क्या होता है जब मस्तिष्क में जाता है कोरोना वायरस, जानिए कैसे आपके दिमाग़ को पहुंचा सकता है नुकसान?

कोरोना की पहली और दूसरी लहर ने दुनियाभर में कहर बरपाया। कई जानें ली. वहीं कोरोना से जूझने के बाद लाखों लोग इससे उबर तो गए हैं, लेकिन हाल ​के दिनों में सामने आई लॉन्ग कोविड की स्थिति ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों को चिंता में डाल दिया है. लॉन्ग कोविड एक ऐसी स्थिति है, जिसमें कोविड-19 का सामना करने वाले बहुत से लोगों को लंबे समय तक इस बीमारी के लक्षणों को झेलना पड़ता है.

अध्ययनों से पता चलता है कि कोरोना से संक्रमित लोगों में से कम से कम 5 से 24 फीसदी लोगों में संक्रमण के कम से कम 3 से 4 महीने बाद तक इसके लक्षण बने रहते हैं. लॉन्ग कोविड के जोखिम को अब उम्र या कोविड की बीमारी की प्रारंभिक गंभीरता से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ नहीं माना जाता है. इसलिए कम उम्र के लोगों में और शुरू में हल्के कोविड वाले लोगों में अभी भी लॉन्ग कोरोना के लक्षण विकसित हो सकते हैं.

लॉन्ग कोविड को लेकर ऑस्‍ट्रेलिया के मेलबॉर्न में फ्लोरी इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस एंड मेंटल हेल्थ के रिसर्चर्स ट्रेवर किलपैट्रिक और स्टीवन पेट्रो ने एक शोध किया। उनके अनुसार कुछ लोगों में लॉन्ग-कोविड के लक्षण जल्दी शुरू होते हैं और बने रहते हैं, जबकि अन्य प्रारंभिक संक्रमण बीत जाने के बाद ठीक दिखाई देते हैं. इसके लक्षणों में अत्यधिक थकान और सांस लेने में आने वाली जटिलताएं शामिल हैं. किलपैट्रिक और पेट्रो कहते हैं कि न्यूरोसाइंटिस्ट के रूप में जो बात हमें विशेष रूप से चिंतित करती है, वह यह है कि लॉन्‍ग कोविड से पीड़ित कई लोग किसी चीज पर ध्यान केंद्रित करने और योजना बनाने जैसे कामों में कठिनाइयों का अनुभव करते हैं. इस स्थिति को ‘ब्रेन फॉग’ के रूप में जाना जाता है.’’

जानिए वायरस कैसे पहुंचता है दिमाग में ?

विशेषज्ञ का कहना है कि हमारे पास ऐसे प्रमाण हैं, जो इन्फ्लूएंजा सहित विभिन्न श्वसन वायरस को मस्तिष्क के शिथिल होने से जोड़ते हैं. 1918 की स्पैनिश फ्लू महामारी के रिकॉर्ड में, मनोभ्रंश, संज्ञानात्मक गिरावट यानी मानसिक चेतना में कमी, शारीरिक गतिविधियों और नींद में कठिनाइयों के मामले बहुत अधिक हैं. 2002 में सार्स के प्रकोप और 2012 में मर्स के कहर के सबूत बताते हैं कि इन संक्रमणों के कारण लगभग 15-20% ठीक हो चुके लोगों को तनाव, चिंता, स्मृति कठिनाइयों और थकान का अनुभव हुआ. इस बात का कोई निर्णायक सबूत नहीं है कि सार्स-कोव-2 वायरस, जो कोविड का कारण बनता है, रक्त मस्तिष्क बाधा में प्रवेश कर सकता है, जो आमतौर पर मस्तिष्क को रक्तप्रवाह से प्रवेश करने वाले बड़े और खतरनाक रक्त-जनित अणुओं से बचाता है. आंकड़े बता रहे हैं कि यह हमारे नाक को हमारे मस्तिष्क से जोड़ने वाली तंत्रिकाओं के जरिए हमारे मस्तिष्क तक पहुंच सकता है. शोधकर्ताओं को इस पर संदेह है क्योंकि कई संक्रमित वयस्कों में, वायरस की आनुवंशिक सामग्री नाक के उस हिस्से में पाई गई थी जो गंध की प्रक्रिया शुरू करती है, जो कोविड वाले लोगों द्वारा अनुभव किए गए ‘गंध महसूस न होने वाले लक्षण’ के साथ मेल खाती है.

