गैरसैंण के बजट सत्र में खुली एलआईयू की पोल, आंदोलनकारियों के सामने बेबस हुआ सरकारी सिस्टम

गैरसैंण-
देहरादून से लाव-लश्कर के साथ सरकार गैरसैंण पहुंची तो उसके कारिंदों को उम्मीद भी नहीं रही होगी कि स्थाई राजधानी की मांग इतनी विकराल होगी। गैरसैंण को स्थाई राजधानी का मुद्दा सरकार की राह में सदन के बाहर और भीतर दोनों जगह रोड़ा बन जाएगा।  जहां सदन के भीतर गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग को लेकर कांग्रेस ने हंगामा किया वहीं सदन के बाहर गैरसैंण की सड़कों पर आंदोलनकारियों ने सरकार के दम निकाल दिए।
उत्तराखंड क्रांतिदल के कार्यकर्ता हों या फिर पिछले कई महीनों से गैरसैंण में राजधानी की मांग को लेकर बैठे आंदोलनकारियों के समर्थक या आम आदमी सभी ने इस मसले पर सरकार को खूब छकाया। गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग को लेकर कहीं आंदोलनकारी टॉवरों पर चढ़ते दिखाई दिए तो कहीं मातृशक्ति पहाड़ों से सड़क पर उतर कर नारे लगाती हुई मिली।
हर ओर स्थाई राजधानी गैरसैंण की मांग करती जनता के सामने पुलिस बेबस दिखाई दी। गुरिल्ला युद्ध की भांति भराड़ीसैंण की ओर बढ़ते आंदोलनकारियों की भीड़ ने तिरंगा हाथ में लेकर दिवालीखाल से लेकर आदिबद्री की ओर जाने वाली सड़क पर भयंकर जाम लगवा दिया। हालांकि कड़ी मशक्कत के बाद पुलिस ने कई आंदोलनकारियों को गिरफ्तार भी किया।
इससे साफ जाहिर हुआ कि सरकारी सूचना तंत्र पहाड़ के दिलों में स्थाई राजधानी गैरसैंण की आंच को भांप नहीं पाया। वहीं इसका पता भी चल गया कि सरकार का सिस्टम पहाड़ों को कितने हल्के में लेता है और चमोली जिले जैसे चीन से सटे सीमांत इलाके में सरकार का स्थानीय अभिसूचना तंत्र कितना कमजोर है।

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