ़ती उम्र के साथ अत्यधिक कठिन कार्य है। उम्र के साथ आपका दायरा व आपसे अपेक्षायें, दोनों बढ़ती जाती हैं। चुनावीं राजनीति में आपकी वरिष्ठता आपसे अपेक्षायें बढ़ाती जाती हैं। मतदाताओं से लेकर पार्टी के सहयोगी व कुटम्बीजन, सबकी अपेक्षायें बढ़ जाती हैं। उन्हें लगता है आपकी वरिष्ठता को देखते हुये आपकी अनसुनी हो ही नहीं सकती है। ‘‘आपका तो कहना भर काफी है’’ यह एक आम जुमला है, जो आपको सुनना ही है। सर हिलाने के अलावा आपके पास कुछ कहने को नहीं होता है। आपको आलोचकों के प्रति अधिक संवेदनशील होना पड़ता है। उम्र, आपसे अधिक सहनशीलता व एकोमोडेटिव होने की अपेक्षा करती है। जबकि धरातलीय वस्तु स्थिति इसके विपरित होती है। उम्र के साथ आपकी काम के पीछे पड़ने की क्षमता कम होती जाती है। आप अधिक भाग-दौड़ नहीं कर पाते हैं। आप अनौपचारिक से औपचारिक अधिक हो जाते हैं। आप आक्रमक नहीं हो सकते हैं, इसलिये लोग आपकी गारेन्टेड लेने लगते हैं। लोग जानते हैं, कुछ भी करो आप उन्हें नुकसान नहीं पहुंचायेंगे। पार्टी या क्षेत्रीय राजनीति में लोग आपका स्थान लेना चाहेंगे, जो स्वभाविक है। वरिष्ठता आपका कद बढ़ाती है, तो उसकी चाह रखने वालों की संख्या भी स्वतः बढ़ती है। आपको प्रत्येक स्थिति में प्रतियोगित्मक रहना पड़ता है। प्रतियोगिता तीव्रतर होती जाती है और आपकी शाररिक व मानसिक फिटनेस घटती जाती है। पारिवारिक जिम्मेदारियां भी बढ़ते-2 बहुत बढ़ चुकी होती हैं।

यह लाॅ ऑफ नैचुरल डिकेईगं है-हरदा

यह एक सामान्य कथानक है, जिसे 65-70 वर्ष के आस-पास प्रत्येक राजनैतिक व्यकितत्व को झेलना पड़ता है, यदि सबको नहीं तो 75 प्रतिशत लोगों को इस स्थिति से गुजरना ही पड़ता है। यह लाॅ ऑफ नैचुरल डिकेईगं है। स्वभाविक क्षमता क्षरण है। यह क्रिया स्वयं मंे प्रातकृतिक न्याय भी है। राजनैतिक, सामाजिक क्षेत्र में सुधार लाने के लिये आवश्यक है। कुछ लोग इसके अपवाद हो सकते हैं। देश में अनेक ऐसे नाम हैं, जो ओल्ड इज गोल्ड की कहावत को सही रूप में चरितार्थ कर रहे हैं। बढ़ते समय के साथ देश व पार्टी में उनका स्थान और प्रभावी होता जाता है। ऐसे लोग नेतृत्व कहलाते हैं, उनकी स्वीकार्यता, प्रतिद्वन्दिता की सीमा रेखा से आगे बढ़ चुकी होती है। इस तथ्य के बावजूद मेरी समझ में ऐसे लोगों के लिये भी स्वनिर्धारित कट आॅफ लाईन होनी चाहिये। पार्टी व समाज दोनों के लिये नेतृत्व मार्गदर्शक व उदाहरण हो सकता है, मगर आज के प्रतिस्पर्धी युग में ठहराव के लिये कोई स्थान नहीं है। ठहराव को गति को स्थान देना चाहिये, यही स्वस्थ नियती है। देश की कुछ पार्टियों में एजिंग फैक्टर चिन्ताजनक स्थिति में है। हमारी पार्टी में भी इस स्थिति को आने से रोकने का प्रयास किया गया, जो कुछ सीमा तक सफल रहा है। हमें पार्टी के तौर पर आगे बढ़ने के लिये इस प्रयास को और अधिक अवसर देना चाहिये। एक अच्छी जिताऊ क्रिकेट टीम में अनुभव व युवापन का सामंनजस्य रखा जाता है। अन्यथा स्थिति में कभी भी ज्यादा अनुभवी टीम एकाएक खेल से उखड़ जाती है और लगातार लड़खड़ाने लगती है। हमारी पार्टी की कुछ हारों का विष्लेशण भी इस कथानक की पुष्टी करता है। एक भविष्य की पार्टी को ‘‘गो यंग’’ के सिद्धान्त को दृढ़ता से अमल में लाना चाहिये और एकाध हार से घबराना नहीं चाहिये। युवा को लगातार अवसर व विश्वास देना पार्टी के लिये आवश्यक है।

