कठिन तपस्या वाला चार दिन का धार्मिक पर्व है छठ

छठ पूजा

डेस्क- बिहार और देश के पूर्वाचंल में मनाया जाना वाला धार्मिक पर्व ‘छठ’ दीवाली के बाद हर्षोउल्लास से मनाया जाता है। देश का पूर्वांचली समुदाय जहां भी गया अपने साथ छठ पर्व को लेकर गया आज अधिकाश राज्यों में छठ की रौनक देखते ही बनती हैं। मुंबई में समुद्र किनारे तो देहरादून में तमसा, बिंदाल और रिस्पना नदियों के किनारे मनाया जाएगा छठ पर्व वहीं ऋषिकेश और हरिद्वार मे गंगा किनारे। सीएम के आदेश के बाद राज्य के नदी घाटों की साफ सफाई का काम शुरू हो गया है। 4 नवम्बर से शुरू होने वाला छठ पर्व 7 नवम्बर को सूर्य देवता को दूसरे अर्ध्य देने के साथ ही समाप्त हो जाएगा। छठ का धार्मिक पर्व पूरी तरह के लोक पर्व है। भेद-भाव से दूर इस पर्व
में किसी पुराहित की जरूरत भी नहीं होती। छठी माता और सूर्य देवता की आराधान के इस पर्व के केंद्र में न कोई धार्मिक ग्रंथ सम्मिलित है और न भव्य सजे पांडाल और बडी-बडी देव मूर्तियां। इस पर्व का मर्म है धार्मिक भावना, प्रकृति, किसान और ग्रामीण जीवन। ये लोक पर्व एक कठित तपस्या है। जिसमे छठी माता के साथ भगवान सूर्य की आराधना होती है। पूजा में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री पूरी तरह से कुदरती होती है। उल्लास से भरे-पूरे  इस पर्व में सेवा और भक्ति भाव के समृद्ध रूप के दर्शन होते हैं।  यह पर्व बांस निर्मित सूपों , टोकरी, मिट्टी बर्तनों और गन्ने के रस, गुड, चावल, गेहूं से निर्मित प्रसाद के साथ सुमधुर लोकगीतों से मिश्रत होकर लोक जीवन की मिठास का फैलाता है। चार चरणों मे होने वाले छठ पर्व के पहले दिन को नहाय खाय कहा जाता है इस दिन व्रत करने वाले प्रातःकाल स्नान कर लौकी और चावल से बने प्रसाद को ग्रहण करती हैं। दूसरे दिन को खरना कहा जाता है इस दिन से व्रतियों का उपवास शुरू होता है। परिवार की श्रेष्ठ महिला 12 घंटे का निर्जला उपवास रखती हैं। शाम के वक्त छठी माता को बूरा मिश्रित खीर और रोटी से बना प्रसाद चढ़ाया जाता है। साथ ही मौसम के तमाम फल छठी मां को अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद खीर और रोटी के प्रसाद से महिलाएं निवृत होती हैं। खरना का उपवास खोलते ही महिलाएं 36 घंटे के लिए फिर निर्जला उपवास ग्रहण करती हैं। पहले अर्घ्य के दिन बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है। शाम के वक्त व्रती नदी किनारे घाट पर एकत्र होकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देती हैं। चौथे और साधना के अंतिम दिन सूर्य उदय से पहले ही व्रती घाट पर एकत्र हो जाती हैं और उगते हुए भगवान दिवाकर को अर्घ्य देकर छठ व्रत का पारण करती हैं। अर्घ्य देने के बाद महिलाएं कच्चे दूध का शरबत पीती हैं। इस तरह से 4 दिन चलने वाली साधना सूर्य भगवान और माता छठी के आशीर्वाद के उल्लास के साथ समाप्त हो जाती है।

 

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