हरिद्वार सीट- निशंक आएंगे फिर बिना शंका या अंबरीष का उठेगा शीष

उत्तराखंड में 2019 के संसदीय चुनावों के लिए शुरुआती चरण में ही वोट डाले जाएंगे लिहाजा चुनावी सरगर्मी पूरे शबाब पर है। हरिद्वार सीट पर भी चुनावी तपिश महसूस होने लगी है।

इस सीट से बीजेपी ने एक बार फिर से मौजूदा सांसद रमेश पोखरियाल निशंक पर भरोसा जताया है। कांग्रेस को इस सीट पर कैंडिडेट उतारने के लिए खासी माथापच्ची करनी पड़ी। आखिरकार कांग्रेस ने स्थानीय नेता अंबरीष कुमार को टिकट दे दिया।

शुरुआती दौर में कांग्रेस के बड़े नेताओं में शुमार हरीश रावत के इस सीट से उम्मीदवार बनाए जाने की उम्मीद थी। हालांकि खबरें बताती हैं कि हरीश रावत खुद ही इस सीट से लड़ना नहीं चाहते थे। हो सकता है कि हरीश रावत को 2017 के विधानसभा चुनावों में इस सीट से मिली हार ने परेशान किया हो।

बहरहाल हरिद्वार में निशंक का पलड़ा भारी पड़ेगा या फिर कांग्रेस के अंबरीष बनेंगे सिकंदर ये बड़ा सवाल है।

2014 के चुनावों में रमेश पोखरियाल निशंक ने इस सीट पर हरीश रावत की पत्नी रेणुका रावत को मात दी थी।

2014 के चुनावों में रमेश पोखरियाल को कुल वोट मिले थे – 5 लाख 92 हजार 320

जबकि रेणुका रावत को – 4 लाख 14 हजार 498 वोट मिले थे।

निशंक ने 2014 में ये सीट 1 लाख 77 हजार से अधिक वोटों के अंतर से जीत ली थी।

हालांकि 2009 में ये सीट कांग्रेस के खाते में गई थी और हरीश रावत यहां से सांसद बने थे। हरीश रावत ने 2009 में ये सीट 1 लाख 27 हजार 422 वोटों से जीती थीं।

2004 में इस सीट पर दिलचस्प परिणाम सामने आए थे। 2004 के चुनावों में समाजवादी पार्टी ने बाजी मारी थी। सपा के राजेंद्र कुमार ने तकरीबन 37 हजार वोटों से ये सीट जीती थी। 2004 के चुनावों में भाजपा तीसरे नंबर पर थी जबकि कांग्रेस चौथे नंबर पर रही थी।

हालांकि 2004 से 2019 तक हरिद्वार की गंगा में खासा पानी बह चुका है और सियासी समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं।

रमेश पोखरियाल निशंक से सियासी चतुराई में आगे निकल पाना जहां मुश्किल है वहीं संगठन की ताकत निशंक का हौसला बढ़ा रही है। अंबरीष कुमार यकीनी तौर पर स्थानीय नेता हैं लेकिन जनाधार के मामले में उन्हें खासी मेहनत की जरूरत महसूस होती है।

हरिद्वार संसदीय क्षेत्र में धर्मपुर, डोईवाला, ऋषिकेश, हरिद्वार, भेल रानीपुर, ज्वालापुर, भगवानपुर, झबरेड़ा, पिरान कलियर, रुड़की, खानपुर, मंगलोर, लक्सर, और हरिद्वार ग्रामीण की विधानसभाएं क्षेत्र आते हैं।

इन 15 विधानसभाओं में भगवानपुर, मंगलोर, पिरानकलियर को छोड़ दीजिए तो बाकी सभी में बीजेपी का कब्जा है। इस लिहाज से देखिए तो अंबरीष कुमार के लिए लड़ाई बेहद कठिन कही जा सकती है।

हालांकि अंबरीष कुमार ने स्थानीय और बाहरी का मुद्दा उठाकर लड़ाई को रोमांचक बनाने की पूरी कोशिश की है लेकिन उनकी इस मुहिम में स्टार प्रचारकों और कांग्रेस के संगठन का साथ मिलता तो यकीनन हाथ मजबूत होता।

ये जरूर है कि इस इलाके में गन्ना किसानों की बहुतायत है और बकाया भुगतान को लेकर गन्ना किसान खासे नाराज हैं। खेती की बिगड़ती हालत के चलते भी किसानों में नाराजगी पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ी हुई है।

लेकिन क्या ये नाराजगी कांग्रेस को जीत की संजीवनी दे पाएगी ये बड़ा सवाल है।

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