मैंने दोनों बार खतरा उठाकर भी युवाओं को मौका दिया-हरदा

खैर यह सब सैद्धान्तिक बहस या प्रतिक्रिया का हिस्सा है। मैं व्यक्ति के तौर पर अपना मूल्यांकन करना चाहता हॅू। राज्य में 50 वर्ष से नीचे का हिस्सा 80 प्रतिशत उत्तरदायित्व को सभाले इसे सुनिश्चित करने में मुझे अपना योगदान देना चाहिये। वर्ष 2002 में व 2017 में यह मौका मेरे हाथ में आया। मुझे खुशी है, मैंने दोनों बार खतरा उठाकर भी युवाओं को मौका दिया। आज पार्टी का अग्रणीय दस्ता ऐसे ही युवाओं का है। इनमें से अधिकांश युवा पर्याप्त सम्भावनाओं युक्त है और राज्य के युवा व चुनौतीपूर्ण स्वरूप के अनुरूप हैं। ऐसे युवाओं को एक से अधिक बार अवसर दिये जाने चाहिये। यदि वे राजनीति व समाज दोनों में सक्रीय हैं, तो उन्हें उनके स्थान की सुरक्षा का भरौसा भी होना चाहिये। मेरी उम्र के लोगों को उन्हें सलाह व प्रोत्साहन देने के लिये सहज तत्पर रहना आवश्यक है। 2003-4 में पंचायतों व नगर पंचायतों को मैंने बड़ी संख्या में युवाओं को अवसर दिया और उन्होंने मुझे निराश नहीं किया। इस बार 11 विधायकों में सात युवा या अधेड़ हैं। विधानसभा की कार्यवाही व वाद-विवाद में अपना अच्छा प्रभाव छोड़ रहे हैं। लोकसभा के चुनाव हम चूक गये। मुझे स्वयं अपने स्थान में अपने पुत्र को प्रस्तावित करना चाहिये था। पौड़ी में पार्टी साहस कर पायी, चुनाव भले ही हार गये, मगर अगले 20 वर्षों की सम्भावना खड़ी हो गई है। राष्ट्रीय स्तर पर भी हमें लगातार युवा नेतृत्व पर भरौसा बनाये रखना चाहिये।

मैंने विधिवत 1969 में लखनऊ विश्वविद्यालय में कांग्रेस की सदस्यता ली थी। छात्रसंघ के एक शिष्टमण्डल के साथ हम लोग श्रीमती गाॅधी को लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रों को संबोधित करने हेतु निमंत्रण देने गये थे। श्रीमती गाॅधी आयी, सारे विश्वविद्यालय को जीतकर चली गई। उस समय श्रीमती गाॅधी यूथ आईकाॅन थी। उन्होंने कई क्रान्तिकारी कदम उठाकर युवाओं के मन को जीत लिया था। मैं और मेरे सैकड़ों साथी उसी सम्मोहन में बधकर कांग्रेस से जुड़े। कई लोग आज भी कांग्रेस में हैं। कुछ समय के साथ भटक गये हैं। यूं मैं छात्र राजनीति व कम्यूनिष्ट विचारधारा से थोड़ा-2 सन् 1967 से जुड़ गया था। वर्ष 2020 के आगमन के साथ मुझे कांग्रेस की सक्रिय राजनीति में 52 वर्ष हो जायेंगे व राजनीति में 55 वर्ष। मैं कांग्रेस में बालिका वधु के तौर पर आया, अब घर की दादी माॅ हॅू। कई उतार-चढ़ाव देखे, पार्टी के जीवन में भी व अपने जीवन में भी। कई बार गिरा फिर संभला और आगे बढ़ता गया।

