लो आ गया हरीश रावत का पार्ट-7, बोले-‘‘गैरसैंण राजधानी बनायेंगे-टैन्ट में सरकार चलायेंगे’’

देहरादून : हरीश रावत हमेशा सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं औऱ लोगों से संवाद करते रहे हैं. कभी पहाड़ी व्यंजनों का लाभ उठाते दिखते हैं तो कभी जनता के बीच जाकर चाऊमीन मोमोज बनाते दिखते हैं। वहीं बीते कई दिनों से आप हरीश रावत के लंबे-लंबे पोस्ट पढ़ रहे होंगे। जिसमे हरीश रावत तोड़ तोड़कर पार्टों में जनता के सामने सोशल मीडिया के जरिए पेश कर रहे हैं. वहीं आज हरीश रावत ने पार्ट-7 भी सोशल मीडिया पर शेयर किया है जिसमे उन्होंने गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को एक बार फिर से उठाया है। हरीश रावत नेलिखा है कि ‘‘गैरसैंण राजधानी बनायेंगे-टैन्ट में सरकार चलायेंगे’’

हरीश रावत की पोस्ट

हाॅ समय आ गया है (पार्ट-7)
राज्य की राजनैतिक परिस्थितियों व राजनैतिक चरित्र को गहराई से देखने के बाद, मैं समझ चुका था, उत्तराखण्ड पूर्णतः रस्मी (औपचारिकाताओं से जकड़ा) राज्य बन चुका है। प्रशासन तंत्र में हमेशा एक जड़तायुक्त स्पनन्दनहीनता का आभास होता था। राज्य निर्माण के नारे, औपचारिकताओं की जकड़ में बुरी तरह फंस चुके थे। आम व्यक्ति असहाय सा, तड़फड़ा कर चुप बैठ गया है। एक निष्कर्ष बहुत स्पष्ट तौर पर समझ में आ रहा है कि, इस जड़ता को तोड़ना ही हमारी अधिकांश समस्याओं का हल है। ‘‘म्यौरों स्कूल व म्यौरों गौं’’ के नारे तभी वास्तविकता बन सकेंगे, जब हम कोई ऐसा निर्णय लेंगे, जो समस्त जड़ता को तोड़ सके। मेरे पास अपने कार्यकाल के कुछ स्वर्णीम आंकड़े हैं, जो किसी भी परम्परागत मुख्यमंत्री को गौरवान्वित कर सकते हैं। रिकार्ड रोजगार सृजन, विकास दर में बड़ी बढ़ोत्तरी, प्रति व्यक्ति आय में भारी वृद्धि, कृषि उत्पादन दर में वृद्धि, राजस्व वृद्धि दर में भारी उछाल, इज इन डूईंग बिजनेस में भारी सुधार, सबसे सस्ती चैबीस घंटे बिजली आदि-2। आंकड़ों के बोझ में दबी कथित सम्पन्नता, बढ़ती हुई गरीबी व खाली होते हुये गांवों की पीड़ा को दूर करने में पूर्णतः असमर्थ लग रही है। राज्य के हालात चीख-चीख कर बदलाव मांग रहे हैं। गांव चाहे जसपुर का नवलपुर हो या खटीमा गांव बग्गाचव्वन या हरिद्वार का माड़ाबेला हो परिस्थितियां इन गावों की भी धारचूला या भटवाड़ी के गांवों सरिखी है। एक बड़े बदलाव के लिये, एक बड़े झन्नाटेदार निर्णय की आवश्कता होती है। यह झन्नाटेदार निर्णय कल भी गैरसैंण था और आगे भी गैरसैंण ही हो सकता है। मैं स्थितियों को जहां छोड़ गया था, वहां से आगे भी गैरसैंण ही है। गैरसैंण अब मात्र एक भौगोलिक यथार्थ नहीं है, बल्कि सोच को ग्रामोउन्मुखी, गरीब परक बनाने का स्टीमुलेटर (उत्प्रेरक) है। यह सभी प्रकार की असमानताओं व विपन्नताओं का समाधान है। यहां ठंड ही नहीं लगती है, बल्कि यह दिल व दिमाग दोनों को धरातलीय ठंडक भी प्रदान करता है। यह शब्द जड़ता को तोड़ता है व चुनौतीपूर्ण गतिशीलता देता है। राज्य के यर्थाथ का, इस शब्द से भाष्य निकलता है, समझ निकलती है। देहरादून में आंकड़े दिखते हैं, गैरसैंण से वास्तविकता दिखती है। गैरसैंण को लेकर मेरी तड़फड़ाहट का यही कारण कल भी था और आज भी है।
