
उत्तराखंड में आज कन्या संक्रांति के दिन लोकपर्व खतड़ुवा मनाया जाएगा। खतड़ुए को शाम के समय मनाया जाता है। खतड़ुवा उत्तराखंड के कुमाऊं मण्डल में मनाया जाने वाला प्रमुख त्यौहार है। इस दिन सुबह लोग घरों में पकवान बनाते हैं। दिन में कांस (एक प्रकार की घास), भांग के पत्ते और फूल लेने के लिए चले जाते हैं। शाम को इनका एक गुलदस्ता सा बनाकर और ककड़ी काट कर खतड़ुवे के पुतले को जलाकर इस त्यौहार को मनाया जाता है।
आज मनाया जाएगा लोकपर्व खतड़ुवा
खतडुआ कुमाऊं क्षेत्र में शरद ऋतु की पहली सांझ को मनाया जाता है। खतड़ुआ एक पुतला होता है जिसे गांव घरों में हर परिवार द्वारा मक्के के डंठल या किसी भी लकड़ी से बनाया जाता है। खतड़ुवे की शाम उत्तराखंड के हर गांव और कस्बे के घरों में लोग छिलकों की मशालें लेकर ये लोग लेकर अपने-अपने घरों से गौशाला की ओर जाते हैं। गौशाला जिसे गोठ भी कहा जाता है वहां से इन मशालों को जलाकर बाहर आते हैं। बाहर निकलते समय सब मिलकर बोलते हैं।
भेल्लो जी भेल्लो भेल्लो खतडुवा
“भाग खतडुआ, धारा-धार, गाय की जीत, खतडुआ की हार!”
गै मेरी स्योल खतड़ पड़ो भ्योल

फिर इन मशालों से रास्ते पर बनाए गए खतड़ुए के पुतले को जलाया जाता है। लोग इस जलते हुए खतड़ुवे के चारों ओर नाचते हैं और इसे छड़ियों और कांस, भांग के पौंधे और फूलों से बने गुलदस्ते से भी मारते हैं। जब खतड़ुवा पूरी तरह जल जाता है फिर इसे लंबी कूद लगाकर लांघा जाता है। इसके बाद गांव घरों के सभी लोग खीरे के बीच में से छोटे छोटे टुकड़े कर आपस में प्रसाद की तरह बांट लेते हैं। बता दें कि ककड़ी को काटने के बाद इसके बीज को तिलक के रूप में सिर पर भी लगाया जाता है।
कैसे मनाया जाता है ये त्यौहार ?
कुछ-कुछ इलाकों में इस त्यौहार में खतड़ुवे के साथ एक बूढ़ा और बूढ़ी भी शामिल हो जाते हैं। बता दें की ये बूढ़ा-बूढ़ी को बच्चे खतड़ुवे के तीन-चार दिन पहले सूखी घास को मोड़कर बनाते हैं और कांस के फूलों से सजाकर इसे गोबर के ढेर में रोप देते हैं। फिर खतड़ुए के दिन बूढ़े को उखाड़कर घर के चारों ओर घुमाकर छत में फेंक दिया जाता है और बूढ़ी को खतड़ुवे के साथ जला दिया जाता है। पूर्वी कुमांऊ में इसे गैत्यार भी कहा जाता है। कुमाऊं के हर क्षेत्र में इसे अलग-अलग तरीके से मनाया जाता है।

क्या है गढ़वाल और कुमाऊं का इसको लेकर विवाद ?
खतड़ुवा त्यौहार को लेकर कुमाऊं और गढ़वाल में कुछ विवाद है। इन विवादों के पीछे कई कहानियां छिपी हुई हैं। कुछ लोगों का मानना है कि ये त्यौहार कुमाऊं और गढ़वाल के बीच हुए युद्ध में जीत आ उत्सव है। जबकि कुछ लोग इसे ऋतु परिवर्तन का त्यौहार मानते हैं।
कुछ लोग कहते हैं की कुमाऊं और गढ़वाल के इस युद्ध में कुमाऊं की सेना का नेतृत्व गौड़ा सिंह या गौड़ा जाति के किसी वीर क्षत्रीय ने किया था। ये वीर योद्धा अपनी वीरता और रणकौशल से गढ़वाल की सेना के सेनापति खतड़ सिंह को मार गिराने में सफल हुआ था। जिससे गढ़वाल की सेना को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। इस विजय ने कुमाऊं की सेना के हौसले को बुलंद किया और इस युद्ध को एक ऐतिहासिक घटना बना दिया। जिसे खतड़ुवा त्यौहार के रूप में याद किया जाता है।