हरीश रावत ने लिखा कि मैं सार्वजनिक जीवन में ग्रामसभा, ब्लाॅक, विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा, राज्यमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्री के पदों को नवाज चुका हॅू। पार्टी में युवा कांग्रेस के जिलाध्यक्ष से राष्ट्रीय महासचिव, जिला कांग्रेस, पिथौरागढ़ के अध्यक्ष से प्रदेश अध्यक्ष व पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव व कार्यसमिति के सदस्य के पद पर भी विराजमान हो चुका हॅू। कर्मचारियों के राष्ट्रीय परिसंघ के अध्यक्ष के साथ कांग्रेस सेवादल का भी कर्ताधर्ता रह चुका हॅू। लगभग 25 वर्षों के संसदीय अनुभव के साथ पार्टी के संसदीय दल का मुख्य सचेतक भी रह चुका हॅू। मैं जितने चुनाव जीता, उतने हारा भी हॅू। निश्चय ही प्रत्येक पराजय ने जय हासिल करने के मेरे विनिश्चय को मजबूत बनाया है। वर्ष 1991 की लोकसभा हार व 2017 की 2 विधानसभाओं की हार ने जीत के लिये मेेरी चाहत को और प्रबल बना दिया है। 1991 की लोकसभा की हार के समय, मैं एक अतिसक्रीय जन समर्पित प्रभावी सांसद था। मेरा जनसम्पर्क श्रेष्ठ था। मुझे किसी भी परिस्थिति में हारना नहीं चाहिये था। मैं हारा लगातार हारा, मगर मैंने हराने वालों को हरीश रावत नाम को भूलने नहीं दिया। लोगों ने जिनको मुझे हराकर जिताया, उनको अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र खुद भी याद नहीं रख पाया। मैं उन्हें आज भी याद आता हॅू, कुछ को गुस्से के साथ, कुछ को प्यार के साथ। मैं दावे के साथ कह सकता हॅू कि, इस संसदीय क्षेत्र के जितने लोग वर्तमान सांसद को जानते होंगे, उनसे कुछ अधिक ही लोग 1991 के डिस्कार्डेड हरीश रावत को जानते हैं।