सौभाग्य से मेरी पूर्ववर्तीय सरकार, गैरसैंण में एक कैबिनेट बैठक व विधानसभा भवन बनाने का निर्णय कर चुकी थी। यह निर्णय प्राकृतिक आपदा के दौरान सरकार पर उठे, गम्भीर सवालों से ध्यान हटाने के लिये लिया गया था। मैंने इसी निर्णय को पकड़ा और ‘‘गैरसैंण एजेण्डे’’ को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। मंत्रिमण्डल व स्पीकर महोदय की अनुमति के साथ गैरसैंण में टैन्टों में रहने व टैन्ट में विधानसभा सत्र आयोजन का निर्णय लिया गया। यह बहुत ही रोमांचक निर्णय था। ‘‘गैरसैंण राजधानी बनायेंगे-टैन्ट में सरकार चलायेंगे’’ के नारे को सार्थक करने की दिशा में एक बड़ी पहल, इस निर्णय के साथ हमने प्रारम्भ की। उत्तराखण्ड राज्य की प्रथम कल्पना के चित्रकार कामरेड पी.सी. जोशी व उदभट् राष्ट्रभक्त चन्द्र सिंह गढ़वाली के नाम पर, सत्र स्थल व टैन्टीय विधानसभा का नामकरण किया गया। स्व. इन्द्रमणी बड़ौनी, स्व. जसवन्त सिंह बिष्ट, स्व. विपिन चन्द्र त्रिपाठी आदि के नाम पर भी स्पीकर आदि कक्षों का नामकरण किया गया। उत्तराखण्ड के वीरों व विरांगनाओं के नाम पर भी सभास्थल के प्रमुख अवयवों का नामकरण किया गया। गैरसैंण में रणसिंगों की हुंकार, ढोल-नगाड़ों के नाद व मशकबीनों की धुन पर झूमते हजारों भाई-बहनों का उत्साह व चेहरे की चमक देखने लायक थी। सब कुछ रोमांचक था। अध्यक्ष व उपाध्यक्ष इस स्थिति को देखकर गदगद थे। विधायकगण भी गैरसैंण आने में हुआ सारा परिश्रम भूल गये थे। टैन्टों में रात रहना व टैन्ट में विधानसभा का संचालन, ऐसा लगता था कि, हम आज उत्तराखण्डी यर्थाथ को सार्थक करने की पहल प्रारम्भ कर रहे हैं। मैंने टैंट विधानसभा सभा स्थल में ही विधानसभा भवन व गैरसैंण-चैखुटिया विकास परिषद के लिये धन स्वीकृत कर गैरसैंण में सरकारी निर्णय लेनी की शुरूआत भी की। जब मैं यह निर्णय ले रहा था, उसी समय एक क्रिया के विरूद्ध, प्रतिक्रिया भी प्रारम्भ हो चुकी थी। यह प्रतिक्रिया थी, सरकार गिराने की। श्री किशोर उपाध्याय जी ने मुझे सावधान भी किया था। मुझे सहसा विश्वास नहीं हुआ, कोई ऐसा पाप भी कर सकता है। विधानसभा सत्र का गैरसैंण में आयोजन का रोमांच अत्यधिक प्रबल था। सरकार गिराने का खतरा अपने आप ही टल गया। हमने सामान्य सरकारी कामकाज के अलावा, सत्र के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, असिंचित खेती, लघु उद्यमिता, संस्कृति जैसे विषयों पर बहस के लिये समय निर्धारित किया और बहस