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बेटे की याद में मां बना रही शहीद द्वार, 21 साल पहले ऑपरेशन पराक्रम में शहीद हो गए थे पिथौरागढ़ के लाल

उत्तराखंड से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने सबकी आंखे नम कर दी हैं। पिथौरागढ़ में एक मां अपने बेटे याद में शहीद द्वार बना रही है। लेकिन ये मात्र एक शहीद द्वार बनाने की बात तक सीमित नहीं है। इसे बनाने के लिए मां को सालों संघर्ष करना पड़ा। तब जाकर 21 साल बाद उनका ये सपन पूरा होने जा रहा है।

बेटे की याद में मां बना रही शहीद द्वार

पिथौरागढ़ के गांव सुवाकोट में एक मां अपने बेटे की याद में शहीद द्वार बना रही है। लेकिन ये सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। इस शहीद द्वार को बनाने के लिए शहीद सिपाही भुवन चंद्र भट्ट की मां को सालों तक संघर्ष करना पड़ा। तब जाकर बेटे के शहीद होने 21 साल बाद ये शहीद द्वार का निर्माण संभव हो सका है।

ऑपरेशन पराक्रम के दौरान शहीद हो गए थे भुवन चंद्र भट्ट

सुवाकोट निवासी भुवन चंद्र भट्ट फरवरी 1997 को आर्मी में भर्टी हुए थे। जहां वो सेना की कुमाऊं रेजीमेंट की 16वीं बटालियन में तैनात हुए। भुवन चंद्र भट्ट ऑपरेशन पराक्रम के दौरान जम्मू-कश्मीर में LOC (लाइन ऑफ कंट्रोल) के तंगधार सेक्टर में 15 जनवरी 2002 को शहीद हो गए थे। उस समय उनकी उम्र 23 वर्ष थी।

शासन-प्रशासन ने नहीं सुनी तो खुद शहीद द्वार बना रही मां

भुवन चंद्र भट्ट के शहीद होने के बाद उनकी माता कलावती देवी ने इस शहीद द्वार के निर्माण के काफी प्रयास किए। 2017 से उन्होंने काफी संघर्ष किया। लेकिन जब इस पर शासन-प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया तो भुवन की माता ने इसे खुद खर्च पर बनाने का निर्णय लिया।

इसके बाद वर्ष 2022 से पूर्व सैनिक संगठन ने भी इसके लिए प्रयास किए। शहीद द्वार के निर्माणके लिए शहीद के पैतृक गांव सुवाकोट मार्ग पर स्थान चिह्नित किया। 

शासन से मदद न मिलने के बाद भुवन की माता ने इसको अपने खर्च पर बनवाना शुरू किया। एक बेटे के लिए मां का प्यार कभी कम नहीं हो सकता। बेटे के लिए मां के संघर्ष को देख हर कोई यही कह रहा है।

शहीद द्वार का निर्माण सरकार को करना चाहिए

जब लोगों ने सुना की शहीद बेटे की याद में मां खुद अपने खर्च पर शहीद द्वार बना रही है तो लोगों ने कहा कि इसका निर्माण सरकार को कराना चाहिए। इसके साथ ही पूर्व सैनिक संगठन ने भी मांग की है कि इस शहीद द्वार के निर्माण में आने वाले खर्चा को सरकार को वहन करना चाहिए।

पूर्व सैनिक संगठन ने कहा कि एक ओर सरकार पूर्व सैनिकों और शहीदों के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करती है। तो वहीं दूसरी ओर वीरों की स्मृति में परिजनों को खुद अपने खर्च पर शहीद द्वार बनाना पड़ रहा है।

Yogita Bisht

योगिता बिष्ट उत्तराखंड की युवा पत्रकार हैं और राजनीतिक और सामाजिक हलचलों पर पैनी नजर रखती हैंं। योगिता को डिजिटल मीडिया में कंटेंट क्रिएशन का खासा अनुभव है।
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