मंत्री जी, आपने झंडा ऊंचा करने के साथ-साथ फीस भी ऊंची कर दी !

देहरादून- सूबे के तकरीबन सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में शोर्य दीवार जहां भारत की सरहदों की हिफाजत करने वाले सच्चे सपूतों की वीरता का गुणगान कर रही हैं, वहीं सूबे के उच्च शिक्षा मंत्री के इरादों के शोर्य का भी बखान कर रही है।
कई कॉलेज कैंपस में ऊंचे-ऊंचे तिरंगे भी लहरा रहे हैं। इन ऊंचे लहराते तिरंगों को देखकर कॉलेज के गेट पर जमीन में बैठे मेडिकल के छात्र-छात्राएं आक्रोश से पूछ रहे हैं, उच्च शिक्षा मंत्री जी आपने झंडा ऊंचा करने के साथ-साथ फीस वसूली का डंडा कॉलेज प्रबंधन को थमा दिया है।
राज्य के निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में  झंडा ऊंचा होने के साथ-साथ अब फीस भी इतनी ऊंची हो गई है कि ईमानदारी से तन्ख्वाहजीवी परिवारों के बच्चे डॉक्टरी पढ़ने का ख्वाब भी नहीं देख सकते। बैंक उच्च शिक्षा के लिए इतना लोन मंजूर करेंगे उसमें भी शक है और बैंक ऋण मंजूर कर भी दे तो पढ़ाई के बाद लोन की ऊंची किश्त चुकाने के लिए ईमानदारी से नौकरी हो पाएगी ये कहना मुश्किल है।
बहरहाल खबर है कि उत्तराखंड में निजी मेडिकल कॉलेज से मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे मंहगी फीस होने के चलते चिकित्सा की शिक्षा नहीं ले पाएंगे। क्योंकि सूबे की सरकार ने निजी विश्वविद्यालयों के हाथों में फीस वसूली का चाबुक थमा दिया है। सरकार के इस फैसले के बाद उत्तराखंड के निजी उच्च शिक्षण संस्थानों की पौ बारह हो चुकी है साथ उत्तराखंड का नाम भी फीस वसूली के मामले में मशहूर हो गया है।
बताया जा रहा है कि देश के भीतर किसी भी राज्य में निजी मेडिकल कॉलेजों को फीस निर्धारित करने का अधिकार किसी भी राज्य सरकार ने नहीं दिया है सिवाय उत्तराखंड सरकार के। हालांकि निजी मेडिकल कॉलेजों ने कई बार इसके लिए कोशिश की लेकिन राज्य के चिकित्सा शिक्षा विभाग ने निजी मेडिकल कॉलेजों के इस प्रस्ताव को हर बार खारिज़ किया।
बावजूद इसके निजी मेडिकल कॉलेज उच्च शिक्षा विभाग वाले दरवाजे पर फरियाद लगाकर अपनी इस मंशा में कामयाब हो गए। दरअसल खेल ये हुआ कि राज्य के डीम्ड विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा मंत्रालय के तहत आते हैं। ऐसे में सूबे के उच्च शिक्षामंत्री जी ने निजी विश्वविद्यालयों को निराश नहीं किया और उन्हे वरदान देते हुए फीस घटाने-बढ़ाने के प्रस्ताव को कैबिनेट में रखा दिया।  जिस पर टीएसआर  केबिनेट के गुणी साथियों ने सहमति की मुहर लगा दी।
अब हाल ये है कि राज्य में निजी मेडिकल कॉलेज फीस के चाबुक से अभिभावकों की पीठ लहूलुहान करने पर आमादा हैं। मिडिल क्लास परिवारों के ख्वाब कांच के सामान की तरह चकनाचूर हो रहे हैं जबकि राज्य के निजी मेडिकल कॉलेज प्रबंधन के ख्वाब सातवें आसमान पर उड़ रहे हैं। मेडिकल कोर्स की जो फीस पहले 7-8 लाख रुपए सालाना थी कॉलेज प्रबंधन की मनमर्जी के चलते अब 19 से 24 लाख रूपए सालाना हो जाएगी।
उच्च शिक्षा मंत्री का ये पैंतरा उनके लिए वरदान बन गया है। अभिभावक परेशान हैं जबकि मेडिकल करने वाले छात्र-छात्राएं आक्रोशित होकर कॉलेज कैंपसों के बाहर सरकार की खिलाफत कर रहे हैं। लेकिन सत्ता महल की प्राचीर पर कोई असर नहीं पड़ा है। सत्ता है कि मरहबा- मरहबा हुई जा रही है।

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