प्रारम्भ करवायी। भाजपा एक साप्ताहिक (द सण्डे पोस्ट) में छपे समाचार को लेकर सत्र का वर्हिगमन कर गई। घनसाली के विधायक श्री भीमलाल का टैन्टीय विधानसभा के सम्मुख, अपने क्षेत्र के विकास को लेकर आयोजित धरना भी लोगों में उत्सुकता का केन्द्र रहा। दो दिन चलने के बाद, सत्र का सत्रावसान हो गया। यह छोटा सा सत्र हमें एक अपेक्षित विश्वास दे गया। यह विश्वास था, यदि कुछ स्थायी ढांचे तैयार किये जायं तो गैरसैंण में पहले नियमित विधानसभा सत्र और तीन-चार वर्ष में राज्य का समस्त राजकाज, यहीं से संचालित हो सकता है। मैंने स्पीकर महोदय से बातचीत कर यह निर्णय लिया कि, वर्ष 2017 में नई विधानसभा का बजट सत्र गैरसैंण में आयोजित करने से पहले हम दो और विधानसभा सत्र यहां आयोजित करेंगे। हमने लक्ष्य रखा कि, अगले कुछ महिनों में विधानसभा भवन का निर्माण, सचिवालय का निर्माण व कुछ आवासीय सुविधाओं को यहां खड़ा कर लेंगे। हमने यह भी निर्णय लिया कि, वर्तमान विधानसभा के अन्तिम सत्र का आयोजन भराड़ीसैंण विधानसभा भवन में होगा। यह एक सर्वांगीण कल्पना का पहला हिस्सा या पड़ाव था। इसी समय हमने यह भी खाका बना लिया कि, 2017 में नई विधानसभा का पहला बजट सत्र गैरसैंण में आयोजित किया जा सके इस हेतु हमने भराड़ीसैंण विधानसभा सत्र में इस आशय का संकल्प पारित करवाया। इसी दौरान गैरसैंण को राज्य के अन्य भागों से जोड़ने के लिये, 6 स्टेट हाईवेज स्तर की सड़कंे स्वीकृत की गई। इनमें से चार पर काम चल रहा है। सचिवालय स्थल का चयन कर, सचिवालय भवन का शिलान्यास किया गया व निर्माण एजेन्सी को काम सौंप दिया गया। भराड़ीसैंण में सड़क, हैलीपैड, पानी व बिजली द्रुत गति से पहुंचायी गई। पिण्डर से बड़ी पेयजल योजना व रामगंगा जल समेट में जलाशयों के निर्माण को स्वीकृत किया गया। विधानसभा के दूसरे गैरसैण सत्र के लिये पाॅलीटैक्निक भवन को अविलम्ब पूर्ण करने के आदेश दिये गये। दूधातौली व चैखुटिया (डांग) में हवाई पट्टी के निर्माण का सर्वेक्षण प्रारम्भ करवाया गया। डांग में बड़ी हवाई पट्टी हेतु सेना से वार्ता प्रारम्भ की गई। वार्ता में एरिया कोर कमाण्डर भी सम्मिलित हुये। पांच सौ और आवासीय भवनों के लिये स्थल चयन किया गया तथा दो नये डाक बंगलों सहित पुराने बंगलों व जी.एम.वी.एन. के आवास गृहों को उच्चीकृत करने हेतु धन दिया गया। सड़क निर्माण कार्य, जिसमें नयार के उद्गम से टनल बनाने का काम भी सम्मिलित है, अभिष्ठ साधन हेतु, गैरसैंण अवस्थापना सड़क व टनल निर्माण निगम का गठन किया गया। भराड़ीसैंण टाउनशिप के निर्माण के लिये, भूमि का नोटीफिकेशन के साथ यूहुडा नामक संस्था को नई टाउनशिप निर्माण का दायित्व सौंपा गया। मैं एक स्क्रिप्ट को आगे रख बाल उत्साह के साथ, अपना दायित्व पूरा कर रहा था। इस प्रकार के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए हमेशा एक मिशनरी-जील की अपेक्षा होती है। मैं आसन्न खतरे से बेपरवाह होकर अपने काम में लगा था। यद्यपि यह एक बड़ी राजनैतिक ना समझी थी। मैं भूल गया था कि, समय सबसे बड़ा नायक या खलनायक होता है। यदि आप चूक जाते हैं, तो फिर चूक जाते हैं।
