देवस्थानम बोर्ड: इतिहास रचने की ओर CM त्रिवेंद्र, राह मुश्किल लेकिन उम्मीदें भी हजार

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उत्तराखंड में चार धाम श्राइन बोर्ड के गठन को नैनीताल हाईकोर्ट से मिली मंजूरी उत्तराखंड के लिए एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बड़ा दिल दिखाते हुए हाईकोर्ट के फैसले को किसी की हार और जीत से न जोड़ कर साबित किया है कि ये सरकार की नाक की लड़ाई नहीं थी। ये राज्य में धार्मिक गतिविधियों को संस्थागत रूप देने और संरचनात्मक ढृढ़ता देने के लिए उठाया गया कदम है।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत शुरु से इस बात को कहते रहें कि राज्य में चार धाम देवस्थानम श्राइन बोर्ड की जरूरत इसलिए है क्योंकि राज्य में धार्मिक गतिविधियों को अब संस्थागत रूप में देखना जरूरी हो गया है। उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर धार्मित गतिविधियों के लिए लोग पहुंचते हैं। बड़ी संख्या में तीर्थ यात्री चारों धामों के दर्शन के लिए आते हैं। बदरीनाथ और केदारनाथ के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या हर साल बढ़ती जा रही है। प्रदेश में ऑल वेदर रोड का काम तेज गति से चल रहा है। इस परियोजना के पूरा होने के बाद राज्य में श्रद्धालुओं की संख्या में बढ़ोत्तरी तय है।

 

इसके साथ ही उत्तराखंड में ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल लाइन परियोजना का काम भी तीव्र गति से चल रहा है। इस योजना के पूरा हो जाने के बाद राज्य में विकास की नई संभावनाओं का सूर्योदय होगा। उत्तराखंड में वेलनेस टूरिज्म, स्प्रीरिचुअल टूर, मेडिकल टूरिज्म के रास्ते न सिर्फ खुलेंगे बल्कि नए आयाम तक पहुंचने की उम्मीद भी है। कर्णप्रयाग तक सीधी ट्रेन पहुंचने के बाद धार्मिक पर्यटन भी बढ़ना तय है।

 

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का देवस्थानम बोर्ड बनाने का फैसला बहुत हद तक एक दूरगामी फैसला साबित होगा। खुद मुख्यमंत्री इस बात को मानते हैं कि राज्य में आने वाले समय में बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचेंगे। जाहिर है कि मुख्यमंत्री इन दोनों परियोजनाओं से राज्य को होने वाले फाएदे का जिक्र कर रहें हैं। लिहाजा सीएम त्रिवेंद्र इस बात पर जोर देते रहें हैं कि राज्य को अपनी व्यवस्थाएं पर्यटकों की बड़ी आमद के हिसाब से करनी होंगी। व्यवस्थाएं विश्वस्तरीय हों और पर्यटकों की राह को आसान बनाएं। चूंकि बड़ी संख्या धार्मिक पर्यटन के लिए आती है लिहाजा इस तरफ ध्यान देना अधिक जरूरी है। मंदिरों की बिखरी हुई व्यवस्थाओं को एक छत के नीचे लाना और ढांचागत विकास करना बेहद जरूरी हो चला था। ये बात याद रखनी होगी कि मुख्यमंत्री इस बात को बार बार दोहरा रहें हैं कि पुरोहितों के हितों से कोई समझौता नहीं होगा और परंपराएं अपने पारंपरिक स्वरूप में जारी रहेंगी।

 

हालांकि उत्तराखंड में इससे पहले भी मंदिरों की व्यवस्थाओं को एक छत के नीचे लाने की कोशिशें हुईं लेकिन सफल नहीं हो पाईं। देवस्थानम बोर्ड के गठन से त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ये साहस न सिर्फ दिखाया बल्कि उसे साबित भी कर दिखाया है। उत्तराखंड में देवस्थानम बोर्ड के गठन के बाद ये माना जा रहा है कि व्यवस्थाओं में सुधार होगा। जानकारों की माने तो वैष्णव देवी श्राइन बोर्ड के गठन के बाद भी ऐसी है तमाम आशंकाएं सतह पर आईं थीं लेकिन मौजूदा दौर में वैष्णव देवी श्राइन बोर्ड उदाहरण के तौर पर देखा जाता है। ऐसी ही उम्मीद अब उत्तराखंड देव स्थानम बोर्ड को लेकर जताई जा रही है। हाईकोर्ट के फैसले के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत खुश हैं लेकिन अब समय खुशी मनाने से अधिक अपने फैसले को सही और दूरगामी साबित करने का भी आ गया है। उम्मीद है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत ये कर ले जाएंगे।

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