नैनीताल में चौंकाने वाला खुलासा, विदेशी हवा फैला रही भारत में प्रदूषण

नैनीताल: खबर की हेडिंग पढ़कर आप चैंक गए होंगे। चैंकना स्वभाविक भी है। दरअसल, बात ही कुछ ऐसी है कि ये हर किसी को चौंकाने पर मजबूर कर दे रही है। देश में लगातार बढ़ रहे प्रदूषण से हर कोई परेशान है। प्रदूषण का लेवल दिल्ली जैसे शहरों में जानलेवा साबित हो जाता है। गर्मियों हर साल प्रदूषण से लोगों को दम घुटता है।

एरीज के वैज्ञानिकों का शोध

बात थोड़ा चौंकाने वाली जरूर है, लेकिन वैज्ञानिकों ने इस बात का खुलासा किया है और प्रामाणिकतौर पर इसे सही ठहराया है। नैनीताल स्थिति आर्य भट्ट शोध एवं प्रेक्षण विज्ञान संस्थान (एरीज) के वैज्ञानिकों ने शोध के जरिये यत पता लगाया है। शोध के अनुसार देश में वायु प्रदूषण का कारण केवल अपने देश की प्रदूषित हवा नहीं है बल्कि दक्षिण यूरोप और अफ्रीका तक से यहां पहुंचने वाली विषैली हवाएं भी इसका कारण हैं।

स्ट्रेटोस्फियर-ट्रोपोस्फीयर ने बताई हकीकत

यह शोध एरीज में हाल ही में काम शुरू करने वाले विश्व के पहले 206.5 मेगा हर्ट्ज फ्रीक्वेंसी वाले स्ट्रेटोस्फियर-ट्रोपोस्फीयर (एसटी) रेडार से किए गए विश्लेषण से संभव सामने आया है। एरीज में स्थापित रेडार से क्षैतिज और लंबवत दोनों दिशाओं में 18 किमी दूरी तक वायुमंडल का अध्ययन किया जा सकता है। इससे किये गए विश्लेषण में यह भी जानकारी मिली कि पश्चिमी विक्षोभ के साथ ही ओजोन की परत में भी अंतर देखने को मिला है और यह कुछ नीचे को खिसक जाती है।

यूरोप और अफ्रीका से आईं थीं प्रदूषित हवाएं

एसटी रडार से डाटा संग्रहण और विश्लेषण कर रहे वैज्ञानिक डॉ. मनीष नाजा की मानें तो रडार से पहली बार हवा के दबाव में बदलाव के साथ ही उस हवा के स्रोत का भी अध्ययन संभव हो पाया और पता लगा कि प्रदूषित हवा यूरोप और अफ्रीका से आईं थीं। वैज्ञानिकों ने सेंसर लगे गुब्बारे भी छोड़े जो 18 किमी की ऊंचाई तक गए और आंकड़े भी भेजे।

स्वदेशी तकनीक से बना है रडार

डॉ. मनीष ने बताया कि वायुमंडल के अध्ययन के लिए विश्व में 50 और 400 मेगा हर्ट्ज के रडार प्रचलित हैं। 50 मेगा हर्ट्ज के रडार से 30-40 किमी जबकि 50 मेगा हर्ट्ज से आठ किमी तक के वायुमंडल का अध्ययन किया जाता है। 206.5 मेगा हर्ट्ज रडार से इस रेंज के बेहतरीन आंकड़े मिले हैं। एसटी रडार पूरी तरह स्वदेशी है। इसका निर्माण हैदराबाद की कंपनी ईसीआइएल ने किया। अब तक देश और विश्व में 206.5 मेगा हर्ट्ज फ्रीक्वेंसी का रडार न होने के कारण इसके लिए इसरो से विशेष अनुमति मांगनी पड़ी थी।

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