बहुत मोटे थे नीरज, पिता ने कहा था- जा दौड़, फिर उस मैदान से सीखा भाला फेंकने का हुनर

हरियाणा पानीपत की नीरज चोपड़ा आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। उन्होंने इतिहास बदल दिया है और दुनिया भर में देश का नाम रोशन किया है। इसके बाद उनके लिए नामों की बौछार हो गई है। वहीं बता दें कि देश भर में उनके द्वारा गोल्ड में लाने का जीत का जश्न मनाया जा रहा है।

क्या आप यकीन करेंगे अगर कहा जाए कि वजन कम करने के उद्देश्य से खेलों से जुड़ने वाला बच्चा आगे चल कर एथलेटिक्स में देश का पहला स्वर्ण पदक विजेता बन जायेगा। बता दें कि नीरज चोपड़ा बहुत मोटे थे। उनके पिता उन्हें रोज 10 किलोमीटर दौड़ने के लिए कहते थे। नीरज दौड़ने के लिए गांव के ही पास एक मैदान जाते थे जहां उन्होंने अन्य खिलाड़ियों को भाला फेंकते हुए देखा और उनका मन भी यही करने की ठानी। उन्होंने इसको पेशन दिखाया और आगे बढ़े। जी हां भाला फेंकने वाले खिलाड़ी नीरज चोपड़ा ने इसे सच कर दिखाया। हरियाणा के खांद्रा गांव के एक किसान के बेटे 23 वर्षीय नीरज ने टोक्यो ओलंपिक में भाला फेंक के फाइनल में अपने दूसरे प्रयास में 87.58 मीटर भाला फेंककर दुनिया में रिकॉर्ड कायम कीया और भारत को पहला गोल्ड मेडल दिलाया।

एथलेटिक्स में पिछले 100 वर्षों से अधिक समय में भारत का यह पहला ओलंपिक पदक है। खेलों से नीरज के जुड़ाव की शुरुआत हालांकि काफी दिलचस्प तरीके से हुई। संयुक्त परिवार में रहने वाले नीरज बचपन में काफी मोटे थे और परिवार के दबाव में वजन कम करने के लिए वह खेलों से जुड़े। वह 13 साल की उम्र तक काफी शरारती थे। वह गांव में मधुमक्खियों के छत्ते से छेड़छाड़ करने के साथ भैसों की पूंछ खींचने जैसी शरारत करते थे। उनके पिता सतीश कुमार चोपड़ा बेटे को अनुशासित करने के लिए कुछ करना चाहते थे।

काफी मनाने के बाद नीरज दौड़ने के लिए तैयार हुए जिससे उनका वजन घट सके। उनके चाचा उन्हें गांव से 15 किलोमीटर दूर पानीपत स्थित शिवाजी स्टेडियम लेकर गS। नीरज को दौड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं थी और जब उन्होंने स्टेडियम में कुछ खिलाड़ियों को भाला फेंक का अभ्यास करते देखा तो उन्हें इस खेल से प्यार हो गया। उन्होंने इसमें हाथ आजमाने का फैसला किया और अब वह एथलेटिक्स में देश के सबसे बड़े खिलाड़ियों में से एक बन गए हैं।

अनुभवी भाला फेंक खिलाड़ी जयवीर चौधरी ने 2011 में नीरज की प्रतिभा को पहचाना था । नीरज इसके बाद बेहतर  सुविधाओं की तलाश में पंचकूला के ताऊ देवी लाल स्टेडियम में आ गये और 2012 के आखिर में वह अंडर-16 राष्ट्रीय चैंपियन बन गए थे। उन्हें इस खेल में अगले स्तर पर पहुंचने के लिए वित्तीय मदद की जरूरत थी जिसमें बेहतर उपकरण और बेहतर आहार की आवश्यकता थी। ऐसे में उनके संयुक्त किसान परिवार ने उनकी मदद की और 2015 में नीरज राष्ट्रीय शिविर में शामिल हो गए। वह 2016 में जूनियर विश्व चैंपियनशिप में 86.48 मीटर के अंडर-20 विश्व रिकॉर्ड के साथ एक ऐतिहासिक स्वर्ण पदक जीतने के बाद सुर्खियों में आये और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

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