उत्तराखंड : कर्मचारी अराजकता पर सख्त त्रिवेंद्र, क्या हटेगा हड़ताल प्रदेश का तमगा ?

देखने और सुनने में कर्मचारी अराजकता शब्द कुछ बेहूदा और बेढंगा सा तो लग सकता है…मगर ये हकीकत है की राज्य बनने के बाद उत्तराखंड के सरकारी कर्मचारी जितने ज्यादा निरंकुश और अराजक हुए हैं उस से इस राज्य की सरकारें हो या आम जनता सब कहीं न कहीं असहज जरूर हुए हैं। ऐसा नहीं है की राज्य कर्मचारियों की निरंकुशता अपने आप ही बढ़ी हो, इसमें दोष है इस छोटे राज्य में राज्य कर्मचारियों ख़ास तौर से सरकारी शिक्षक और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों की लम्बी चौड़ी फ़ौज़, जिनके वोट बैंक को छेड़ने का साहस कोई भी सरकार नहीं कर पायी। राज्य कर्मचारियों को वोट बैंक मान कर हर जायज़, नाजायज़ मांग पर उत्तराखंड की सरकारें जिस तरह सर नवाती आयीं हैं उसका नतीजा है कि आज उत्तराखंड की गिनती हड़ताल प्रदेश के रूप में देश की जाती है।

ऐसा अगर किसी राज्य में संभव हुआ तो वो राज्य भी अपने आप में इकलौता उत्तराखंड ही कहा जाएगा

कर्मचारी अराजकता का दूसरा पहलू ये भी रहा कि राज्य में अब तक भ्रष्ट नौकरशाहों की लम्बी चौड़ी जमात थी, जिनकी फाइलों में दफ़न राज भी गाहे-बगाहें सचिवालय के गलियारों से लेकर राज्य कर्मचारियों की जुबान पर हौले से सुने जा सकते थे, जिसका फायदा उठाकर कर्मचारी अक्सर नौकरशाहों से बदजुबानी करते भी देखे गए…ऐसा अगर किसी राज्य में संभव हुआ तो वो राज्य भी अपने आप में इकलौता उत्तराखंड ही कहा जाएगा, कर्मचारी अराजकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज राज्य तौर से सचिवालय, कर्मचारी संघ, सचिवालय प्रशाशन नियमावली की धज्जियाँ उड़ाकर सचिवालय के अंदर जिंदाबाद मुर्दाबाद करता हुआ आसानी से देखा जा सकता है, जबकि सचिवालय प्रशासन नियमावली के आधार पर सचिवालय के गेट के अंदर किसी भी प्रकार की मीटिंग व सभा पूर्णतः वर्जित है, तो ऐसे में सवाल ये उठता है कि अलग राज्य की अवधारणा क्या सारे नियम कायदे कानून तोड़ने के लिए बनायीं गयी थी, आज, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मंत्रियों की गाडी की नेमप्लेट भले ही हट गयी हो , मगर सचिवालय संघ और राज्य कर्मचारियों के संगठन के कई पदाधिकारी अपनी गाडी पर सबसे आगे अपने पदनाम का प्रचार करते हुए भौकाल टाइट करते नज़र आते हैं।

कार्य बहिष्कार और हड़ताल इस राज्य की परम्परा बन चुकी है

मात्र ज़रा-ज़रा सी बात पर छोटे से लेकर बड़े कर्मचारी संघटनों द्वारा कार्य बहिष्कार और हड़ताल इस राज्य की परम्परा बन चुकी है, कहा जाता है की किसी राज्य के कर्मचारी उस राज्य के विकास की नींव होते हैं, मगर नवोदित उत्तराखंड राज्य की ये नींव इतनी कमजोर साबित होगी शायद राज्य की जनता ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी. आज हर सरकारी दफ्तर के बाहर जनता के मुंह से एक शब्द बहुत आराम से सुना जा सकता है, वो है…क्या इसी दिन के लिए उत्तराखंड बनाया था?

छोटा हो या बड़ा कोई भी काम बिना चाय पानी के हो ही नहीं सकता

मतलब साफ़ है की राज्य की जनता आज भी राज्य के ही सरकारी कर्मचारियों के हाथों उसी प्रकार से शोषित हो रही है जिस तरह से उत्तर प्रदेश के जमाने में होती थी. छोटा हो या बड़ा कोई भी काम बिना चाय पानी के हो ही नहीं सकता,.शायद इसीलिए ही उत्तराखंड देश के भ्रष्ट प्रदेशों में गिना जाता है. जन सेवा की जगह खुद की सेवा, राज्य की हालत देखे बिना खुद की सहूलियत, मनमर्जी से काम, अफसरों को घुटने पर रखना और सरकार को वोट बैंक का भय दिखाकर ब्लैकमेल करना ही क्या सरकारी कर्मचारी की परिभाषा है?

राज्य की जनता से बिना सेवा शुल्क लिए कोई काम न करना ही क्या राज्य कर्मचारी की परिभाषा है?

राज्य की जनता से बिना सेवा शुल्क लिए कोई काम न करना ही क्या राज्य कर्मचारी की परिभाषा है? राज्य कर्मचारियों के नेता के नाम जमीनों के कब्ज़े या प्रॉपर्टी कारोबार में डूब जाना ही क्या कर्मचारी नेताओं की पहचान है? या फिर राज्य सरकार के साथ समन्वय करके राज्य के हित में राज्य को चौमुखी विकास के लिए मेहनत करके अपने उत्तराखंड को विकास की बुलंदियों पर ले जाना राज्य कर्मचारी की परिभाषा है? ये सब तय करने का समय शायद अब आ गया है.

राज्य को हड़ताल प्रदेश नहीं बनने देंगे-सीएम

त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मुख्यमंत्री बनते ही कहा था कि राज्य को हड़ताल प्रदेश नहीं बनने देंगे, और कर्मचारियों से वार्ता होगी न कि हड़ताल पर बात, आम जनता भी जब अब रोज रोज होने वाली हड़ताल को अराजकता मान कर सरकार के साथ कड़ी हो ऐसे में इस राज्य के माथे से हड़ताल प्रदेश का तमगा क्या त्रिवेंद्र सिंह रावत हटा पाएंगे? ये देखने लायक बात होगी, अगर ऐसा होता है तो कुछ लाख कर्मचारियों की कीमत पर लाखों लाख प्रदेशवासी अपने मुख्यमंत्री के साथ कंधे से कन्धा मिला कर खड़े नज़र आएंगे।

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