ऐसा ही कुछ कुमाऊं के प्रसिद्ध इतिहासकार बद्रीदत्त पांडेय अपनी किताब उत्तराखंड का इतिहास में भी लिखते हैं कि गढ़वाल विजय की यादगार में ये उत्सव मानाया जाता है। कहा जाता है कि सरदार खतड़ सिंह गढ़वाल के सेनापति थे जो मारे गए। वहीं कुछ लोग मानते हैं कि ये युद्ध चम्पावत के राजा रुद्रचंद के पुत्र लक्ष्मी चंद और गढ़वाल के राजा माश शाह के बीच सन 1565 में हुआ था। इस युद्ध में काफी बार पराजित होने के बाद लक्ष्मी चंद ने जीत हासिल की थी। बता दें कि रुद्रचंद के पुत्र लक्ष्मी चंद को कुमाऊं में “भीगी बिल्ली” के नाम से भी जाना जाता था।
खतड़ुवे की कहानी पर क्या कहते हैं इतिहासकार
अटकिन्सन अपनी किताब हिमालयन गजेटियर के भाग-2 में लिखते हैं कि लोक मान्यता के अनुसार, गौड़ा द्वारा गढ़वाली सेना के खिलाफ उसकी विजय का समाचार घास-फूस पर आग लगाकर राजा को दिया गया था। हालांकि इस संबंध में प्राप्त ऐतिहासिक तथ्यों से इस तरह के किसी युद्ध की या किसी सेनापति के ऐसे नामों की कोई पुष्टि नहीं होती है।

यमुना दत्त वैष्णव अपनी किताब संस्कृति संगम उत्तराखंड में लिखते हैं कि ये धारणा पूरी तरह भ्रामक है। ना तो कुमाऊं के इतिहास में गैड़ी नामक किसी राजा का और ना ही किसी सेनापति का जिक्र मिलता है। इसके साथ ना ही गढ़वाल के राजाओं की राजवंशावलियों में खतड़ुवा या खतड़ू नाम के किसी राजा या सेनापति का उल्लेख किया गया है। इस प्रकार इस कहानी को ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ना उचित नहीं है।

विदेशों में भी मनाया जाता है इसी तरह का त्यौहार
यमुनादत्त वैष्णव अपनी किताब संस्कृति संगम उत्तरांचल में लिखते हैं कि कुमाऊं के खतड़ुवा की तरह पश्चिम एशिया के ईसाई भी एक पर्व मनाते हैं। इसके अलावा, उत्तर अफ्रीका के हब्श देश में भी उसी महीने मशालों को जलाकर इसी तरह का पर्व मनाया जाता है।
भारत से हब्श के व्यापारिक संबंधों की जड़ें काफी गहरी हैं, वहां इस पर्व को “मस्कल” कहा जाता है। जब इन सभी सांस्कृतिक धागों को एक साथ बुनते हैं तो ये स्पष्ट होता है कि खतड़ुवा पर्व भी ऋतु परिवर्तन की खुशी में मनाया जाता है। जो सदियों से अलग-अलग संस्कृतियों में अलग अलग तरह से मनाया जाता आ रहा है।

बरसात की विदाई और ठंड के स्वागत का है प्रतीक
बात करें खतड़ू की तो साधारण बोलचाल में खतड़ू या खतड़ों का मतलब होता है रुई से भरी हुई रजाई। पहाड़ों पर ऐसा कहा जाता है कि खतड़ुवा त्यौहार की रात से ही खतड़ों में सिमटने वाली ठंड दस्तक देने लगती है। मध्य सितंबर से पहाड़ों में धीरे-धीरे ठंड की सिहरन शुरू हो जाती है। यही वो वक्त है जब पहाड़ों के लोग सर्दियों के कपड़े निकालकर धूप में सूखाते हैं और उन्हें पहनना शुरू करते हैं। इस तरह ये त्यौहार बरसात की विदाई और ठंड के स्वागत का प्रतीक बन जाता है और ऋतृ परिवर्तन को दर्शाता है।

खतड़ुवा के दिन गांव के लोग अपने गौशालाओं को खास तौर से साफ करते हैं। इस दिन पशुओं को नहलाया-धुलाया जाता है और उनकी सफाई की जाती है। पशुओं को दुख और बीमारी से दूर रखने के लिए भगवान की पूजा की जाती है। मानों ये पर्व प्रकृति के साथ-साथ जीवों की भी आराधना का समय हो।