मुझे अन्तिम विधानसभ सत्र के दौरान, नई विधानसभा का पहला बजट भराड़ीसैंण में आयोजित करने के संकल्प के साथ ही, गैरसैंण को राजधानी के रूप मंे स्थापित करने का प्रस्ताव पारित करवा लेना चाहिये था। सरकार गिराने का बड़ा खतरा झेल चुका था। खतरा उठाकर भी मुझे गैरसैंण में राजधानी प्रारम्भ करने का निर्णय कर लेना चाहिये था। यद्यपि यह तुगलकी फरमान होता। बिना न्यूनतम ढांचागत व्यवस्था के, राजधानी की कल्पना नहीं हो सकती है। मगर आज की बदली हुई स्थितियों में यह तुगलकी कदम, कम से कम लम्बे समय में ही सही उत्तराखण्ड के लिए वरदान बन जाता। राजनैतिक चुनौतियों को जानते समझते हुये भी न जाने क्यों, मुझे यह भ्रम हो गया था कि, गैरसैंण को मैं ही राजधानी और एक सुव्यस्थित राजधानी बनाऊंगा। मैं बहुधा कटोरे की आकृति में विद्यमान गैरसैंण को उत्तराखण्ड की राजधानी के रूप में, कल्पना में देखकर गदगद होता था। कल्पना का यह चित्र मुझे अतुलनीय आनन्द देता था। मैं अपने रोडमैप के साथ बड़े ही भ्रम में था। जिन परिस्थितियों में राष्ट्रपति शासन हटाया गया, वे परिस्थितियां चीख-2 कर कह रही थी, हरीश तुम कुछ लोगों की नजर में बहुत बड़े ‘‘राजनैतिक गुनाहगार’’ हो। तुम्हारा सत्ता में लौटना असम्भव है। यह मोदी युग है, तुम्हें प्रत्येक कीमत पर जाना ही है। सारा देश मोदी जी के साथ युग बदलाव व सम्पूर्ण भाग्य बदलाव का सपना देख रहा है, झूम रहा है। कालचक्र कह रहा था, तुम कहां खड़े हो, तिनके की तरह उड़ जाओगे। ऐसा ही हुआ। मेरा संकल्प, मोदी प्रेम की आंच में जल गया। मुझे अपने और अपने सपनों के जलने का मलाल नहीं है। सपनाये गैरसैंण, जो वास्तविकता में सपनाये उत्तराखण्ड है, उसका यंू ही गैर रह जाना बहुत दुःखद है। हकीकत यह है, यदि आज उत्तराखण्ड पलायन, गरीबी, विपन्नता आदि का उत्तर ढूंढ रहा है तो, उसे गैरसैंण को अपनुसैंण बनाना ही पड़ेगा। आज की सरकार ऐसा नहीं कर रही है।
कभी-2 जब मैं 2016 की स्थितियों पर गहन चिन्ता करता हॅू तो, अनेकों ख्याल व सोचें मेरे मानस पटल पर आती हैं व जाती हैं। मगर एक चुभन बार-2 उभरती है, यह कटु चुभन है, गैरसैंण में दो सत्रों के दौरान, सरकार गिराये जाने की पुष्ट खबरों से बेखबर रहना। यह एक बड़ी भूल थी। जब लोग मुझे वरिष्ठ, अनुभवी राजनीतिक व्यक्ति की संज्ञा देते हैं, मैं अपने आप पर हंसता हॅू। मेरे स्थान पर यदि कोई साधारण राजनेता होता, तो उसे इन खतरनाक संकेतों के बाद समझ जाना चाहिये था, आगे क्या होने जा रहा है। जितने दिन की बादशाहत थी, अपना सिक्का चला देना