जानिए कैसे कोरोना दिमाग को पहुंचाता है नुकसान

ये नाक संवेदी कोशिकाएं मस्तिष्क के एक क्षेत्र से जुड़ती हैं जिसे ‘‘लिम्बिक सिस्टम’’ कहा जाता है, जो भावनाएं समझने और व्यक्त करने, सीखने और स्मृति में शामिल होता है. जून में ऑनलाइन प्री-प्रिंट के रूप में जारी ब्रिटेन स्थित एक अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने कोविड के संपर्क में आने से पहले और बाद में लोगों के मस्तिष्क की छवियों की तुलना की.उन्होंने दिखाया कि संक्रमित लोगों में गैर संक्रमित लोगों की तुलना में लिम्बिक सिस्टम के कुछ हिस्सों का आकार कम हो गया था. यह भविष्य में मस्तिष्क की बीमारियों के प्रति संवेदनशील होने का संकेत दे सकता है और लंबे-कोविड लक्षणों के उभरने में भूमिका निभा सकता है.

कोविड अप्रत्यक्ष रूप से मस्तिष्क को भी प्रभावित कर सकता है. वायरस रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है और या तो रक्तस्राव या इसमें रुकावट का कारण बन सकता है जिसके परिणामस्वरूप मस्तिष्क को रक्त, ऑक्सीजन, या पोषक तत्वों की आपूर्ति में व्यवधान होता है, विशेष रूप से समस्या समाधान के लिए जिम्मेदार क्षेत्रों में.

विषाक्त अणुओं के उत्पादन को बढ़ाता है जो मस्तिष्क के कार्य को कम कर सकते हैं

वायरस प्रतिरक्षा प्रणाली को भी सक्रिय करता है, और कुछ लोगों में, यह विषाक्त अणुओं के उत्पादन को बढ़ाता है जो मस्तिष्क के कार्य को कम कर सकते हैं. हालांकि इस पर शोधों अभी भी हो रहे हैं. लेकिन आंत के कार्य को नियंत्रित करने वाली नसों पर कोविड के प्रभावों पर भी विचार किया जाना चाहिए. यह पाचन और आंत बैक्टीरिया के स्वास्थ्य और संरचना को प्रभावित कर सकता है, जो मस्तिष्क के कार्य को प्रभावित करने के लिए जाने जाते हैं.

वायरस पिट्यूटरी ग्रंथि के कार्य को भी प्रभावित कर सकता है. पिट्यूटरी ग्रंथि, जिसे अक्सर ‘‘मास्टर ग्रंथि’’ के रूप में जाना जाता है, हार्मोन उत्पादन को नियंत्रित करता है. इसमें कोर्टिसोल शामिल है, जो तनाव के प्रति हमारी प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है. जब कोर्टिसोल की कमी होती है, तो यह दीर्घकालिक थकान में योगदान दे सकता है. विकलांगता के वैश्विक बोझ में मस्तिष्क विकारों के पहले से ही बड़े हिस्से को देखते हुए, सार्वजनिक स्वास्थ्य पर लंबे समय तक कोविड का संभावित प्रभाव बहुत अधिक है.

लॉन्ग कोविड के बारे में प्रमुख अनुत्तरित प्रश्न हैं जिनकी जांच की आवश्यकता है, जिसमें बीमारी कैसे पकड़ लेती है, जोखिम कारक क्या हो सकते हैं और परिणामों की सीमा, साथ ही इसका इलाज करने का सर्वोत्तम तरीका भी शामिल है. लॉन्ग कोविड को लेकर भले ही कितने ही प्रश्न हों, एक बात तो तय है कि हमें कोविड के मामलों को बढ़ने से रोकने के हर संभव प्रयास करते रहना होगा, जिसमें वैक्सीन लगवाने के योग्य होते ही जल्द से जल्द इसे लगवाना शामिल है.

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