आगे लिखा कि आज जब मैं राजनीति में रहने या न रहने के प्रश्न पर गम्भीर चिन्तन कर रहा हॅू, मेरी यही जिद, आज उत्तराखण्ड के साथ है या थी। मैं उत्तराखण्ड को अपने आपको हरीश रावत के रूप में याद किये जाने को मजबूर करूंगा। मैंने मुख्यमंत्री के रूप में उत्तराखण्ड के लिये वह सब कुछ किया, जो एक मुख्यमंत्री लगभग 3 वर्ष के कार्यकाल में कर सकता था। मुख्यमंत्री के रूप में मेरे सम्मुख हिमालय सरिखी चुनौती थी, भयंकर दैवीय आपदा से राज्य को मानसिक, भौतिक व आर्थिक रूप से पुनः खड़ा कर, आगे बढ़ाने की। चारधाम यात्रा व पर्यटन को पुनः प्रारम्भ करना ही एक बड़ा कार्य था। एक सुव्यवस्थित प्लानिंग व समर्पित टीम का चयन आवश्यक था। एक विश्वस्थ हुंकार भरना व जोखिमपूर्ण निर्णय लेना, समय की पुकार थी। मैंने यात्रा तीन वर्ष के लिये स्थगित करने की गम्भीर सलाहों को एक तरफ रख, वर्ष 2014 में ही यात्रा संचालित करने का निर्णय लिया। लोगों में हिम्मत भरने के लिये, मैंने वर्ष भर यात्रा अर्थात शीतकालीन यात्रा संचालन का भी निर्णय लिया। भगवान शम्भू केदार जी के आर्शीवाद से सब कुछ चल निकला। 3 वर्ष निर्विघ्न सफल यात्रा चली और अब चारधाम यात्रा हर वर्ष अपना ही पुराना रिकाॅर्ड तोड़ रही है। सैकड़ों लोगों के कठोर तप पूर्ण सहयोग व परिश्रम से यह सम्भव हो पाया है। आज भगवान शिव की नगरी केदार की भव्यता सब कुछ बयां कर रही है। श्रेय लूटने के युग में भी लोग श्रेय लूट नहीं पा रहे हैं। इतना ही जोखिमपूर्ण कार्य था, नन्दा राजजात यात्रा का संचालन। यात्रा क्षेत्र, केदार क्षेत्र की तरह ही क्षत-विक्षत था। यात्रा माॅ नन्दा की कृपा से अद्भूत व विशालतम रही और अपने पीछे सफलतम यात्रा की गाथा छोड़ गई। आज क्षत-विक्षत नन्दा राजजात यात्रा का क्षेत्र पहले से ज्यादा सुन्दर व संवारा हुआ है। अर्द्धकुम्भ का आयोजन भी धन के अभाव में बड़ा सवाल था। सफल आयोजन हुआ, पूर्व के पूर्ण कुम्भों से अधिक स्थायी निर्माण हुये। हरिद्वार क्षेत्र में हुये निर्माण आज पूर्ण कुम्भ के आयोजकों के सम्मुख चुनौती बनकर खड़े हैं।
दैवीय आपदा ने राज्य के बुनियादी ढांचे को चरमरा दिया था। विकास दर लगभग 2 प्रतिशत पर आ गई थी। उद्योगों में सैथिल्य, विद्युत उत्पादन में भारी घटौत्तरी के साथ हम पाॅवर कट स्टेट हो गये थे। नेशनल हाईवेज सहित सभी सड़कें खस्ता हालात में थी। स्कूल, पेयजल, पुल-पुलिया चीख-2 कर आपदा की कहानी बयां कर रहे थे। मैंने आते ही 24 घण्टे सबसे सस्ती बिजली का ऐलान कर उद्योग की हिम्मत बड़ाई। अतिलघु, लघु, मध्यम व बड़े उद्योगों के लिये नई प्रोत्साहन नीति बनाई। जल विद्युत उत्पादन की नई नीति बनाई। उद्योग को भरोसा देने के लिये मैंने व्यवस्थागत सुधारों पर जोर दिया। परिणाम सार्थक रहे, एक वक्त इज इन डूंईग बिजनस में हमारी नेशनल रैंकिंग नम्बर 2 थी, जो 2017 में नम्बर-9 पर आकर ठहर गई थी। विद्युत क्षेत्र के तीनों निगमों, कुमाऊं मण्डल विकास निगम और परिवहन निगम को भारी घाटे से उभार कर लाभ में लाना, स्वयं मेरे लिये अचम्भे से कम नहीं था। आप लघु व सूक्ष्म उद्योग के क्षेत्र को देखिये, सर्वाधिक उद्योग तुलनात्मक प्रतिशत में मेरे कार्यकाल में उद्योग स्थापित हुये। मैंने एक भी स्थापित उद्योग को बन्द नहीं होने दिया। मैं जानता था, रोजगार सृजन की गति को बिना बढ़ाये तथा कर्मचारियों के साथ सुखद संवाद स्थापित किये आप राज्य को आगे नहीं बड़ा सकते हैं। कानून व्यवस्था में सुधार के लिये, ये दो प्रमुख आंतरिक चुनौतियां हैं, जिनकी कोई भी मुख्यमंत्री अनदेखी नहीं कर सकता है। मैंने इस दिशा में सघन प्रयास किये। नये रोजगार सृजन के लिये मैंने अपने अनुभव जन्य कौशल का भरपूर उपयोग किया। आप अनुमान लगा सकते हैं, जिस वक्त मैंने कार्यभार संभाला राज्य में बेरोजगारी की वार्षिक वृद्धि दर तेरह प्रतिशत थी। यह देश में सर्वाधिक थी। मैंने 2017 में जब नये मुख्यमंत्री को दायित्व सौंपा। उस वक्त यह दर घटकर ढाई प्रतिशत आ गई थी। मैं तीन छोटे उदाहरणों के साथ कहना चाहता हॅू कि, सम्भावनायें कैसे तलाशी व तरासी जाती हैं। वन निगम के वित्त पोषण से ईकोटूरिज्म काॅरपोरेशन का गठन, दो हजार छोटे ऊर्जा सृजकों का चयन व पोषण, पर्यटक गाइड कोर्सेज को प्रारम्भ करना। मैंने छोटे उपायों को आगे बढ़ाने के लिये भारत सरकार की एक स्वायित्वशासी संस्था निसबड़ को राज्य का ट्रेनिंग पार्टनर बनाया। मुझे खुशी है, कुछ सुधार के साथ आजीविका मिशन के तहत यह अभियान आज भी आगे बढ़ रहा है। मैं रोजगार सृजन के अवसरों की तलाश व उन्हें उत्तराखण्ड के अनुरूप तलाशने में हमेशा संलग्न रहता था। मेरे कुल चिन्तन का एक बड़ा हिस्सा, इस क्षेत्र में खर्च होता था। परिणाम सार्थक रहे, जो आज भी लक्षित किये जा सकते हैं। राज्य की आय संवर्धन के लिये चैमुखी प्रयास आवश्यक थे। मुझे खुशी है, 2017 के निर्वाचन में जाते वक्त मैं, राज्य की राजस्व वृद्धि दर को साढ़े उन्नीस प्रतिशत तक बढ़ाने में सफल रहा।
क्रमशः अगले अंक में।
(हरीश रावत)

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