चाहिये था। अब तो मैं किसी को आर्शीवाद ही दे सकता हॅू। वह भी कोई हिम्मत वाला हो, वहीं कुछ कर पायेगा। तार्किक हरीश रावत जानता है, बिना सचिवालय व न्यूनतम आवश्यक आवासीय व्यवस्थायें, अर्थात दो हजार आवासीय भवन बनाये व सचिवालय निर्मित हुये राजधानी घोषित करना, दिल्ली से दौलताबाद राजधानी ले जाने के समकक्ष निर्णय होता। राज्य बड़ी प्रशासनिक अव्यवस्था का शिकार हो जाता। टैन्ट आदि में सरकार चलाना, हफ्ते-दस दिन का समाधान हो सकता है। राज्य को चलाने के लिए एक व्यवस्थित राजधानी की दरकार होती है। कभी-2 सोचता हूूॅ, क्या अच्छा है, क्या तर्कसंगत है, इसमें सर खपाने के बजाय, तुम्हें अपने मन का निर्णय थोप देना चाहिये था। मोम्मदबीन तुगलक ने भी ऐसा निर्णय लिया था और सारा राजपाठ लेकर दौलताबाद चल पड़ा था। अच्छा, स्वस्थ्य, राजनैतिक निर्णय था, दिल्ली पर बार-2 वाह्य आक्रमण होते थे, दौलताबाद दूर था। आक्रमणकारी वहां पहुंचने तक रास्ते में ही मर खप जाते। कदम अच्छा उठाया, मगर व्यवहारिक नहीं था। इसके बावजूद तुगलगी फरमान हमेशा के लिये अमर हो गया। मैं भी अमर हो जाता। मैंने अपनों से धोखा खाया। अपने लोगों पर बड़ा भरोसा कर लिया। मैं भूल गया कि आज का उत्तराखण्ड गैरसैंण नहीं, देहरादून मार्का उत्तराखण्ड है। आज का राज्य उत्तराखण्डी-2 मत कहो-मैं देहरादून वाला हूॅ, ‘‘यह गाना सार्थक करता हुआ उत्तराखण्ड है’’। इस उत्तराखण्ड में भावनाओं का नहीं, भौतिकता का महत्व है।
छोटे राज्य में क्रिया के खिलाफ प्रतिक्रिया बड़ी तीव्र होती है, राजनैतिक दलों के अन्दर भी होती है, मगर भा.ज.पा. के मुकाबले कांग्रेस में बहुत अधिक होती है। कांग्रेसी बड़े ही डेमोक्रेट हैं। गैरसैंण को जिला बनाने का प्रस्ताव, मंत्रिमण्डल में लाने का मैंने निर्णय लिया। टी.वी. चैनलों पर एक ऐसी पट्टिका चलने लगी कि, उस पट्टिका को देख, मुझे भी पसीने छूट गये। मामला दो घंटे की उपासना के बाद शान्त हुआ। मैं इस तथ्य का उल्लेख उत्तराखण्ड को यह याद दिलाने के लिये कर रहा हॅू कि, मैं कैसी राजनैतिक परिस्थितियों में अपनी नाव चला रहा था। गैरसैंण को लेकर किया गया मेरा प्रत्येक निर्णय, बाॅडर लाईन मुख्यमंत्री के लिये बड़ी चुनौती था। इसके बावजूद मैंने जितने भी निर्णय लिये, सभी निर्णय असामान्य निर्णय थे। एक समय आयेगा, जब मेरे आलोचक भी मेरे निर्णयों के महत्व को समझेंगे। मेरे निर्णयों के कारण अब दुनिया की कोई भी शक्ति हमेशा के लिये ‘‘गैरसैंण राजधानी’’ के सत्य को नकार नहीं सकती है।
