MDDA में बाबुओं और आर्किटेक्ट्स का कॉकस टूटा, VC ब्रजेश संत ने सुधारी व्यवस्था

BRIJESH SANT AND MDDA

 

मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (MDDA) अब अपनी पुरानी कार्यशैली को बदलने की कोशिश में लगा है। MDDA के उपाध्यक्ष ब्रजेश संत की कोशिशों से अब MDDA के सिस्टम को जनता के प्रति अधिक जवाबदेह और कार्यशैली में पारदर्शिता लाने की मुहिम छिड़ी हुई है। इसका असर अब दिखने भी लगा है।

दरअसल MDDA हमेशा से ही अपनी कार्यशैली को लेकर सवालों के घेरे में रहा है। इसकी एक बड़ी वजह MDDA के बाबुओं, आर्किटेक्ट्स और जूनियर इंजीनियरों का वो गठजोड़ रहा है जो अपने इशारे पर पूरे MDDA को चलाने की कोशिश करता रहा। ब्रजेश संत ने इस कॉकस को तोड़ कर MDDA को एक नई ऊर्जा दी है।

MDDA ने एक और बड़ा बदलाव किया है। वो है MDDA परिसर में गैर जरूरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध। इसके साथ ही दफ्तर के बाबुओं से ठेकेदारों और आर्किटेक्ट्स की मुलाकात पर भी अब प्रतिबंध है। यानी चाय की चुस्कियों के साथ होने वाला ‘खेल’ अब नहीं चल पा रहा है।

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अगर किसी को बेहद जरूरी काम है तो उसे उपाध्यक्ष या सचिव से मिलना होगा। इसका एक बड़ा फायदा ये भी है कि कॉकस से जुड़े लोग बाबुओं की मदद से सरकारी फाइलों तक अपनी पहुंच नहीं बना पाएंगे। नई व्यवस्था के तहत अब आर्किटेक्ट्स, इंजीनियरों को भी MDDA परिसर में प्रवेश के समय आमद दर्ज करानी होगी। साथ ही वापस में भी समय दर्ज कराना होगा।

MDDA से MAP पास कराना मानों पहाड़ तोड़ने जैसा काम हुआ करता था। इसकी भी एक बड़ी वजह यही कॉकस था जो आम आदमी को उलझा कर रखता था। न सिर्फ उलझा कर रखता था बल्कि आर्थिक शोषण भी करता था। ब्रजेश संत ने MDDA से नक्शा पास कराना सरल बना दिया। अब सबकुछ ऑनलाइन हो रहा है। नक्शा सबमिट करने से लेकर उसको लेकर हुई प्रगति तक। यही नहीं, नक्शा पास करने के लिए एक महीने की डेडलाइन दे दी गई है।

सीएम पुष्कर सिंह धामी को भी MDDA के बारे में पूरी जानकारी है। यही वजह है कि उन्होंने ब्रजेश संत को MDDA की कमान सौंपी। इसका असर भी दिखने लगा है।

 

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