जानिए भारत क्यों नहीं ले रहा है ओबोर शिखर सम्मलेन में भाग

चीन व्यापारिक मार्गों की अपनी – वन बेल्ट, वन रोड (ओबोर) के नेटवर्क का निर्माण करने की अपनी योजनाओं को दिखाने के लिए कल एक भव्य दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन कर रहा है- इससे एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप को जोड़ा जाएगा।

लगभग 65 देशो के इस सम्मेलन में हिस्सा लेने की संभावना है। चीन अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना की व्यापक मंजूरी के लिए दो दिवसीय शिखर सम्मेलन के अंत में संयुक्त वक्तव्य जारी करने की योजना बना रहा है। भारत और जापान ने शिखर सम्मेलन में भाग लेने की अनिच्छा दिखायी है जबकि जापान एक प्रतिनिधिमंडल भेजेगा, भारत ने किसी भी प्रतिनिधि को भेजने से इनकार कर दिया है अमेरिका ने आखिरी पल में यू-टर्न लिया और अब वह भी प्रतिनिधि भेज रहा है ।

ओबोर क्या है?

चीन सिल्क रोड, जो यूरोप और एशिया के बीच मध्ययुगीन व्यापार मार्ग हैं से प्रेरित होकर अब चीन ओबोर परियोजना, बनाने जा रहा है जो दर्जनों देशों में समुद्र और भूमि मार्गों का एक विशाल नेटवर्क होगा। यह 4.4 अरब लोगों को प्रभावित करेगी ऐसा कहा जाता है कि चीन को इस परियोजना के लिए $ 1 ट्रिलियन डॉलर खर्च करना होगा। इस एक परियोजना में छह प्रमुख मार्ग हैं जिनमें कई रेलवे लाइन, सड़कों, बंदरगाहों और अन्य बुनियादी ढांचे शामिल होंगे।

चीन का दावा है कि इन आर्थिक गलियारों से न सिर्फ उन देशों के बुनियादी ढांचे का निर्माण किया जायेगा, जो खुद को ऐसा करने में सक्षम नहीं है, बल्कि वैश्विक व्यापार को बढ़ावा भी दे सकते हैं। एशिया में भारत के सभी पड़ोसी देशों में से अधिकांश, भूटान को छोड़कर, परियोजना में भाग लेने के लिए तैयार हैं।

किसका अधिक लाभ होगा: चीन या मेजबान देशों का?

सहभागी देशों को बुनियादी ढांचे और व्यापार के संदर्भ में लाभ होगा। कई छोटे-छोटे देशों के लिए महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचाहासिल करने के लिए ओबोर परियोजना एक आसान और तेज़ तरीका हो सकता है। लेकिन इन सबकी एक छुपी हुई कीपट वसूलेगा चीन, चीन ओबोर परियोजनाओं के लिए पैसे उधार दे सकता है वह भी बहुत अधिक ब्याज दरों पर जिसे यह देश चुकाने में सक्षम न हो।

यह हथकंडा चीन द्वारा इक्विटी प्राप्त प्राप्त करने का आसान साधन साबित होगा और इसके द्वारा चीन इस परियोजनाओं में हिस्सेदारी को नियंत्रित कर सकता है। ओबोर चीनी अर्थव्यवस्था को बड़ा दीर्घकालिक लाभ प्रदान कर सकता है ओबोर चीन को इस्पात और खनिजों में अपनी अधिक क्षमता का उपयोग करने के अवसर दे सकता है।

क्या यह परियोजना सिर्फ अर्थव्यवस्था और व्यापार के बारे में है?

नहीं, चीन हमेशा अपनी आर्थिक योजनाओं में अपनी सैन्य महाताव्कंक्षाये छुपाता है। एशिया और अफ्रीका के दर्जनों देशों में एक विशाल ढांचागत पदचिह्न अंततः ओबोर में एक मजबूत चीनी सैन्य उपस्थिति का एहसास दिलाएंगे। एक छोटा देश जो चीन द्वारा बनाई गई बुनियादी ढांचे को होस्ट करता है और ऋण चुकाने में असमर्थ है, वह चीन के राजनयिक और सैन्य चालन के लिए कमजोर ही साबित होगा।

भारत क्यों नहीं ले रहा है इसमें भाग ?

ओबोर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) है, पाकिस्तान की गहरे पानी के बंदरगाह ग्वादर और चीन के झिंजियांग को जोड़ने वाली 3,000 किलोमीटर परियोजना का हिस्सा है। यह गिलगिट-बाल्टिस्तान क्षेत्र से गुजरता है जो पाकिस्तान-कब्जे वाले कश्मीर में स्थित है। इससे विवादित क्षेत्र में चीन की मौजूदगी होगी, जो भारत का हिस्सा है, यह परियोजना भारत की संप्रभुता चिंताओं को बढ़ाती है।

कहा जा रहा है कि भारत ने ओबोर शिखर सम्मेलन में हिस्सा न लेने का एकमात्र यही कारण है। हालांकि, भारत की प्रमुख चिंता यह है कि सीपीईसी में पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह पर चीन को नियंत्रण दिया है। ओबोर हिन्द महासागर में चीनी उपस्थिति को बढ़ावा देगा, अर्थात ओबोर भारत को घेरने की चीन की पुरानी रणनीति’string of pearls’ को वास्तविकता में बदल देगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here