हरीश रावत का ये खत कई सवालों का जवाब है

विधानसभा चुनावों में शिकस्त का सामना करने के बाद हरीश रावत अब आत्म मंथन में जुटे हैं। उत्तराखंड की जनता से संवाद के लिए वो सोशल मीडिया का सहारा ले रहें हैं। हरीश रावत ने अपना एक और खत सोशल मीडिया में जारी किया है। ये है वो खत।

 

धन्यवाद उत्तरवाणी,

गीता के शास्वत् वाक्य
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सड़ो ऽस्त्वकर्मणि ।।

योगस्थः कुरू कर्माणि सडं़ त्यक्त्वा धन´य ।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।।

का अनुपालन करते हुए मैंने 3 वर्ष मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। निश्चय ही मेरे काम में कुछ दोष भी रहे होंगे। तुलनात्मक मूल्यांकन ही सही स्थिति बता सकता है और मेरे कामों के तुलनात्मक मूल्यांकन हेतु उत्तराखण्ड को 2 वर्ष प्रतिक्षा करनी होगी। तब आपसे पुनः कुछ सुनना चाहूंगा।
कल तक मैं राज्य का मुख्यमंत्री था, और आज प्रतिपक्ष का एक कार्यकर्ता हॅू। संसदीय लोकतंत्र में सरकार बनाने की आंकाक्षा रखने वालों को, प्रतिपक्ष की भूमिका अत्यधिक संलग्नता से निभानी होती है। फिर हमारी प्रतिद्वन्दिता तो उनसे है, जिनका लक्ष्य विपक्ष मुक्त भारत बनाना है। चुनौती बहुत बड़ी है, रामयण में भगवान राम और महाभारत में भगवान कृष्ण के सम्मुख भी प्रबल प्रतिद्धन्दी थे। भारी अंहकारी, अन्यायी, निरंकुश व अलोकतांत्रिक थे। एक सेनानायक के रूप में और एक सारथी के रूप में लड़े और जीते। मेरे आंकलन में कांग्रेस पार्टी भी लोकतंत्र बचाओ-प्रतिपक्ष बचाओ, के अभियान की सारथी है। हम कांग्रेसजनों को इस अभियान को शक्ति देनी है। हम लड़ाई हारे हैं, युद्ध नहीं। कांग्रेस के इस अभियान को कुछ शक्ति देने की कुल-बुलाहट मुझे रामायण और महाभारत में ऐसे दृष्टान्तों को ढूढ़ने के लिए प्रेरित कर रही, जो इस लड़ाई में कांग्रेस की मार्गदर्शक बन सके। हाॅं उत्तराखण्ड में लोकतंत्र बचाने की इस लड़ाई में आप मुझे वितरागी भी पायेगें और एक वैरागी की तरह ध्यानस्थ भी देखेंगे।
बन्धुवर, 18 मार्च, 2016 की भूमिका तो मेरे शपथ लेने के एक पखवाड़े के अन्दर 2014 में तैयार हो गई थी। अन्यथा प्रतिपक्ष एक नये-नये चुने गये मुख्यमंत्री के विरूद्व विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाता। कहीं तो कुछ था, निरन्तर कोशिशें हो रही थी। 18 मार्च, 2016 को तो ऐसी शक्तियों ने निर्णायक प्रहार किया। मैं बुरा व्यक्ति था, अच्छा मुख्यमंत्री नहीं था, किसी की परवाह नहीं करता था, मगर उत्तराखण्ड तो बुरा नहीं था। उत्तराखण्ड व कांग्रेस ने तो दल-बदल करने वालों को बहुत कुछ दिया था। फिर कांग्रेस को क्यों झटका दिया, और उत्तराखण्ड में क्यों दल-बदल की परम्परा डाल दी। कुछ धैर्य रख लेते, आखिर इस बुरे हरीश रावत ने भी 12 वर्ष धैर्य रखा। पार्टी में यदि अपनी बात कहते-2 मैं 12 वर्ष बाद उपकृत हो सकता हॅू, तो मेरे दोस्तों को भी पार्टी के अन्दर लड़ते हुए न्याय मिल जाता। खैर आपके शब्दों के अनुसार ये सभी खांटी के कांग्रेसी असली भाजपाई हो गये हैं। हरीश रावत से नहीं निभा पायें, मगर अच्छे त्रिवेन्द्र रावत जी से पाॅच वर्ष निभायेंगे। इसकी उत्तराखण्ड को उम्मीद रखनी चाहिये। हाॅ एक बात फिर मैं कह दॅूं, यदि पार्टियांॅं कब किसने-किसकी उपेक्षा की, इस पर टूटने लगेंगी तो उत्तराखण्ड में कोई भी मुख्यमंत्री दो वर्ष भी नहीं चल पायेगा। मेरा सुझाव है ऐसे लोगों के प्रति सोच-विचार कर साहनुभूति व्यक्त करें। मैंने मुख्यमंत्री के रूप में अपने आप को प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपलब्ध रखा, देर से ही सही, मगर कोई मुझे मिल नहीं पाया इसकी शिकायत, मुझसे घोर नाराज व्यक्ति भी नहीं करेगा। 55 वर्ष से कांग्रेस का कार्यकर्ता हॅू, संगठन में हर स्तर पर कार्य किया है। संगठन को साथ नहीं रख पाया, शायद यह उलाहना भी सही हो, मगर मैंने अपने अध्यक्ष पर अनचाही सीट थोप दी, यह सत्य से कोसों दूर है। सच में यह पार्टी नेतृत्व का भी अपमान है, क्योंकि पार्टी नेतृत्व ने ही प्रदेश अध्यक्ष से पूछकर यह फैसला किया था। यूं बताते चलूं कांग्रेस के इतिहास में पार्टी कार्यालय सर्वाधिक बार जाने का रिकार्ड भी, चुनावी हार की तरह मेरे नाम दर्ज रहेगा।
मैं उत्तरवाणी का आभारी हॅू, आपने निष्काम कर्म करते रहने तथा गीता का अध्ययन कर मार्ग तलाशने की सलाह दी है। मैं आपकी स्नेहपूर्ण सलाह का पालन करूंगा।

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