पीएम मोदी का उत्तराखंडियों पर भरोसा, बिपिन रावत को चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद!

देहरादून : ये कहने और बताने की जरुरत नहीं है कि पीएम मोदी का उत्तराखंड औऱ उत्तराखंडियों से खासा लगाव है. देश की सुरक्षा का जिम्मा उत्तराखंडियों के हाथों पर है. बात चाहे जोश से भरे औऱ शेर सी दहाड़ की आवाज वाले सेना प्रमुख बिपिन रावत की करें या NSA अजीत डोभाल की. देश की सुरक्षा का जिम्मा उत्तराखंडियों के हाथ में सौंपा है. वहीं एक और पद की घोषणा पीएम मोदी ने 15 अगस्त के दिन की है जिसके बाद उस पद को फिर से उत्तराखंडी को सौंपने की चर्चाएं हैं.

15 अगस्त को पीएम मोदी ने की थी सीडीएस पद की घोषणा

जी हां आपको बता दें कि बीते दिन 15 अगस्त को पीएम मोदी ने दिल्ली में मंच से सीडीएस के पद की घोषणा की थी जिसमें सबसे आगे नाम सेना प्रमुख बिपिन रावत का चल रहा है अगर ये पद बिपिन रावत को सौंपा जाता है तो फिर से उत्तराखंड का नाम तो रोशन होगा ही लेकिन इससे एक बाऱ फिर साफ हो जाएगी की पीएम मोदी को उत्तराखंडियों की ताकत, साहस पर पूरा भरोसा है.

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का क्या होता है काम

बता दें कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का काम सरकार को सिंगल पॉइंट मिलिट्री सलाह देना होता है। इसके अलावा जल, थल और वायुसेना के बीच समन्वय बैठाने का काम भी चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का है।

आपको बता दें कि जनरल बिपिन रावत का कार्यकाल 31 दिसंबर को पूरा हो रहा है। जिसके तहत बिपिन रावत के नाम की चर्चाएं अधिक है। कहा जा रहा है कि बिपिन रावत को पीएम मोदी इस पद से नवाज सकते हैं. सबसे आगे नाम जनरल बिपिन रावत का है.

आपको बता दें कि बिपिन रावत पौड़ी जिले के द्वारीखाल ब्लॉक स्थित ग्राम पंचायत बिरमोली के तोक सैंण गांव के हैं वो अपने परिवार के साथ अपने पैतृक गांव जाते रहते हैं हाल ही में वो अभी भी अपने पैतृक गांव पूजा के लिए गए थे.

कारगिल युद्ध की समाप्ति के बाद दिया था इस पद का सुझाव

करगिल युद्ध के समाप्त होने के बाद करगिल रिव्यू कमिटी का गठन किया गया था। करगिल रिव्यू कमिटी ने पाया कि युद्ध के दौरान सेना की विभिन्न शाखाओं के बीच संचार और प्रभावी तालमेल की कमी थी। इसी चीज को देखते हुए कमिटी ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के पद बनाने का सुझाव दिया था। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ को तीनों सेनाओं के बीच तालमेल स्थापित करने और सैन्य मसलों पर सरकार के लिए सिंगल पॉइंट सलाहकार के तौर पर काम करने की जिम्मेदारी सौंपने का सुझाव दिया गया। सुझाव दिया गया था कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के चेयरमैन पद का कार्यकाल 2 साल रखा जाए जिसे बढ़ाया जा सकता है। लेकिन राजनीतिक आम सहमति न बनने और सशस्त्र बल के कुछ वर्गों की ओर से विरोध के बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

इसका फायदा क्या होगा?
इसका सबसे बड़ा फायदा युद्ध के समय होगा। युद्ध के समय तीनों सेनाओं के बीच प्रभावी समन्वय कायम किया जा सकेगा। इससे दुश्मनों का सक्षम तरीके से मुकाबला करने में मदद मिलेगी। दरअसल सशस्त्र बलों की परिचालनगत योजना में कई बार खामियां सामने आईं। 1962 में चीन के साथ भारत का युद्ध हुआ था। उस युद्ध में भारतीय वायुसेना को कोई भूमिका नहीं दी गई थी जबकि भारतीय वायुसेना तिब्बत की पठारी पर जमा हुए चीनी सैनिकों को निशाना बना सकती थी और उनके बीच तबाही मचा सकती थी। इसी तरह से पाकिस्तान के साथ 1965 के युद्ध में भारतीय नौसेना को पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर हमले की योजना से अवगत नहीं कराया गया। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के रहते हुए इस तरह की कोई खामी नहीं रहेगी और सेना प्रभावी ढंग से दुश्मन से निपट सकेगी

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