देश में सिर्फ इस जेल में बनाया जाता है फांसी का फंदा, आखिर क्यों ?

फांसी की सजा ऐसी हर किसी को नहीं दी जाती। रेयर और रेयर केस में फांसी की सजा सुनाई जाती है। जिस तरह फांसी की सजा किसी विरले को दी जाती है। ठीक उसी तरह फांसी के लिए प्रयोग किया जाना वाला फंदा भी देश में एक ही जगह बनता है। और वो जगह है बिहार की सेंट्रल जेल। निर्भया केस में सुनवाई के अंतिम चरणों में पहुंचते ही बक्सर जेल प्रशासन को एक बार फिर से 10 फांसी के फंदे तैयार करने का ऑर्डर मिला है। लेकिन, इस बात को जानना जरूरी है कि अखिर बक्सर सेंट्रल जेल में ही फांसी का फंदा क्यों बनाया जाता है ?

यहां लगी है मशीन

बक्सर जेल के सुपरिटेंडेंट विजय कुमार अरोड़ा बीबीसी से कहते हैं, ‘क्योंकि इंडियन फैक्ट्री लॉ के हिसाब से बक्सर सेंट्रल जेल को छोड़ दूसरी जगहों पर फांसी के फंदे बनाने पर प्रतिबंध है। पूरे भारत में इसके लिए केवल एक ही जगह पर मशीन लगाई गई है और वो सेंट्रल जेल बक्सर में। ये आज से नहीं बल्कि अंग्रेजों के समय से है। बक्सर सेंट्रल जेल गंगा के किनारे है। फांसी का फंदा बनाने वाली रस्सी बहुत मुलायम होती है। उसमें प्रयोग किए जाने वाले सूत को अधिक नमी की जरूरत होती है। हो सकता है कि गंगा के किनारे होने के कारण ही मशीन यहीं लगाई गई। हालांकि अब सूत को मुलायम और नम करने की जरूरत नहीं पड़ती। सप्लायर्स रेडिमेड सूत ही सप्लाई करते हैं। जेल सुपरिटेंडेंट विजय कुमार अरोड़ा के अनुसार फांसी का फंदा बनाने के लिए जिस सूत का इस्तेमाल होता है, उसका नाम J34 है।

पंजाब से मंगाया जाता था सूत

पहले यह सूत विशेष तौर पर पंजाब से मंगाया जाता था, लेकिन अब सप्लायर्स ही देते हैं। अरोड़ा बताते हैं, ‘यह मुख्य रूप से हाथ का काम है। मशीन से केवल धागों को लपेटने का काम होता है। 154 सूत का एक लट बनाया जाता है। छह लट बनते हैं। इन लटों से 7200 धागे या रेशे निकलते हैं। इन सभी धागों को मिलाकर 16 फीट लंबी रस्सी बनती है। जेलर सतीश कुमार सिंह के मुताबिक फंदा बनाने का अंतिम चरण सबसे महत्वपूर्ण होता है। वो कहते हैं, ‘जब एक बार हम यहां से रस्सी बनाकर भेज देते हैं, तो फिर उसकी फिनिशिंग का काम होता है। इसमें रस्सी को मुलायम और नरम बनाना शामिल है। क्योंकि नियमों के मुताबिक फांसी के फंदे से केवल मौत होनी चाहिए। चोट का एक भी निशान नहीं रहना चाहिए।

कैदी ही इसे बनाने का काम करते

बक्सर जेल के कैदी ही इसे बनाने का काम करते हैं। इसके लिए बक्सर जेल में कर्मचारियों के पद सृजित हैं। वर्तमान में चार कर्मी इन पदों पर काम कर रहे हैं। जेलर सतीश कुमार सिंह बताते हैं कि कर्मी फंदा बनाने के लिए कैदियों को केवल निर्देशित करते हैं या प्रशिक्षित करते हैं। जेलर सतीश कुमार कहते हैं, ‘फांसी की सजा पाए कैदी विशेष कैदी होते हैं। उनसे कोई काम नहीं कराया जाता। जिन लोगों को फांसी की सजा आजीवन कारावास में बदल चुकी है या जो आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे हैं, वे ही फांसी के फंदे बनाने के काम में लगते हैं।’

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