सात समंदर पार से आई पैमिला बनी लाचार व असहाय लोगों के लिए मसीहा, कर रही ये काम

ऋषिकेश- आज के समय में जहां लोगों के पास अपने पारिवार को सम्भालने के लिए वक्त नहीं है ऐसे में दक्षिण अफ्रीका से आई पैमिला लाचार और असहाय लोगों के दर्द को कम करने के लिए मसीहा बनकर आई. और ये बात सच है कि सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं. ऐसा ही कुछ कर रही है दक्षिण अफ्रीका से आम पर्यटक के रूप में भारत आईं पैमिला तोश. ये विदेशी महिला ने उत्तराखंड में लाचार एवं असहाय लोगों की पीड़ा महसूस की तो अपना जीवन इन्हीं की सेवा को समर्पित कर दिया।

2013 से शुरू हुआ सिलसिला

केपटाउन, दक्षिण अफ्रीका निवासी 42 वर्षीय पैमिला तोश साल 2013 में भारत भ्रमण पर आई थीं। जून 2013 में जब उत्तराखंड आपदा से कराह रहा था, तब वह ऋषिकेश में ही थीं। उस दौरान पैमिला के अन्य साथी तो आपदा के भय से ऋषिकेश छोड़कर चले गए, मगर पैमिला ने यहां रहकर आपदा पीडि़तों की सेवा करने की ठानी।

हालांकि टूरिस्ट वीजा खत्म होने पर वह अपने वतन लौट गईं, लेकिन उत्तराखंड के आपदा पीडि़तों का दर्द उन्हें रह-रह कर याद आता रहा। इसीलिए छह महीने बाद ही पैमिला दोबारा टूरिस्ट वीजा पर भारत आ गईं। ऋषिकेश में सड़कों, गंगा घाटों और प्लेटफार्मों पर बीमार एवं असाध्य रोगों के साथ जीवन यापन करने वाले लोगों की पीड़ा ने पैमिला को द्रवित कर दिया। तब से वह यहां लगातार आ रही हैं।

खुद करती हैं मरहम पट्टी

यहां रहती हैं और सड़क पर जहां भी किसी बीमार एवं असहाय व्यक्ति को देखती हैं, पूरे मनोयोग से उसकी सेवा में जुट जाती हैं। पैमिला दीन-दुखियों के बाल व नाखून काटने से लेकर उनके घावों की मरहम-पट्टी भी खुद करती हैं। उनसे प्रेरणा लेकर अन्य विदेशी साथी भी सेवा कार्य में उनका सहयोग कर रहे हैं।

पांच साल में दस बार आ चुकी हैं भारत

ऋषिकेश गंगा घाटी में राफ्टिंग कैंप संचालित करने वाले आकाश वर्मा पिछले पांच साल से पैमिला के संपर्क में हैं। वह बीते पांच साल में करीब दस बार भारत आ चुकी हैं। हर बार तीन या चार माह यहां बिताकर वह दुखी एवं असहायों की सेवा में जुटी रहती हैं।

पैमिला मूलरूप से योग शिक्षक

पैमिला मूलरूप से योग शिक्षक हैं। वह कहती हैं, योग प्रत्येक मनुष्य के लिए जरूरी है, क्योंकि स्वस्थ जीवन ही सुखी जीवन का आधार है। मुझे दीन-दुखियों की सेवा में असीम आनंद आता है।

स्वामी शिवानंद से मिली प्रेरणा

पैमिला ने गरीब-असहायों की सेवा के लिए इंडीपाम नाम से एक संस्था भी बनाई हुई है। उन्होंने बताया कि सेवा की प्रेरणा मुझे ऋषिकेश के प्रख्यात योगाचार्य परमहंस स्वामी शिवानंद सरस्वती से मिली। बता दें कि पेशे से चिकित्सक रहे स्वामी शिवानंद सरस्वती (1887-1963) ने 1924 में चिकित्सा पेशा छोड़ कर ऋषिकेश में आध्यात्मिक साधना की और देशभर में योगविद्या का प्रसार किया।

ऋषिकेश में शिवानंद आश्रम और दिव्य जीवन संघ की उन्होंने स्थापना की थी, जहां से स्वामी विष्णुदेवानंद, स्वामी सत्यानंद, स्वामी चिन्मयानंद, स्वामी कृष्णानंद और पद्मविभूषण स्वामी निरंजनानंद जैसे अनेक तेजस्वी योगाचार्य तैयार हुए, जिन्होंने दुनियाभर में योगविद्या का प्रसार किया। बिहार में विश्व के प्रथम योग विश्वविद्यालय की स्थापना स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने अस्सी में की थी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here