एक उम्मीद का गैरसैंण हो जाना

आशीष तिवारी। उत्तराखंड के लिए सोलह सालों में उगता सुबह का हर सूरज न जाने कितनी बार अपने उजाले से अनगिनत उम्मीदों पर रोशनी उड़ेल गया। लेकिन हर डूबता सूरज इन उम्मीदों को अंधेरे की पहरेदारी में खामोशी से रखकर  चला भी गया। न उम्मीदें टूटी न पूरी ही हुईं। वक्त बेवक्त वो आवाम को अपनी चुभन का एहसास कराती रहीं। कुछ उम्मीदों के रंग बदल गए तो कुछ उम्मीदों के नाम। इन्हीं में से एक उम्मीद गैरसैंण हो गई।

क्या फर्क पड़ता है एक उम्मीद के गैरसैंण हो जाने से। जो खुद पहाड़ हो वो एक उम्मीद के आगे पिघल भी तो नहीं सकता। दरारों के रहमोकरम के सहारे खड़ी स्कूल की दिवारें अपने ही भविष्य को लेकर खौफजदा हो चुकी हैं। खाली पड़ी डाक्टरों की कुर्सियां पहाड़ों के अस्पतालों से होने की वजह पूछती हैं। देश के डिजिटल होने की खबरें मुनस्यारी, पिथौरागढ़ mahilaमें पहुंचने के लिए रास्ता ही तलाशती रह जाती हैं। लेकिन पहाड़ है कि पिघलता नहीं।

उम्मीदें जब गैरसैंण हो जाती हैं तो एक जख्म सी हो जाती हैं। ये जख्म भरे नहीं जाते। इन्हें रिसने भर के लिए ताजा ही रखा जाता है। मरहम के नाम सियासत अक्सर नमक छिड़कती रहती है। आखिर सियासत को भी तो वजह चाहिए।

उम्मीदें फिर गैरसैंण होने लगी हैं। पहाड़ों पर फिर चहल पहल हो गई है। इस बार फिर उगते सूरज से बिखरी रोशनी को ये भावुक पहाड़ मानों समेट कर रख लेना चाहतें हैं। शाम के बाद भी कुछ और देर तक उजाले के लिए। कौन समझाए इन्हें, ये पहाड़ समझते भी नहीं कि अब उम्मीद गैरसैंण हो गईं हैं। सूरज डूबने के बाद अंधेरा ही हासिल है।

 

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