गैरसैंण राजधानी, पुण्य ही पुण्य है। गैरसैंण उत्तराखण्डी सर्वांगीण विकास की गंगा है। मैं, गैरसैंण की गंगा से कुछ ही अंजलि जल लेकर नहा पाया, पूरा गोता नहीं लगा पाया। कल कोई अवश्य आयेगा, साहस दिखायेगा। मुझे उम्मीद है, इस अधूरे संकल्प को अवश्य पूरा किया जायेगा। उत्तराखण्डी संकल्प की गर्मी, कड़ाके की ठंड में आवश्यक तपिश देगी। उन्हेें भी देगी, जिन्हें गैरसैंण नाम से ही ‘‘ठंड’’ लगी जा रही है। यदि 82 वर्ष के श्री वीरभद्र सिंह जी व श्री सुखराम जी को शिमला की बर्फ में ठंड नहीं लग रही है, तो ‘‘आधी रोटी खायंेगे-उत्तराखण्ड राज्य बनायेंगे’’ के रसिकों को तो ठंड से जुझना ही पड़ेगा।
मैं आभारी हॅू, राज्य के सभी राजनैतिक दलों, यू.के.डी., समाजवादी पार्टी, लोकदल, पीस पार्टी आदि का। उन्होंने गैरसैंण पर मेरे उठाये गये कदमों का कभी भी विरोध नहीं किया। इन लोगों ने राजनैतिक स्वार्थ के ऊपर राज्य के हित को महत्व दिया। भा.ज.पा. तो हमेशा मुझसे दो कदम आगे खड़ी थी। उनके उपनेता ने विधानसभा में गैरसैंण स्थायी राजधानी का संकल्प भी अधिसूचित किया। माॅ गंगा ने उन्हें तथास्तु कहते हुये, पहले से अधिक वोटों से जिताया है। मैं राज्य की जनता-जनार्दन को भी धन्यवाद देता हॅू, उन्होंने गैरसैंण को हृदय से स्वीकार किया है। इतनी ज्वलन्त वास्तविकताआंें के आलोक में जरा सोचिये, क्या मेरे मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद, गैरसैंण में राजधानी निर्माण से संबन्धित सारे निर्णयों पर काम का बन्द है। एक भी ईंट किसी भी कार्य में मेरे जाने के बाद नहीं लगी है। विधानसभा सचिवालय निर्माण व आवासीय भवन निर्माण का पैसा, राजकोष डकार गया है। सड़कें भी रोक दी गई हैं। मेदावन से नयार के किनारे-2 आने वाली सड़क की डी.पी.आर. भी रोक दी गई है। गैरसैंण अवस्थापना निगम समाप्त कर दिया गया है। गैरसैंण-चैखुटिया परिषद का अस्तित्व बना हुआ है, मगर बजट व शासन की रूची गायब है। भराणीसैंण टाउनशीप का निर्माण जो राजधानी हेतु आवश्यक अवयव है, उसे पूर्णतः गर्त में दबा दिया गया है। टाउनशिप हेतु नोटिफाईड भूमि, डिनोटिफाईड कर दी गई है, जब बांस ही नहीं रहेगा, तो बांसुरी कहां से बजेगी। भूमि नहीं होगी तो टाउनशिप का सवाल खड़ा नहीं होगा। ‘‘यूहुडा’’ नाम की संस्था को राज्य ने एक अनावश्यक एक्सरसाईज मानकर गड्डी कर दिया है। इंतिहा इस तथ्य के साथ हो गई है। गतवर्ष विधानसभा का ‘‘बजट सत्र’’ भराड़ीसैंण में आयोजित करने के बजाय, एक भी विधानसभा सत्र गैरसैंण में आयोजित नहीं हुआ है। राज्य लगभग ढाई अरब रूपये यहां खर्च कर चुका है। जनता जर्नादन की आशा ऊंची, छलांगें मार रही हैं। सत्ता को गैरसैंण पर आगे बढ़ना चाहिये। अन्यथा उत्तराखण्ड को आगे बढ़कर खुद संघर्ष का नेतृत्व सभालना चाहिये। हम सब नश्वर हैं, उम्र बीत रही है, मन कह रहा है, कब होगा राजधानी गैरसैंण का सपना साकार। क्या हमारी सासों के थमने के बाद? संघर्ष की जागर लगाईये। मैं कमतर ही सही, गैरसैंण का जगरिया हूॅ, जागर लगाता रहूंगा। मेरा यह लेख इस जागर का हिस्सा है।
जय जिया!
क्रमशः
(हरीश रावत)

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